Monday, August 31, 2026

812 ..2 करोड़ की नौकरी ठुकराई ----- वंदना त्रिपाठी

 "जिस दिन बेटी ने 2 करोड़ की नौकरी ठुकराई... उसी दिन माँ ने पहली बार उसके सामने अपना सिर रखकर रोते हुए कहा— बेटा, आज तूने मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी कीमत चुका दी।"


आज मैं अपने शहर की एक छोटी-सी लाइब्रेरी चलाती हूँ।
लाइब्रेरी के बाहर एक बोर्ड लगा है—
"गरीब बच्चों के लिए किताबें और पढ़ाई बिल्कुल मुफ्त।"
लोग जब अंदर आते हैं और दीवार पर लगी मेरी विदेश की यूनिवर्सिटी की डिग्री देखते हैं,
तो अक्सर पूछते हैं— 
"इतनी पढ़ाई करके भी यहीं बैठी हो?"

मैं मुस्कुरा देती हूँ। क्योंकि उन्हें नहीं पता...
पाँच साल पहले मेरे पास अमेरिका की एक बड़ी कंपनी का ऑफर था।
सालाना पैकेज... करीब 2 करोड़ रुपये।
मेरे जीवन का सबसे बड़ा सपना पूरा होने वाला था।

लेकिन मैंने वह नौकरी ठुकरा दी। और उस फैसले के बाद...
मेरी माँ पहली बार मेरे सामने फूट-फूटकर रोई थीं।



कहानी शुरू होती है उत्तर प्रदेश के एक छोटे-से कस्बे से।
मेरे पिता रामप्रसाद एक सरकारी स्कूल में चपरासी थे।
माँ कमला देवी घरों में सिलाई करती थीं।
हमारे घर की हालत ऐसी थी कि महीने के आखिरी सप्ताह में
माँ राशन के डिब्बे खोलकर चुपचाप हिसाब लगाती थीं—
"इतने चावल हैं... इतने आटे में काम चल जाएगा..."
मैं बचपन से यह सब देखती थी।
लेकिन माँ ने कभी मुझे महसूस नहीं होने दिया कि हम गरीब हैं।
एक रात मैंने उनसे पूछा— "माँ, आप अपने लिए नई साड़ी क्यों नहीं खरीदती?"
माँ हँसकर बोलीं—
 "मेरी साड़ी पुरानी है तो क्या हुआ बेटा? मेरी बेटी का सपना तो नया है।"
उस रात मैं बहुत रोई थी। और उसी दिन मैंने तय किया था—
मुझे पढ़ना है। बहुत पढ़ना है।



पिता रोज सुबह पांच बजे उठते।
साइकिल से स्कूल जाते। बारिश हो या ठंड...
कभी छुट्टी नहीं लेते। एक दिन मैंने पूछा
"पापा, आप इतना काम क्यों करते हैं?"
उन्होंने मेरे सिर पर हाथ रखकर कहा—
"तू एक दिन इतनी बड़ी बनेगी कि लोग तेरा नाम लेकर हमें पहचानेंगे।"
मैंने कहा— "और अगर मैं बड़ी होकर आपको अपने साथ विदेश ले जाऊँ तो?"
पापा हंस पड़े। "पहले तू बड़ी तो हो जा..."

 
मैं पढ़ती गई। स्कॉलरशिप मिली।
कॉलेज में दाखिला हुआ। फिर विदेश की एक यूनिवर्सिटी में मेरा चयन हो गया।
फीस बहुत ज्यादा थी। मुझे लगा... अब सपना यहीं खत्म हो जाएगा।
लेकिन अगले दिन पिता ने अपनी पुरानी मोटरसाइकिल बेच दी।
माँ ने अपनी शादी की आखिरी सोने की चूड़ी उतार दी।
मैंने पूछा— "माँ, ये क्यों?"
उन्होंने मुस्कुराकर कहा— "बेटी की पढ़ाई में लगाया सोना कभी बेकार नहीं जाता।"
मैं विदेश चली गई।

