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Thursday, November 26, 2020

552 ..कराहती,ढुलमुलाती चुपचाप निगलती समय की खौफ़नाक भूख से।

सादर अभिवादन
दशहरा गया
दीपावली गई
और अब
देव उठनी भी चली गई
पर नहीं गया तो 
वो है कोरोना
सब कह रहे हैं 
अतिथि तुम कब जाओगे
मत जाओ....
ये भारत है ..जो भी आया
यहीं का हो कर रह गया
हैजा, पोलियो, टीबी,डिप्थीरिया,
चिकनगुनिया, और डेंगू
अब तुम भी रह जाओ यहीं
हम भरतवासियों के पास
सब का इलाज है...
अब चलिए रचनाओं की ओर...



पर जाने क्यों
बहुत डर लग रहा है...
नफ़रत और उन्माद
का रस पीकर मतायी
लाल नरभक्षी चींटियों
के द्वारा
मानव बस्तियों की
घेराबंदी से।



पक्के मकानों में
उपले, न गोरसी 
हीटर के तारों से
लाल तपन बरसी
नींद मगर चाहे
स्वप्न की रजाई




मेहँदी रचती हथेली
भाग्य की गाढ़ी लकीरें
ऊँगलियाँ साजें अँगूठी
रीति के बजते मँजीरे
जब शगुन हल्दी लगाती
नीति दूर्वा ने सिखाई
प्रेम का हो रंग पक्का




मैं मानव हूँ दानव नहीं
सम्वेदनाओं से भरा हुआ हूँ
मुझे भी कष्ट होता है
किसी को व्यथित देख |
व्यथा का कारण जान  
अनजान नहीं रह सकता


चाँदनी को साथ ले कर
नभ मंडल में चंद्र चितेरा

विहग की टहकार मध्यम
टहनियों के मध्य बसेरा

नीड़ की रक्षा में व्याकुल
आए ना कोई लुटेरा





कुछ वृत्तांत के नहीं होते उपसंहार,
वास्तविकता के आगे जीवन- कथा हार 
जाती है हर बार, 
कोई रुका नहीं रहता 
किसी के लिए, 
बस स्मृति जम कर बनाती हैं 
हिम युग का संसार
....
बस..
सादर..