कस्तूरी- कल्पना पाण्डे
वो अब भी पुरवाई सा छूकर गुजर जाता है.
मै स्तब्ध रही, वो निशब्द रहा
वो मौन बन कर मेरे भीतर अब भी समाहित है.
वो जो अनकहा रह गया,सुलग रहा उर-अंदर
न उग्र होता है और न शांत होता है.
बस रह-रह कर शोर बन कर गूंजता है.
वो शोर मृदंग मद्धम थाप बन
उधार का राहत दे जाता है
एक अरसे से उसे भूल जाने की नाकाम ज़िद में हूं।
कस्तूरी-मृग-सी बेचैन रही हूँ
अपनी ही कस्तूरी की महक से वंचित
-अनकही, प्रतिज्ञान , पृष्ठ 14

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में शुक्रवार 06 नवंबर, 2026 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
ReplyDelete