 
चार साल बाद... मैंने अपनी पढ़ाई पूरी की।
एक बड़ी अमेरिकी टेक कंपनी ने मुझे इंटरव्यू के लिए बुलाया।
एक नहीं... दो नहीं...पूरे आठ राउंड।
आखिरी राउंड के बाद सामने बैठे अधिकारी ने मुस्कुराकर कहा—
"अनन्या, we want you." कुछ दिनों बाद ऑफर आया।
सालाना पैकेज... लगभग 2 करोड़ रुपये।
मेरे हाथ कांपने लगे। मैंने सबसे पहले माँ को फोन किया।
"माँ... मेरा चयन हो गया।" उधर कुछ सेकंड बिल्कुल खामोशी रही।
फिर माँ बोलीं— "कितना मिलेगा?"
मैंने रकम बताई। माँ चुप हो गईं।
फिर सिर्फ इतना कहा— "तेरे पापा को बता दूँ?"
मैं हँसते हुए बोली— "हाँ माँ!"
कुछ देर बाद फोन पर पापा की आवाज आई।
उनकी आवाज काँप रही थी। "बेटा... तूने कर दिखाया।"
मैंने कहा— "पापा, अब आपकी सारी परेशानियां खत्म।"
उन्होंने कहा—"हाँ बेटा... अब शायद
तुझे हमारी चिंता करने की जरूरत नहीं पड़ेगी।"
मैंने उस बात पर ध्यान नहीं दिया।
लेकिन... कुछ ही दिनों बाद मेरी जिंदगी बदल गई।

 
ज्वाइनिंग से एक महीने पहले मैं भारत वापस आई।
घर पहुँची तो देखा... पापा बिस्तर पर थे।
मैंने पूछा— "क्या हुआ?" माँ ने नजरें झुका लीं।
"कुछ नहीं बेटा..." मैंने डॉक्टर की रिपोर्ट उठाई।
मेरे पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई।
पापा को किडनी की गंभीर बीमारी थी।
इलाज लंबा था। और महंगा भी।
मैंने पूछा— "आपने मुझे बताया क्यों नहीं?"
पापा बोले— "तेरा सपना था बेटा...
मैं अपनी बीमारी से तेरी उड़ान नहीं रोकना चाहता था।" 
मैं रो पड़ी।
"लेकिन मैं आपकी बेटी हूँ पापा..." उन्होंने मुस्कुराकर कहा—
"इसलिए तो नहीं बताया।"

 

मैंने इलाज शुरू करवाया।
लेकिन कुछ महीनों में हालात और खराब हो गए।
पापा को बार-बार अस्पताल ले जाना पड़ता।
माँ दिन-रात उनकी सेवा करतीं।
और मेरी छोटी बहन मीरा...
उसने अपनी पढ़ाई छोड़कर नौकरी कर ली।
एक रात मैंने उसे रसोई में अकेले रोते देखा।
मैंने पूछा— "मीरा, क्या हुआ?"
वह बोली— "दीदी... कुछ नहीं।"
मैंने उसका हाथ पकड़ा। वह फूट पड़ी।
"आप विदेश चली जाओगी तो माँ-पापा का क्या होगा?"
मैं कुछ नहीं बोल पाई।

