नजराना
"यह तो पांच ही हैं मालिक।”
“पाँच, नहीं, दस हैं। घर जाकर गिनना।"
"नहीं सरकार, पाँच हैं।"
"एक रुपया नजराने का हुआ कि नहीं?"
"हाँ, सरकार?"
"एक तहरीर का?"
"हाँ, सरकार!"
"एक कागद का?"
"हाँ, सरकार!"
"एक दस्तूरी का!"
"हाँ, सरकार!"
"एक सूद का!"
"हाँ, सरकार!"
“पाँच नगद, दस हुए कि नहीं?"
"हाँ, सरकार ! अब यह पाँचों भी मेरी ओर से रख लीजिए।"
"कैसा पागल है?"
"नहीं, सरकार, एक रुपया छोटी ठकुराइन का नजराना है,
एक रुपया बड़ी ठकुराइन नजराना का।
एक रुपया छोटी ठकुराइन के पान खाने को,
एक रुपया बड़ी ठकुराइन के पान खाने को।
बाकी बचा एक, वह आपके क्रिया-करम के लिए।"
('गोदान', पृ. 182 )
वाह
ReplyDeleteबहुत सुंदर
ReplyDeleteवाह!!!
ReplyDeleteअद्भुत..