Friday, August 28, 2026

813 ...ये अवसाद भी न क्या कुत्ती चीज है

सन्नाटा



ये अवसाद भी न 
क्या कुत्ती चीज है

अवसाद , सन्नाटा .. 
अधजगी रातें

कान में बजती अनगिनत बेगैरत आवाज़ें
और टूटता तिलिस्म

कविता 
हमेशा कविता नहीं होती है

वह suicide note लिखने का अभ्यास भी हो सकती है

या ऱोज जीते - जी मरने का 
हलफ़नामा भी

कुछ कह भी तो नहीं
कह सकते

-दिग्विजय

Sunday, August 23, 2026

811 ..धागे कच्चे हैं मगर, लेकिन पक्की प्रीत।

रक्षा बंधन पर अशेष शुभकामनाएं



राखी कह या श्रावणी, पावन यह  त्यौहार  
कच्चे धागों से बंधा ,भाई बहन का प्यार।।

थाली लेकर शगुन की,बहन सजाये भोर।
रोली से टीका किया, बाँधी रेशम डोर।।

रेशम की ये डोरियाँ , कच्चे धागे चार।
सच्चा रिश्ता प्रीत का, निश्छल पावन प्यार।।

धागे कच्चे हैं मगर, लेकिन पक्की प्रीत।
बहना से भाई कहे, हम बचपन के मीत।।

राखी का त्यौहार यह, बाँटे केवल नेह।

बेटी चल ससुराल से , आई बाबुल गेह।।
देते जो कुर्बानियां , होते हैं जाँबाज।

बाँधो उनको राखियाँ ,रखते हैं जो लाज।।
एक वचन मैं माँगती, भैया तुमसे आज।

रक्षा कर माँ बाप की, रखना कुल की लाज।।
देती हूँ भैया वचन, मैं भी तुमको आज।

सास ससुर माँ बाप सम, समझ करूँगी
कच्चे धागों से बंधा ,भाई बहन का प्यार।। 

हरियाली चहुं ओर है, धरा किया श्रृंगार
रहे मुबारक आपको ये राखी का त्यौहार

-रचनाकार अज्ञात

Saturday, August 22, 2026

809 .. उसने पूछा - मैं क्या हूँ तुम्हारी ?

मातृभाषा -

उसने पूछा - मैं क्या हूँ तुम्हारी ? 
मैंने कहा -  मातृभाषा   ! 
- हिंदी दिवस पर 

सबसे ख़ूबसूरत -
वह सबसे ख़ूबसूरत 
कलाकृति है 
सृष्टि की ! 

चुप होना ! -
उसका चुप होना 
लगता है मानो 
धरती का रुक जाना ! 

रंग सी है -
वह ज़िन्दगी के 
कैनवास में 
ख़ुशी के एक रंग सी है ! 

उसकी बातें -
उसकी बातें 
सरस लोकगीत के 
मानिन्द लगती है ! 




क्षितिज तक -
मै तुम्हारे साथ क्षितिज के 
उस ओर जाना चाहता हूँ 
या न्यूनतम क्षितिज तक 
क्षितिज मतलब 
जहाँ धरती और आकाश 
मिले हुए होते है 
या प्रतीत होते है 

-मनीष के. सिंह

https://kalpkatha.blogspot.com/




Wednesday, August 19, 2026

810 निर्माण सीखने की बजाय दरारों की समझ नें रुचि लेने वाली बेटी

 दरार ..... महेन्द्र मद्धेशिया



रसोई में बर्तन समेटते हुए बेटी से पूछाः कॉलेज का फार्म भर दिया?

"हां"

'कौन सा कोर्स चुना'

"लॉ"

कविता के हाथ ठिठक गए, मां ने हैरानी से बेटी की ओर देखा

तुम तो इंजीयरिग करना चाहती थी न ..

चाहती तो थी मां पर अब कानून पढ़ूंगी

"अचानक"

बेटी ने पानी का गिलास मेज पर रक्खा पानी की सतह में हलकी सी लहर उठी और पल भर में थम गई
अचानक नहीं ..धीरे-धीरे
समझी नहीं?

जब बुआ को दहेज के कारण घर छोड़ना पड़ा ...मां चुप रही

फिर जब पड़ोस वाली दीदी ने न्याय की गुहार लगाई और लोगों ने दोषियां पर नही उन्हीं के चरित्र पर सवाल उठाए तभी तह कर लिया कि अब कानून ही पढ़ना है
कुछ देर बाद कविता ने धीमे से पूछा तो ...कानून पढ़कर क्या करोगी

बेटी मुस्कुराई..
दरार गिनने से क्या होगा मां, मैं उन दीवारों के तह तक पहुंचना चाहती हूं जहां से ये दरारें शुरू होती है

निर्माण सीखने की बजाय दरारों की समझ नें रुचि लेने वाली बेटी ने मां को आश्चर्य में डाल दिया

Thursday, August 13, 2026

साहस व सपनों का साथ

 विश्वास *

उच्च शिक्षा के लिए मां अपनी बेटी को दूसरे शहर भेज रही थी।
दोनों ट्रेन की प्रतीक्षा कर रही थी
प्रज्ञा ने मां का हाथ थाम कर धीरे से पूछा
मां अगर मैं सफल होकर नहीं लौटी तो  ?
 