 
अगले दिन कंपनी से ईमेल आया।
"Your joining date is confirmed."
मैंने लैपटॉप बंद कर दिया।
लेकिन उसी शाम डॉक्टर ने कहा—
"आपके पिता को लंबे समय तक नियमित देखभाल की जरूरत होगी।"
उस रात मैं पापा के पास बैठी थी। वह सो रहे थे।
उनके चेहरे पर उम्र अचानक बहुत ज्यादा दिखाई दे रही थी।
मैंने उनके हाथ को छुआ।वही हाथ...
जिसने बचपन में मेरा स्कूल बैग उठाया था।वही हाथ...
जिसने मेरी पहली फीस भरी थी।वही हाथ...
जिसने मेरी पढ़ाई के लिए अपनी मोटरसाइकिल बेच दी थी।
और आज...वही हाथ कांप रहा था।
मैंने उनका हाथ अपने माथे से लगा लिया।
और पहली बार मन में सवाल आया—
"अगर मैं आज चली गई... तो क्या मैं जिंदगी भर खुद को माफ कर पाऊँगी?"
---
सुबह मैंने कंपनी को फोन किया।
मैंने कहा—
"मैं ज्वाइन नहीं कर पाऊँगी।"
उधर से आवाज आई—
"क्या आप समझती हैं कि आप क्या छोड़ रही हैं?"
मैंने कहा— "हाँ।"
"आपका पैकेज 2 करोड़ रुपये सालाना है।"
मैंने आँखें बंद कर लीं।
"मुझे पता है।"
"आपको ऐसा अवसर शायद दोबारा न मिले।"
मेरी आँखों से आँसू निकल आए।
मैंने कहा—
"शायद नौकरी दोबारा न मिले... लेकिन मेरे पिता भी दोबारा नहीं मिलेंगे।"
और मैंने फोन काट दिया।
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मैंने पापा को यह बात नहीं बताई।
लेकिन उन्हें किसी तरह पता चल गया।
शाम को उन्होंने मुझे अपने पास बुलाया।
बहुत देर तक चुप रहे।
फिर बोले—" तूने नौकरी छोड़ दी?"
मैंने सिर झुका लिया।
उन्होंने पूछा—"क्यों?"
मैंने कहा—"आपके लिए।"
पापा ने पहली बार मुझे जोर से डाँटा।
"मेरे लिए अपनी जिंदगी मत बर्बाद कर!"
मैं रोते हुए बोली—
"आपने मेरी जिंदगी बनाई है पापा... अब अगर आपकी जरूरत के समय मैं 
आपके साथ नहीं रहूंगी तो मेरी पढ़ाई, मेरी नौकरी, 
मेरे करोड़ों रुपये... सब किस काम के?" पापा कुछ नहीं बोले।
उन्होंने बस अपना चेहरा दूसरी तरफ कर लिया।
फिर मैंने देखा...उनकी आँखों से आँसू गिर रहे थे।
वह आदमी... जिसने पूरी जिंदगी हमारे सामने कभी आँसू नहीं बहाए थे...
उस दिन मेरी वजह से रो रहा था।
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कुछ महीनों बाद मैंने घर के पास एक छोटी-सी लाइब्रेरी शुरू की।
पापा रोज वहाँ कुर्सी पर बैठते।
मैं बच्चों को पढ़ाती।
शुरुआत में पाँच बच्चे आए।
फिर दस।,फिर तीस।
फिर आसपास के गरीब बच्चों की लाइन लगने लगी।
एक बच्ची रोज लाइब्रेरी के बाहर खड़ी रहती थी।
मैंने पूछा—
"अंदर क्यों नहीं आती?"
वह बोली—

"दीदी... मेरे पास फीस नहीं है।"
मैंने उसका हाथ पकड़कर कहा—
"यहाँ किसी से फीस नहीं ली जाती।"
वह अंदर आई।
कुछ साल बाद...
उसी बच्ची का सरकारी मेडिकल कॉलेज में चयन हुआ।
वह मिठाई लेकर मेरे घर आई।
मेरे पैरों पर गिर गई।
और बोली—
"दीदी... आपने उस दिन मुझे किताब नहीं दी थी..."
मैंने पूछा—
"फिर?"
वह रोते हुए बोली—
"आपने मुझे जिंदगी दी थी।"
मैं उसे गले लगाकर रो पड़ी।
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आज पापा इस दुनिया में नहीं हैं।
उनके जाने के बाद मैंने उनकी पुरानी साइकिल संभालकर रख ली।
हर साल उनकी पुण्यतिथि पर मैं उसी साइकिल पर फूल रखती हूँ।
मेरी माँ आज भी लाइब्रेरी में बच्चों के लिए खाना बनाती हैं।
और मीरा... आज उसी लाइब्रेरी की मैनेजर है।
कुछ दिन पहले एक बच्चा मेरी डिग्री देखकर पूछ बैठा—
"दीदी, आपने इतनी बड़ी नौकरी क्यों छोड़ दी?"

मैंने उसकी तरफ देखा। फिर पापा की तस्वीर की तरफ।
और कहाः "क्योंकि बेटा... दुनिया में कुछ चीजों की कीमत पैसे से नहीं लगाई जा सकती।"
वह बोला— "जैसे?" मैंने मुस्कुराकर कहा— "माँ-बाप का हाथ।"
आज भी मेरे पास उस कंपनी का ऑफर लेटर रखा है।
कभी-कभी उसे निकालकर देखती हूँ। 2 करोड़ रुपये... एक शानदार जिंदगी...

