राखी कह या श्रावणी, पावन यह
त्यौहार
कच्चे धागों से बंधा ,भाई बहन का प्यार।।
थाली लेकर शगुन की,बहन सजाये भोर।
रोली से टीका किया, बाँधी रेशम डोर।।
रेशम की ये डोरियाँ , कच्चे धागे चार।
सच्चा रिश्ता प्रीत का, निश्छल पावन प्यार।।
धागे कच्चे हैं मगर, लेकिन पक्की प्रीत।
बहना से भाई कहे, हम बचपन के मीत।।
राखी का त्यौहार यह, बाँटे केवल नेह।
बेटी चल ससुराल से , आई बाबुल गेह।।
देते जो कुर्बानियां , होते हैं जाँबाज।
बाँधो उनको राखियाँ ,रखते हैं जो लाज।।
एक वचन मैं माँगती, भैया तुमसे आज।
रक्षा कर माँ बाप की, रखना कुल की लाज।।
देती हूँ भैया वचन, मैं भी तुमको आज।
सास ससुर माँ बाप सम, समझ करूँगी
कच्चे धागों से बंधा ,भाई बहन का प्यार।।
हरियाली चहुं ओर है, धरा किया श्रृंगार
रहे मुबारक आपको ये राखी का त्यौहार
-रचनाकार अज्ञात
Sunday, August 23, 2026
811 ..धागे कच्चे हैं मगर, लेकिन पक्की प्रीत।
रक्षा बंधन पर अशेष शुभकामनाएं
Saturday, August 22, 2026
809 .. उसने पूछा - मैं क्या हूँ तुम्हारी ?
मातृभाषा -
उसने पूछा - मैं क्या हूँ तुम्हारी ?
मैंने कहा - मातृभाषा !
- हिंदी दिवस पर
सबसे ख़ूबसूरत -
वह सबसे ख़ूबसूरत
कलाकृति है
सृष्टि की !
चुप होना ! -
उसका चुप होना
लगता है मानो
धरती का रुक जाना !
रंग सी है -
वह ज़िन्दगी के
कैनवास में
ख़ुशी के एक रंग सी है !
उसकी बातें -
उसकी बातें
सरस लोकगीत के
मानिन्द लगती है !
क्षितिज तक -
मै तुम्हारे साथ क्षितिज के
उस ओर जाना चाहता हूँ
या न्यूनतम क्षितिज तक
क्षितिज मतलब
जहाँ धरती और आकाश
मिले हुए होते है
या प्रतीत होते है
-मनीष के. सिंह
https://kalpkatha.blogspot.
Wednesday, August 19, 2026
810 निर्माण सीखने की बजाय दरारों की समझ नें रुचि लेने वाली बेटी
दरार ..... महेन्द्र मद्धेशिया
"हां"
'कौन सा कोर्स चुना'
"लॉ"
कविता के हाथ ठिठक गए, मां ने हैरानी से बेटी की ओर देखा
तुम तो इंजीयरिग करना चाहती थी न ..
चाहती तो थी मां पर अब कानून पढ़ूंगी
"अचानक"
बेटी ने पानी का गिलास मेज पर रक्खा पानी की सतह में
हलकी सी लहर उठी और पल भर में थम गई
अचानक नहीं ..धीरे-धीरे
समझी नहीं?
जब बुआ को दहेज के कारण घर छोड़ना पड़ा ...मां चुप रही
फिर जब पड़ोस वाली दीदी ने न्याय की गुहार लगाई और लोगों ने दोषियां पर नही
उन्हीं के चरित्र पर सवाल उठाए तभी तह कर लिया कि अब कानून ही पढ़ना है
कुछ देर बाद कविता ने धीमे से पूछा तो ...कानून पढ़कर क्या करोगी
बेटी मुस्कुराई..
दरार गिनने से क्या होगा मां, मैं उन दीवारों के तह तक पहुंचना चाहती हूं
जहां से ये दरारें शुरू होती है
निर्माण सीखने की बजाय
दरारों की समझ नें रुचि लेने वाली बेटी ने
मां को आश्चर्य में डाल दिया
Thursday, August 13, 2026
साहस व सपनों का साथ
* विश्वास *
उच्च शिक्षा के लिए मां अपनी बेटी को दूसरे शहर भेज रही थी।
दोनों ट्रेन की प्रतीक्षा कर रही थी
दोनों ट्रेन की प्रतीक्षा कर रही थी
मां मुस्कुराई और बोली मंजिल मिले ना मिले बस
अपने सपनों का साथ मत छोड़ना, मुझे तेरी सफलता से अधिक
तेरे साहस पर भरोसा है ...
इतने में ट्रेन प्लेटफार्म पर आ लगी, प्रज्ञा ने मां को गले लगाया,
मां की साहस भरी सीख प्रज्ञा के मन में विश्वास बन कर उतर चुकी थी
मां की साहस भरी सीख प्रज्ञा के मन में विश्वास बन कर उतर चुकी थी
ट्रेन आगे बढ़ी दोनों की मुस्कान कह रही थी अब डर नहीं,
साहस व सपनों के साथ सफर पर निकल पड़ा था
- वाणी भारद्वाज
Wednesday, August 12, 2026
807 ...किशोरी ने बिना कुछ कहे इंसानियत कि सलीका सिखा दिया
सलीका
मूसलाधार बारिश ने पूरे शहर को थाम रक्खा था.
दिया अपने माता-पिता के साथ काफी शाप मे बैठी थी. तभी बाहर डांटने की
आवाज सुनकर वह कांच के पास पहुंची.
एक वृद्ध महिला शेड के नीचे बारिश से बचने की कोशिश कर रही थी
और ठंड से कांप भी रही थी, चौकीदार उसे हटने को कह रहा था,
दिया अपना छाता और काफी का कप लेकर बाहर पहुंची
और मुस्कुराते हुए कहा अम्मा ये छाता रख लीजिये,
और थोड़ा काफी पी लीजिए.
वृद्धा की नम आंखें और चौकीदार की झुकी नजरे बता रही थी कि
उस किशोरी ने बिना कुछ कहे इंसानियत कि सलीका सिखा दिया
बिना कुछ कहे इंसानियत कि सलीका सिखा दिया
-ऋतु मिश्रा
Subscribe to:
Posts (Atom)