मां मुस्कुराई और बोली मंजिल मिले ना मिले बस 
अपने सपनों का साथ मत छोड़ना, मुझे तेरी सफलता से अधिक 
तेरे साहस पर भरोसा है ...

इतने में ट्रेन प्लेटफार्म पर आ लगी, प्रज्ञा  ने मां को गले लगाया,
मां की साहस भरी सीख प्रज्ञा के मन में  विश्वास बन कर उतर चुकी थी
ट्रेन आगे बढ़ी दोनों की मुस्कान कह रही थी अब डर नहीं, 

साहस व सपनों के साथ सफर पर निकल पड़ा था

 - वाणी भारद्वाज  

Wednesday, August 12, 2026

807 ...किशोरी ने बिना कुछ कहे इंसानियत कि सलीका सिखा दिया

 सलीका 

मूसलाधार बारिश ने पूरे शहर को थाम रक्खा था. 
दिया अपने माता-पिता के साथ काफी शाप मे बैठी थी. तभी बाहर डांटने की 
आवाज सुनकर वह कांच के पास पहुंची. 


एक वृद्ध महिला शेड के नीचे बारिश से बचने की कोशिश कर रही थी
और ठंड से कांप भी रही थी, चौकीदार उसे हटने को कह रहा था,
दिया अपना छाता और काफी का कप लेकर बाहर पहुंची
और मुस्कुराते हुए कहा अम्मा ये छाता रख लीजिये,
और थोड़ा काफी पी लीजिए.
वृद्धा की नम आंखें और चौकीदार की झुकी नजरे बता रही थी कि 
उस किशोरी ने बिना कुछ कहे इंसानियत कि सलीका सिखा दिया

बिना कुछ कहे इंसानियत कि सलीका सिखा दिया

-ऋतु मिश्रा

Sunday, April 3, 2022

806 कहने का अंदाज देखिए .......बाबू राम प्रधान


सुर के साथ साज देखिए
कहने का अंदाज देखिए

बातों की तह  में  जाकर
दिल में छुपे  राज देखिए

प्यार  में  हुआ था पागल
कैसे गिरी है गाज देखिए
 
कल अहं था आसमाँ पर
पैरो में उसके ताज देखिए

रहा गुनाहगारों की सफ़ में
आज उसके नाज देखिए

नीचे  निगाह ऊँची  उड़ान
घात लगाता  बाज देखिए

जिसके लिए मरे वही मारे
आती नहीं है लाज देखिए
-बाबू राम प्रधान
अल्मोड़ा

Monday, February 7, 2022

805 स्मृतिशेष लता जी गाए दो गीत

 ए दिल-ए नादां (रजिया सुलतान)

आरजू क्या है

ज़ुस्तज़ू क्या है


...................

ओ मेरे प्यार आजा (भूत बंगला)

बनके बहार आजा

हम्म हम्म हम्म

हम्म हम्म हम्म


Sunday, January 30, 2022

803 ...बेहिसाब प्रेम

जो भी करना हिसाब से करना
बेहिसाब किया हुआ कुछ भला नहीं होता
उसने जिससे बेहिसाब प्रेम किया
वह हिसाब का बड़ा पक्का था
उसने प्रेम के हिसाब में
'बे' की वैल्यू शून्य निकाली।
उसके पास बहुत से खाते थे
और हर खाते का पक्का हिसाब भी
वह एक ही खाते में सब बेहिसाब रखकर
कंगाल हो गया।
जब चुक गईं उसकी सारी बेहिसाब बातें
हिसाबदार बोला आओ अब बात करें।
वह सोच में पड़ गया कि हर चीज़
हिसाब से करनी चाहिए कहने वाले ने
क्या कभी कुछ बेहिसाब न किया होगा।
हर बात में कितना वजन रखना है
कितने ग्राम कहना है
यह कोई बेहिसाबी कभी न कर पाएगा।
एक रोज हिसाबदार ने ज़ोर से कहा
या तो हिसाब में रहो या सोच लो।
उस दिन पहली बार उसने हिसाब से दुआ माँगी
जो प्यार न हो तो हम कभी न मिलें।
बेहिसाबी कभी भली नहीं होती
प्रेम में जीना है तो हिसाब से रहो।
उसे फिर भी हिसाब न आया
वो हाशिये पर ही रहा
मुस्कुराता रहा
हिसाब के पक्के लोगों को हिसाब में उलझते देखकर।
इन्दु सिंह


Saturday, January 1, 2022

804 ..दल बदल



आओ-आओ देर न करना।
दल-बदल के काम में।
दल बदलुओं की मण्डी है ,
मत फँस जाना जाम में।

