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Sunday, November 22, 2020

547 ..जंग लगे सीने में चुभते नहीं आलपिन

सादर अभिवादन
आज ज्वर है 
बहना दिव्या को
परसो पहला छठ था उसका
ठीक हो जाएगी..
मैय्या है न.. 
रचनाएँ कुछ यूँ है...



तितली सी तू सोन परी है
मेरे घर की राजकुमारी।
फूलों जैसी कोमल कलिका
बाबा की ओ राज दुलारी।
हर करवट पर घुंघरु बजते
पायल झनकार सुनाएगी।।





एक के बाद एक क्रमशः गुज़रते रहे,
दिन, जंग लगे सीने में चुभते
नहीं आलपिन, नदी का
वक्षस्थल, जितना
था अंतःनील,
उतना ही
क़रीब


यदि तुम मुझ से मित्रता करना,
तो केवल  मित्रता के लिए करना। 
मुझे मेरी अच्छाइयों और बुराइयों के साथ अपनाना,
हाँ, बाद में तुम मेरी बुराइयाँ  सुधार देना। 


इसे पढ़िए अवश्य
धन्य है वर्षा 
खेतों में कविताएँ 
बोए किसान 
(डॉ. भगवत शरण अग्रवाल) ;

रात है काली 
चलो जलाएँ  दीये 
लिखें दिवाली 
(डॉ. सतीशराज पुष्करणा)
...
बिटिया रानी को जन्मदिवस पर बधाइयाँ
सादर