विदेश...बड़ी गाड़ी...बड़ा घर...
सब कुछ उस कागज पर लिखा था।
लेकिन उस कागज के नीचे...
मेरे पिता की कांपती हुई उंगलियों का एहसास नहीं था।
मेरी माँ की सूनी आँखें नहीं थीं।
मेरी बहन के आँसू नहीं थे।
और मेरे घर की वह छोटी-सी दुनिया नहीं थी...
जिसने मुझे "मैं" से "मैं कौन हूँ" तक पहुँचाया था।
इसलिए आज मैं गरीब नहीं हूँ।
मेरे पास करोड़ों रुपये नहीं हैं...

लेकिन मेरे पास हर उस बच्चे की दुआ है, जिसने मेरी लाइब्रेरी से किताब लेकर
अपना भविष्य बनाया। 
और शायद...
इंसान की असली कमाई बैंक में नहीं, लोगों की दुआओं में जमा होती है।
अगर आज मुझे फिर वही ऑफर मिले...
तो शायद मैं फिर वही करूँगी।
क्योंकि नौकरी छोड़ने का दर्द कुछ साल रहता...
लेकिन माँ-बाप के आखिरी समय में उनके साथ न होने का दर्द...
पूरी जिंदगी रहता है।
कुछ बेटियाँ घर से विदा होकर पराई हो जाती हैं...
लेकिन कुछ बेटियाँ शादी या नौकरी से पहले ही तय कर लेती हैं कि
उनके माँ-बाप कभी अकेले नहीं होंगे। 
और ऐसी बेटियाँ...सिर्फ घर नहीं संभालतीं।
वे अपने माता-पिता की पूरी जिंदगी का कर्ज अपनी मुस्कान से चुका देती हैं।


-- वंदना त्रिपाठी 

Sunday, August 30, 2026

814 सुंदर और लुभावना रूप होते हुए भी यदि मनुष्य में अवगुण हैं

एक बादशाह ने दो गुलाम खरीदे। उनमें से एक दिखने में बहुत सुंदर था और दूसरा काफी बदसूरत। बादशाह ने पहले (सुंदर) गुलाम को बातचीत के लिए बुलाया। 




उससे बात करके बादशाह को महसूस हुआ कि वह गुलाम बुद्धिमान और मृदुभाषी है। बादशाह ने उसे वापस भेज दिया और फिर दूसरे गुलाम को बुलाया।

गुणों की परख

बादशाह दूसरे गुलाम के रंग-रूप को देखकर खुश नहीं हुआ, लेकिन उसने उसकी योग्यता और गुणों को परखने का निर्णय लिया। 

बादशाह ने उससे कहा— "तुमसे पहले जो गुलाम आया था, वह तुम्हारी बहुत बुराई कर रहा था। लेकिन तुम्हें देखकर उसकी बातों पर यकीन नहीं होता। 
खैर, तुम ही अपने बारे में कुछ बताओ।"

गुलाम ने विनम्रता से उत्तर दिया— "यदि उसने मेरे बारे में कुछ कहा है, तो सच ही कहा होगा। हो सकता है, जो दोष उसने मुझमें बताए हैं, 
वे मुझे खुद न दिखते हों।"
उसकी बात सुनकर बादशाह ने फिर कहा— "मैं चाहता हूँ कि तुम भी उसकी कमियों के बारे में कुछ बताओ।"

गुलाम बोला— "वह बड़ा सच्चा इंसान है। उसमें सादगी और सच्चाई है। वह बहादुर भी है और उससे ज्यादा भला इंसान मैंने आज तक नहीं देखा।"
बादशाह ने उसे बाहर भेज दिया और सोचा कि क्यों न पहले गुलाम की भी इसी तरह परीक्षा ली जाए।