कल मस्त थे जिसके दल में
करने में गुणगान रे
पलभर में छोड़ चले सब
बेच दिया  ईमान रे
आओ - आओ, देर न करना
दल ,बदल के काम में

ऋतुओं जैसे  विचार बदलते
मौसम जैसे वाणी
बसन्त जैसे रूप बदलते
वर्षा में ज्यों पानी

हमने तो मतदान दिया था
तुम बिक गए अब नीलामी में
आओ-आओ देर मत करना,
दल बदल के काम में

जनता तो पढ़ी- लिखी है
तुमको इज्जत सम्मान दिया
अपनी उलझन उलझी तो उलझे
लोकतंत्र का मान दिया

रंग बदलने में आपकी दक्षता
गिरगिट भी शर्मा जाए
नए नए स्वांग रचाते
जातें हैं जब भीड़ में
आओ- आओ देर न करना
दल बदल के काम में

दल -बदलू की मण्डी लगी है
फंस मत जाना जाम में


-विष्णु प्रसाद सेमवाल 'भृगु'
बूढ़ा केदार,
टिहरी गढ़वाल,
उत्तराखंड


Saturday, October 30, 2021

802...ऐसे डाला जाता है चारा ..

ऐसे डाला जाता है चारा ..

बेटा, इस मंगलवार को छुट्टी लेकर
घर आ जाना, कुछ ज़रूरी काम है

अमित बोला मम्मी, ऑफ़िस में बहुत काम है,
बॉस छुट्टी नहीं देगा
राधिका बोली अरे बेटा
वो एक रिश्ता आया था तुम्हारे लिये,
बड़ी ही सुंदर लड़की है,

अमित अरे माँ, बस इतनी सी बात,
तुम कहो और मैं ना आऊँ,
ऐसा हो सकता है भला..???
मन में फूट रहे लड्डूओं की आवाज
छिपाते हुए बेटे जी ने जवाब दिया
सोच रही थी कि एक बार तुम दोनों मिल लेते तो...

बॉस को किसी तरह टोपी पहनाकर,
रात को बेटा घर पहुँचा
माँ ने बेटे से ज़्यादा बात नहीं की,
बस खाना  परोसा और दूसरे दिन
जल्दी उठ जाने को कहा
सुबह के चार बजे तक तो नींद
बेटे की आँखों  से कोसों दूर थी,

माँ ने चाय  देते हुए कहा,
बाथरूम में कपड़े  रखे हैं,
बदलकर आ जाओ
बाथरूम में पुरानी टी-शर्ट
और शॉर्ट्स देखकर
बेटे का दिमाग़ ठनका,
बाहर आकर बेटे ने पूछा पुराने कपड़े ??

माँ ने मनोरम मुस्कान बिखेरते हुए कहा
घर की सफाई का बोलती तो तू
काम का बहाना बनाकर टाल देता,...
बोल….टालता की नहीं…
चल अब जल्दी से ये लंबा वाला झाड़ू उठा

तेरा बाप भी बहाने बना कर
समाज की मीटिंग में गया है
वो भी लड़की की माँ से मिलने के नाम पर आ रहा है
तू तो अभी
दीवार के कोने साफ कर,
बहुत जाले हो गये हैं 
सादर..

Friday, October 29, 2021

801...आप क्यों भावुक हो गए

 

एक 22-23 साल का नौजवान। साधारण सी दिखने वाली शर्ट, पैरों मे सस्ती सी चप्पल, एक जूते के दुकान में घुसा।


"क्या दिखाऊ भैया?" दुकानदार ने पूछा।

"लेडिज के लिए अच्छी सी चप्पल दिखाना जो अंदर से नरम हो एकदम फूल जैसी। अच्छे कंपनी की दिखाना भैया।"

"कौन सी साइज में दिखाऊ भैया?"

मेरे पास माँ के पैर का नाप नहीं है उसके पैर का छाप लाया हू। उस पर से चप्पल दे सकते है क्या?"

दुकानदार को थोड़ा अजीब लगा। "इसके पहले ऐसे किसी को चप्पल दी नहीं किसी को। आप अपनी माँ को ही ले आइए ना। फिर बदली का झंझट नहीं रहेगा।"

"मेरी माँ गाँव मे रहती है। आज तक उसने कभी चप्पल पहनी नहीं। मेरी पढ़ाई पूरी करने के लिए उसने दिन रात मेहनत की। मेरी छोटी सी फीस भरने के लिए लोगों के घर बर्तन मांजे, खेतों मे काम किया। बस इतना ही कहती थी, बेटा पढ़, बड़ा आदमी बन। एक फैक्टरी मे नौकरी लगी है और आज पगार मिली है। उसमे से आज उसके लिए चप्पल लूँगा और अपने हाथ से पहनाऊंगा। देखूँगा उसके आँखों की खुशी। क्या कहेंगी सुनना है मुझे।" इतना कह के उसने वो कागज आगे बढ़ाया। दुकानदार ने देखा, एक मैला सा कागज जिसपे पैरों के निशान बने थे।

दुकानदार की आंखें भर आयी। उसने पैरों के निशानो को छुआ। खुद उठा और एक अच्छी चप्पल निकाल के लाया। ठीक ठाक अंदाजा लगा के उसने निशान के माप की चप्पल उसे दिखाई। लड़के ने चप्पल पसंद की और पैसे देकर जाने लगा।

"रुको बेटा, ये और एक जोड़ी चप्पल लेकर जाना। माँ से कहना, बेटे ने लायी चप्पल खराब हो गई तो दूसरे बेटे ने दिया जोड़ा पहन ले, पर फिर कभी नंगे पाँव मत घूमना।"

लड़के के चेहरे पर एक खुशी झलक रही थी।" ये कागज मेरे पास छोड़ के जा। तूने मेरे माँ की याद दिला दी आज मुझे।"दुकानदार ने लड़के से कागज लिया और अपने पैसों के ड्रावर मे रखा और उस कागज को नमस्कार किया।

दुकान के नौकर देखते रह गए। "उस कागज को गल्ले मे क्यों रखे सेठ?" एक ने पूछा। "अरे, ये सिर्फ पैरों के निशान नहीं, लक्ष्मी के पाँव का छाप है। जिस माँ ने अच्छे संस्कार दे कर अपने बच्चे को बड़ा किया, उसे जीतने की प्रेरणा दी, उसके पैर अपने भी दुकान मे बरकत ले आयेंगे, इसलिए तो उसको तिजोरी में रखा। "
सादर

Thursday, October 28, 2021

800 ..अपेक्षा से भरा हुआ चित्त निश्चित ही दुखी होगा



दुख का कारण
याद रखना, अपेक्षा से भरा हुआ चित्त निश्चित ही दुखी होगा।
मैंने सुना है कि एक आदमी बहुत उदास और दुखी बैठा है। उसकी एक बड़ी होटल है। बहुत चलती हुई होटल है। और एक मित्र उससे पूछता है कि तुम इतने दुखी और उदास क्यों दिखाई पड़ते हो कुछ दिनों से? कुछ धंधे में कठिनाई, अड़चन है? उसने कहा, बहुत अड़चन है। बहुत घाटे में धंधा चल रहा है। मित्र ने कहा, समझ में नहीं आता, क्योंकि इतने मेहमान आते—जाते दिखाई पड़ते हैं! और रोज शाम को जब मैं निकलता हूं तो तुम्हारे दरवाजे पर होटल के तख्ती लगी रहती है नो वेकेंसी को, कि अब और जगह नहीं है, तो धंधा तो बहुत जोर से चल रहा है! उस आदमी ने कहा, तुम्हें कुछ पता नहीं। आज से पंद्रह दिन पहले जब सांझ को हम नो वेकेंसी की तख्ती लटकाते थे, तो उसके बाद कम से कम पचास आदमी और द्वार खटखटाते थे। अब सिर्फ दस पंद्रह ही आते हैं। पचास आदमी लौटते थे पंद्रह दिन पहले; जगह नहीं मिलती थी। अब सिर्फ दस पंद्रह ही लौटते हैं। धंधा बड़ा घाटे में चल रहा है।

मैं एक घर में मेहमान था। गृहिणी ने मुझे कहा कि आप मेरे पति को समझाइए कि इनको हो क्या गया है। बस, निरंतर एक ही चिंता में लगे रहते हैं कि पांच लाख का नुकसान हो गया। पत्नी ने मुझे कहा कि मेरी समझ में नहीं आता कि नुकसान हुआ कैसे! नुकसान नहीं हुआ है। मैंने पति को पूछा। उन्होंने कहा, हुआ है नुकसान, दस लाख का लाभ होने की आशा थी, पांच का ही लाभ हुआ है। नुकसान निश्चित हुआ है। पांच लाख बिलकुल हाथ से गए।

अपेक्षा से भरा हुआ चित्त, लाभ हो तो भी हानि अनुभव करता है। साक्षीभाव से भरा हुआ चित्त, हानि हो तो भी लाभ अनुभव करता है। क्योंकि मैंने कुछ भी नहीं किया, और जितना भी मिल गया, वह भी परमकृपा है, वह भी अस्तित्व का अनुदान है।

-ओशो 

Wednesday, October 27, 2021

799 ...मेरी है हर साँस तुम्हारी। तुम पर ही मैं सब कुछ हारी

सादर अभिवादन
अक्टूबर जा जा जा
जा कर जल्दी से जनवरी को भेज
बच्चें तरस गए, स्कूल देखे
खाना बनाना सीख गए
अब वे सोचते कुछ और सीखें..
रचनाओं पर एक नज़र....