अहंकार का पर्दाफाश

बादशाह ने पहले गुलाम को दोबारा बुलाकर कहा— "अभी जो गुलाम यहाँ से गया है, वह तो तुम्हारी बहुत बुराई कर रहा था। 
यदि मैं उसकी बातों पर ध्यान दूँ, तो तुम्हें इसी समय महल छोड़कर चले जाना चाहिए।"
यह सुनते ही सुंदर गुलाम चिढ़ गया और क्रोध में बोला— "उस बदसूरत इंसान ने जो कुछ मेरे बारे में कहा है, वह गलत है। उसे अच्छे-बुरे की परख ही कहाँ है!" 
वह लगातार अपशब्द बोलता रहा।

बादशाह का निर्णय

बादशाह ने उसकी कड़वी बातें सुनकर कहा— "उसका तो सिर्फ रंग-रूप ही बुरा है, लेकिन तुम्हारा तो मन कुरूप है। आज से मैं तुम्हें उसका अधीनस्थ (उसके नीचे काम करने वाला)
गुलाम बनाता हूँ।"

यह सुनकर वह गुलाम समझ गया कि यह बादशाह की परीक्षा थी, जिसमें वह असफल रहा। उसने अपनी गलती मानी और बादशाह से माफी माँगी।

🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
:सीख: 
सुंदर और लुभावना रूप होते हुए भी यदि मनुष्य में अवगुण हैं, 
तो उसे सम्मान नहीं मिल सकता। इसके विपरीत, यदि रूप साधारण हो पर चरित्र श्रेष्ठ हो, 
तो वह मनुष्य सदैव आदर का पात्र होता है

Friday, August 28, 2026

813 ...ये अवसाद भी न क्या कुत्ती चीज है

सन्नाटा



ये अवसाद भी न 
क्या कुत्ती चीज है

अवसाद , सन्नाटा .. 
अधजगी रातें

कान में बजती अनगिनत बेगैरत आवाज़ें
और टूटता तिलिस्म

कविता 
हमेशा कविता नहीं होती है

वह suicide note लिखने का अभ्यास भी हो सकती है

या ऱोज जीते - जी मरने का 
हलफ़नामा भी

कुछ कह भी तो नहीं
कह सकते

-दिग्विजय

Sunday, August 23, 2026

811 ..धागे कच्चे हैं मगर, लेकिन पक्की प्रीत।

रक्षा बंधन पर अशेष शुभकामनाएं



राखी कह या श्रावणी, पावन यह  त्यौहार  
कच्चे धागों से बंधा ,भाई बहन का प्यार।।

थाली लेकर शगुन की,बहन सजाये भोर।
रोली से टीका किया, बाँधी रेशम डोर।।

रेशम की ये डोरियाँ , कच्चे धागे चार।
सच्चा रिश्ता प्रीत का, निश्छल पावन प्यार।।

धागे कच्चे हैं मगर, लेकिन पक्की प्रीत।
बहना से भाई कहे, हम बचपन के मीत।।

राखी का त्यौहार यह, बाँटे केवल नेह।

बेटी चल ससुराल से , आई बाबुल गेह।।
देते जो कुर्बानियां , होते हैं जाँबाज।

बाँधो उनको राखियाँ ,रखते हैं जो लाज।।
एक वचन मैं माँगती, भैया तुमसे आज।

रक्षा कर माँ बाप की, रखना कुल की लाज।।
देती हूँ भैया वचन, मैं भी तुमको आज।

सास ससुर माँ बाप सम, समझ करूँगी
कच्चे धागों से बंधा ,भाई बहन का प्यार।। 

हरियाली चहुं ओर है, धरा किया श्रृंगार
रहे मुबारक आपको ये राखी का त्यौहार

-रचनाकार अज्ञात

Saturday, August 22, 2026

809 .. उसने पूछा - मैं क्या हूँ तुम्हारी ?

मातृभाषा -

उसने पूछा - मैं क्या हूँ तुम्हारी ? 
मैंने कहा -  मातृभाषा   ! 
- हिंदी दिवस पर 

सबसे ख़ूबसूरत -
वह सबसे ख़ूबसूरत 
कलाकृति है 
सृष्टि की ! 

चुप होना ! -
उसका चुप होना 
लगता है मानो 
धरती का रुक जाना ! 

रंग सी है -
वह ज़िन्दगी के 
कैनवास में 
ख़ुशी के एक रंग सी है ! 

उसकी बातें -
उसकी बातें 
सरस लोकगीत के 
मानिन्द लगती है ! 




क्षितिज तक -
मै तुम्हारे साथ क्षितिज के 
उस ओर जाना चाहता हूँ 
या न्यूनतम क्षितिज तक 
क्षितिज मतलब 
जहाँ धरती और आकाश 
मिले हुए होते है 
या प्रतीत होते है 

-मनीष के. सिंह

https://kalpkatha.blogspot.com/




Wednesday, August 19, 2026

810 निर्माण सीखने की बजाय दरारों की समझ नें रुचि लेने वाली बेटी

 दरार ..... महेन्द्र मद्धेशिया



रसोई में बर्तन समेटते हुए बेटी से पूछाः कॉलेज का फार्म भर दिया?

"हां"

'कौन सा कोर्स चुना'

"लॉ"

कविता के हाथ ठिठक गए, मां ने हैरानी से बेटी की ओर देखा

तुम तो इंजीयरिग करना चाहती थी न ..

चाहती तो थी मां पर अब कानून पढ़ूंगी

"अचानक"

बेटी ने पानी का गिलास मेज पर रक्खा पानी की सतह में हलकी सी लहर उठी और पल भर में थम गई
अचानक नहीं ..धीरे-धीरे
समझी नहीं?

जब बुआ को दहेज के कारण घर छोड़ना पड़ा ...मां चुप रही

फिर जब पड़ोस वाली दीदी ने न्याय की गुहार लगाई और लोगों ने दोषियां पर नही उन्हीं के चरित्र पर सवाल उठाए तभी तह कर लिया कि अब कानून ही पढ़ना है
कुछ देर बाद कविता ने धीमे से पूछा तो ...कानून पढ़कर क्या करोगी

बेटी मुस्कुराई..
दरार गिनने से क्या होगा मां, मैं उन दीवारों के तह तक पहुंचना चाहती हूं जहां से ये दरारें शुरू होती है

निर्माण सीखने की बजाय दरारों की समझ नें रुचि लेने वाली बेटी ने मां को आश्चर्य में डाल दिया

Thursday, August 13, 2026

साहस व सपनों का साथ

 * विश्वास *

उच्च शिक्षा के लिए मां अपनी बेटी को दूसरे शहर भेज रही थी।
दोनों ट्रेन की प्रतीक्षा कर रही थी
प्रज्ञा ने मां का हाथ थाम कर धीरे से पूछा
मां अगर मैं सफल होकर नहीं लौटी तो  ?
 

मां मुस्कुराई और बोली मंजिल मिले ना मिले बस 
अपने सपनों का साथ मत छोड़ना, मुझे तेरी सफलता से अधिक 
तेरे साहस पर भरोसा है ...

इतने में ट्रेन प्लेटफार्म पर आ लगी, प्रज्ञा  ने मां को गले लगाया,
मां की साहस भरी सीख प्रज्ञा के मन में  विश्वास बन कर उतर चुकी थी
ट्रेन आगे बढ़ी दोनों की मुस्कान कह रही थी अब डर नहीं, 

साहस व सपनों के साथ सफर पर निकल पड़ा था

 - वाणी भारद्वाज  

Wednesday, August 12, 2026

807 ...किशोरी ने बिना कुछ कहे इंसानियत कि सलीका सिखा दिया

 सलीका 

मूसलाधार बारिश ने पूरे शहर को थाम रक्खा था. 
दिया अपने माता-पिता के साथ काफी शाप मे बैठी थी. तभी बाहर डांटने की 
आवाज सुनकर वह कांच के पास पहुंची. 


एक वृद्ध महिला शेड के नीचे बारिश से बचने की कोशिश कर रही थी
और ठंड से कांप भी रही थी, चौकीदार उसे हटने को कह रहा था,
दिया अपना छाता और काफी का कप लेकर बाहर पहुंची
और मुस्कुराते हुए कहा अम्मा ये छाता रख लीजिये,
और थोड़ा काफी पी लीजिए.
वृद्धा की नम आंखें और चौकीदार की झुकी नजरे बता रही थी कि 
उस किशोरी ने बिना कुछ कहे इंसानियत कि सलीका सिखा दिया

बिना कुछ कहे इंसानियत कि सलीका सिखा दिया

-ऋतु मिश्रा