 तुम ढूँढ़ो दुनिया में ईश्वर।
मेरे तो तुम ही ईश्वर हो।

मेरी है हर साँस तुम्हारी।
तुम पर ही मैं सब कुछ हारी।


मुझे बीहड़ में बिठाकर
मेरे सपनें मलबें में तब्दील कर
तुम चाहते हो मेरी कलम से
रंगीन तितलियों की
उन्मुक्त उड़ान मैं लिखूं ?




शूल भरी राहों से तनिक ना घबराते,  
पग छालों में भी आह नहीं निकालते,

संकट में शोंणित और वेगवान रहता,
अपनी विजय पर कभी नहीं इतराते ।

अपने बचपन को याद करता हूँ,
जो अब सिर्फ यादों में बचा है थोड़ा-थोड़ा
और जो अब लौटकर फिर नहीं आनेवाला
पिता कभी-कभार बुदबुदाते हुए याद आते हैं,
साँप गुजर गया और हम लकीर पीटते रहे

बस
सादर


Tuesday, October 26, 2021

798 ..टूटता तिलिस्म कविता हमेशा कविता नहीं होती है

 सादर अभिवादन

आज पता नहीं क्यूं लिंक चुन ली गई मेरे द्वारा
शायद ईश्वर को पता हो
रचनाएँ देखें



विसंगति
कैसी अघोर
कविता कोमल तुम्हारी
किन्तु हृदय
कठोर !

कविता दीदी


आदमी काम से नहीं चिन्ता से जल्दी मरता है
गधा दूसरों की चिन्ता से अपनी जान गंवाता है

धन-सम्पदा चिन्ता और भय अपने साथ लाती है
धीरे-धीरे कई चीजें पकती तो कई सड़ जाती है


चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’


जान चाहेगा नहीं जान सा माना चाहे
चाहिए चाहने देना जो दीवाना चाहे

दिल का दरवाज़ा हमेशा मैं खुला रखता हूँ
कोई आ जाए अगर वाक़ई आना चाहे


चलते-चलते एक समीक्षा


"कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता/
कहीं ज़मीं नहीं मिलती..कहीं आसमां नहीं मिलता"



अवसाद . सन्नाटा .. अधजगी रातें
कान में बजती अनगिनत बेगैरत आवाज़ें
और टूटता तिलिस्म
कविता हमेशा कविता नहीं होती है
वह suicide note लिखने का अभ्यास भी हो सकती है
या ऱोज जीते - जी मरने का हलफ़नामा भी
..
बस
सादर

Sunday, October 24, 2021

797..मां की इक उंगली पकड़कर हंस रहा बचपन मेरा..देवमणि पांडेय


 फूल महके यूं फ़ज़ा में रुत सुहानी मिल गई
दिल में ठहरे एक दरिया को रवानी मिल गई

घर से निकला है पहनकर जिस्म ख़ुशबू का लिबास
लग रहा है गोया इसको रातरानी मिल गई

कुछ परिंदों ने बनाए आशियाने शाख़ पर
गाँव के बूढ़े शजर को फिर जवानी मिल गई

आ गए बादल ज़मीं पर सुनके मिट्टी की सदा
सूखती फ़सलों को पल में ज़िंदगानी मिल गई

जी ये चाहे उम्र भर मैं उसको पढ़ता ही रहूं
याद की खिड़की पे बैठी इक कहानी मिल गई

मां की इक उंगली पकड़कर हंस रहा बचपन मेरा
एक अलबम में वही फोटो पुरानी मिल गई

Thursday, October 21, 2021

796 जीवन का टॉनिक ..प्रस्तुति - शैलेन्द्र किशोर जारूहार



मैं अपने विवाह के बाद. अपनी पत्नी के साथ शहर में रह रहा था।

बहुत साल पहले पिताजी मेरे घर आए थे। मैं उनके साथ सोफे पर बैठा बर्फ जैसा ठंडा जूस पीते हुए अपने पिताजी से विवाह के बाद की व्यस्त जिंदगी, जिम्मेदारियों और उम्मीदों के बारे में अपने ख़यालात का इज़हार कर रहा था और वे अपने गिलास में पड़े बर्फ के टुकड़ों को स्ट्रा से इधर-उधर नचाते हुए बहुत गंभीर और शालीन खामोशी से मुझे सुनते जा रहे थे।
       
अचानक उन्होंने कहा- "अपने दोस्तों को कभी मत भूलना। तुम्हारे दोस्त उम्र के ढलने पर पर तुम्हारे लिए और भी महत्वपूर्ण और ज़रूरी हो जायेंगे। बेशक अपने बच्चों, बच्चों के बच्चों को भरपूर प्यार  देना मगर अपने पुराने, निस्वार्थ और सदा साथ निभानेवाले दोस्तों को हरगिज़ मत भुलाना। वक्त निकाल कर उनके साथ समय ज़रूर बिताना। उनके घर खाना खाने जाना और जब मौक़ा मिले उनको अपने घर खाने पर बुलाना।  
कुछ ना हो सके तो फोन पर ही जब-तब, हालचाल पूछ लिया करना।"      

मैं नए-नए विवाहित जीवन की खुमारी में था और पिताजी मुझे यारी-दोस्ती के फलसफे समझा रहे थे।

मैंने सोचा-  "क्या जूस में भी नशा होता है जो पिताजी बिन पिए बहकी-बहकी बातें करने लगे? आखिर मैं अब बड़ा हो चुका हूँ, मेरी पत्नी और मेरा होने वाला परिवार मेरे लिए जीवन का मकसद और सब कुछ है।

दोस्तों का क्या मैं अचार डालूँगा?"
लेकिन फ़िर भी मैंने आगे चलकर एक सीमा तक उनकी बात माननी जारी रखी।
मैं अपने गिने-चुने दोस्तों के संपर्क में लगातार रहा।

समय का पहिया घूमता रहा और मुझे अहसास होने लगा कि उस दिन पिता 'जूस के नशे' में नहीं थे बल्कि उम्र के खरे तजुर्बे  मुझे समझा रहे थे।  

उनको मालूम था कि उम्र के आख़िरी दौर तक ज़िन्दगी क्या और कैसे करवट बदलती है।    

हकीकत में ज़िन्दगी के बड़े-से-बड़े तूफानों में दोस्त कभी नाव बनकर, कभी पतवार बनकर तो कभी मल्लाह बनकर साथ निभाते हैं और कभी वे आपके साथ ही ज़िन्दगी की जंग में कूद पड़ते हैं। सच्चे दोस्तों का काम एक ही होता है- दोस्ती निभाना।

ज़िन्दगी के पचास साल बीत जाने के बाद मुझे पता चलने लगा कि घड़ी की सुइयाँ पूरा चक्कर लगाकर वहीं पहुँच गयीं हैं जहाँ से मैंने जिंदगी शुरू की थी।  

विवाह होने से पहले मेरे पास सिर्फ दोस्त थे।


विवाह के बाद बच्चे हुए।

बच्चे बड़े हो हुए। उनकी जिम्मेदारियां निभाते-निभाते मैं बूढ़ा हो चला।

बच्चों के विवाह हो गए और उनके अलग परिवार और घर बन गए।

बेटियाँ अपनी जिम्मेदारियों में व्यस्त हो गयीं।
उसके बाद उनकी रुचियाँ, मित्र-मंडलियाँ और जिंदगी अलग पटरी पर चलने लगीं।

अपने घर में मैं और मेरी पत्नी ही रह गए।
वक्त बीतता रहा।
नौकरी का भी अंत आ गया।
साथी-सहयोगी और प्रतिद्वंद्वी मुझे बहुत जल्दी भूल गए।

जो मालिक कभी छुट्टी मांगने पर मेरी मौजूदगी को कम्पनी के लिए जीने-मरने का सवाल बताता था, वह मुझे यूं भूल गया जैसे मैं कभी वहाँ काम करता ही नहीं था।

एक चीज़ कभी नहीं बदली- मेरे मुठ्ठी-भर पुराने दोस्त।

मेरी दोस्ती न तो कभी बूढ़ी हुई न ही रिटायर।

आज भी जब मैं अपने दोस्तों के साथ होता हूँ, लगता है अभी तो मैं जवान हूँ और मुझे अभी बहुत साल और ज़िंदा रहना चाहिए।  

सच्चे दोस्त जिन्दगी की ज़रुरत हैं, कम ही सही कुछ दोस्तों का साथ हमेशा रखिये।        

वे कितने भी अटपटे, गैरजिम्मेदार, बेहूदे और कम अक्ल क्यों ना हों, ज़िन्दगी के खराब वक्त में उनसे बड़ा योद्धा और चिकित्सक मिलना नामुमकिन है।

अच्छा दोस्त दूर हो चाहे पास हो, आपके दिल में धड़कता है।

सच्चे दोस्त उम्र भर साथ रखिये और हर कीमत पर यारियां बचाइये।
(ये है तो व्हाट्सएप्प आलेख पर इसे आलेख करे रूप में ढाला है
श्री शैलेन्द्र किशोर जारूहार जी ने)


Wednesday, October 20, 2021

795..संग-रेज़ो के सिवा कुछ तिरे दामन में नहीं ....शाहिद कबीर



 नींद से आँख खुली है अभी देखा क्या है
देख लेना अभी कुछ देर में दुनिया क्या है

बाँध रक्खा है किसी सोच ने घर से हम को

वर्ना अपना दर-ओ-दीवार से रिश्ता क्या है

रेत की ईंट की पत्थर की हो या मिट्टी की
किसी दीवार के साए का भरोसा क्या है

घेर कर मुझ को भी लटका दिया मस्लूब के साथ
मैं ने लोगों से ये पूछा था कि क़िस्सा क्या है

संग-रेज़ो के सिवा कुछ तिरे दामन में नहीं
क्या समझ कर तू लपकता है उठाता क्या है

अपनी दानिस्त में समझे कोई दुनिया 'शाहिद'
वर्ना हाथों में लकीरों के अलावा क्या है
-शाहिद कबीर 

Monday, October 18, 2021

794 ..गिरा हुआ आदमी ....गजेन्द्र भट्ट


सेठ गणपत दयाल के घर के दरवाजे के पास दीनू जाटव जैसे ही पहुँचा, उसने मकान के भीतर से आ रही रोने की आवाज़ सुनी। ठिठक कर वह वहीं रुक गया। कुछ रुपयों की मदद की उम्मीद लेकर वह यहाँ आया था। उसकी जानकारी में था कि सेठ जी आज घर पर अकेले हैं, क्योंकि सेठानी जी अपने बेटी को लेने उसके ससुराल गई हुई थीं। वह लौटने लगा यह सोच कर कि शायद सेठानी जी बेटी-नातिन को ले कर वापस आ गई होंगी, बाद में आना ही ठीक रहेगा। पाँच-सात कदम ही चला होगा कि दबी-दबी सी एक चीख उसे सुनाई दी। सड़क के दूसरी तरफ बैठा एक कुत्ता भी उसी समय रोने लगा था। किसी अनहोनी की आशंका से वह घबरा गया और वापस गणपत दयाल के घर की तरफ लौटा।

'किसकी चीख हो सकती है यह? सेठ जी की नातिन अगर आई हुई है तो भी वह चीखी क्यों होगी? क्या करूँ मैं?', पशोपेश में पड़ा दीनू दरवाजे के पास आकर रुक गया। तभी भीतर से फिर एक चीख के साथ किसी के रोने की आवाज़ आई। अब वह रुक नहीं सका। उसने निश्चय किया कि पता तो करना ही चाहिए, आखिर माज़रा क्या है! हल्का सा प्रहार करते ही दरवाजा खुल गया। दरवाजा भीतर से बन्द किया हुआ नहीं था। भीतर आया तो बायीं ओर के कमरे से आ रही किसी के रोने की आवाज़ और उसे चुप कराने के लिए धीमे स्वर में किसी के द्वारा धमकाये जाने की आवाज़ भी उसने सुनी। उसे लगा कि यह आवाज़ सेठ जी की ही हो सकती है।


स्तम्भित था दीनू! समझ नहीं पा रहा था कि क्या करे वह! 'सेठ जी अपनी रोती-चीखती नातिन को तो यूँ धमका नहीं सकते।' -सहमा-सहमा वह कमरे के पास आया। भीतर से आ रही आवाज़ अब साफ सुनाई दे रही थी।

"रोना-चीखना बन्द कर! तू खुद ही आई है यहाँ। शोर मचाएगी तो तेरी ही बदनामी होगी। चुपचाप पड़ी रह।" -गणपत दयाल कह रहे थे।

"अंकल, मैंने बताया न आपको। मम्मी-पापा ने हाट में जाते समय कहा था कि घर पर अकेली मत रहना, गणपत चाचा के वहाँ चली जाना, इसलिए आई थी मैं। मुझे छोड़ दो, जाने दो प्लीज़!" -डरी-डरी यह आवाज़ किसी लड़की की थी।

अब सब्र नहीं कर सका दीनू! उसने जोर-से दरवाजे को धक्का दिया। दीनू की आशा के विपरीत दरवाजा तुरंत खुल गया। यह दरवाजा भी भीतर से बंद नहीं था।

 "कौन है बे?'-लड़की पर झुके गणपत दयाल हड़बड़ा कर खड़े हो गये।

"मैं दीनू! यह क्या कर रहे हो सेठ जी?"

"अरे, तू भीतर कैसे आ गया? बाहर का दरवाजा तो बंद था। कैसे खोला तूने?"- गणपत दयाल ने घबराहट पर काबू पाने की कोशिश की।

"दरवाजा भीतर से बन्द नहीं था। मैंने खटखटाने के लिए हाथ मारा तो खुल गया।" -दीनू ने जवाब दिया। कहते-कहते उसकी नज़र सामने पलंग पर पड़ी। एक लड़की आधे-अधूरे कपड़ों में पलंग पर लेटी मुँह पर हाथ धरे सिसक रही थी। उसका फ्रॉक पलंग पर ही एक तरफ पड़ा था। लड़की दीनू को देख कर पलंग पर उठ बैठी, कातर स्वर में उसके मुख से निकला - "दीनू काका..."

दीनू चौंका, वह गणपत दयाल के रिश्तेदार की चौदह वर्षीय बेटी आशा थी, जिनका घर सेठ जी के घर से तीन मकान की दूरी पर ही था।

"छिः सेठ जी, आपकी रिश्तेदार है यह! आपकी नातिन की उमर की बच्ची है! कुछ तो शरम करते!" -दीनू ने गणपत दयाल की ओर घृणा भरी नज़रों से देखा।

गणपत दयाल ने नहीं सोचा था कि एक छोटी जात का आदमी इतनी हिम्मत कर लेगा। उन्हें आश्चर्य व अफ़सोस भी हो रहा था कि वह बाहरी दरवाजा भीतर से बन्द करना भूल कैसे गए थे।

गाँव में उनका बहुत रुतबा था। कई लोग उनके कर्ज से दबे हुए थे। उन्हें भरोसा था कि दीनू तो एक मामूली गरीब चमार है, डपटने और लालच देने पर चुपचाप सिर झुका कर लौट जाएगा, सो गरज कर बोले- "तेरी इतनी हिम्मत! जा, भाग जा यहाँ से।... और खबरदार, किसी से कुछ बोला तो।" -उन्होंने जेब से सौ रुपये का एक नोट निकाल कर उसकी तरफ फेंका।

"सेठ जी, गरीब हूँ, पर इतना बेगैरत नहीं कि एक कागज़ के टुकड़े पर ईमान बेच दूँ। आप इस बच्ची को जाने दो यहाँ से।"

"अबे स्साले, चमार होकर जबान लड़ाता है।" -दीनू के मुँह पर थप्पड़ जड़ते हुए गणपत दयाल दहाड़े।

 दीनू सेठ जी की बहुत इज़्ज़त करता था और अपनी औक़ात से भी अनजान नहीं था। कई बार वह उनसे छिट-पुट मदद लिया करता था और बदले में कोई सेवा वह बताते, तो कर देता था।... लेकिन आज वह इस बड़े आदमी का असली रूप देख कर अपना आपा खो बैठा, बिफर कर बोला- "चमार हूँ, गरीब हूँ, मगर आपके जितना गिरा हुआ आदमी नहीं हूँ।"

इसके पहले कि गणपत दयाल कुछ सोच-समझ पाते, दीनू ने झपट कर उनकी कमर कस कर पकड़ ली और उन्हें पीछे धकेलते हुए आशा से कहा- "जाओ बिटिया, निकल जाओ यहाँ से।"

आशा ने पलंग से अपना फ्रॉक उठाया और कमरे से निकल भागी।

किंकर्तव्यविमूढ़ गणपत दयाल अब कुछ सावधान हुए। दीनू की पकड़ से उन्होंने स्वयं को मुक्त किया और उसे नीचे गिरा कर हाथ और दोनों पैरों से बेतहाशा मारने लगे। दीनू दोनों हाथों से खुद को बचाने की असफल कोशिश करता फर्श पर पड़ा पिटता रहा। आशा को बचाने का उसका उद्देश्य पूरा हो गया था। उसने सेठ जी पर हाथ नहीं उठाया, क्योंकि उसके भीतर उठे तूफ़ान में अब इतनी तेजी नहीं रही थी कि गाँव में स्थापित सामाजिक मर्यादा का उल्लंघन कर सके।


दीनू पिटते-पिटते व गणपत दयाल पीटते-पीटते निढ़ाल हो गये थे और दोनों ही अब कुछ कहने-करने की स्थिति में नहीं रहे थे। गणपत दयाल अब भी अपने मन को यही समझा रहे थे कि गाँव वाले सब-कुछ जानने के बाद भी कुछ नहीं बोलेंगे और बात को आई-गई कर देंगे।... और दीनू? जमीन पर पड़े, कराह रहे दीनू को पिटने से भी अधिक पीड़ा इस बात की हो रही थी कि पैसे की मदद नहीं मिल पाने के कारण सुबह से भूखे उसके बच्चों को अब शाम का खाना भी नसीब नहीं होगा।

-गजेन्द्र भट्ट 

Sunday, October 17, 2021

793 ..कुछ इंतिज़ार की आदत सी हो गई है ..निदा फ़ाज़ली

एक नज़्म ...निदा फ़ाज़ली



वो शोख शोख नज़र सांवली सी एक लड़की ....
जो रोज़ मेरी गली से गुज़र के जाती है
सुना है
वो किसी लड़के से प्यार करती है
बहार हो के, तलाश-ए-बहार करती है
न कोई मेल न कोई लगाव है लेकिन न जाने क्यूँ
बस उसी वक़्त जब वो आती है
कुछ इंतिज़ार की आदत सी हो गई है
मुझे
एक अजनबी की ज़रूरत हो गई है मुझे
मेरे बरांडे के आगे यह फूस का छप्पर
गली के मोड पे खडा हुआ सा
एक पत्थर
वो एक झुकती हुई बदनुमा सी नीम की शाख
और उस पे जंगली कबूतर के घोंसले का निशाँ
यह सारी चीजें कि जैसे मुझी में शामिल हैं
मेरे दुखों में मेरी हर खुशी में शामिल हैं
मैं चाहता हूँ कि वो भी यूं ही गुज़रती रहे

अदा-ओ-नाज़ से लड़के को प्यार करती रहे 

आज बस