Saturday, December 7, 2019

198...'ड्यू प्रॉसेस ऑफ लॉ'....

सादर अभिवादन
कल जो हुआ..
याद दिलाती है
नाना पाटेकर की फिल्म
अब तक छप्पन की..

पुलिस का ऐसा साहस
यदा-कदा ही देखने को मिलता है
और इतिहास बना जातो है..
...
आइए चलें रचनाओं की ओर....


ड्यू प्रोसेस ऑफ लॉ ....विश्वमोहन कुमार

'और जला के भसम करने से 302 जो चलेगा', चौथे ने सवाल दागा।
'हूँह! 302 चलेगा तो 'ड्यू प्रॉसेस ऑफ लॉ' चलेगा। तब यह बलात्कार का केस नहीं होगा। मडर केस होगा। बरसों तक गवाही होगी। 'रेयरेस्ट ऑफ रेयर क्राइम' नहीं होगा। बहुत जादे होगा तो 'चौदह बरसा' होगा।
पहले से मर चुकी आत्मा की देह धू-धू कर जल रही थी। 'ड्यू प्रोसेस ऑफ लॉ' के आकाश में 'रेयरेस्ट ऑफ रेयर क्राइम'  का अट्टहास गूंज रहा था।


स्वर्णमृग की लालसा ....जयकृष्ण राय तुषार

लक्ष्मण रेखा 
विफल 
सौमित्र मत जाना ,
शत्रु का 
तो काम है 
हर तरफ़ उलझाना ,
चूक मत करना 
सुबह हो ,
दिवस हो या शाम |


दिसम्बर का एक दिन ....ओंकार जी
Winter, Fog, Outside, Cold, Branches
अदरकवाली चाय की ख़ुश्बू ,
घी में सिकते हलवे की महक,
टमाटर का सूप,संतरे का रस,
मक्के की रोटी,सरसों का साग. 


तृषित अंजलि का अमृत जल ...शैल सिंह

कभी वैरागि मन की पगडंडियों पर
तृषित अंजलि का अमृत जल पिला के 
कभी फायदा भोलेपन का उठाता
लुका-छिपी कर छलता रहा आते-जाते।


तुझ बिन जिया उदास ..... मुदिता

सुबह का सूरज 
अंधियारे में 
लाये किरणों का उजास 
फिर जग जाती मिलन की तुझसे 
गहरी सी इक आस 
पल पल राह तके ये नैना 
तुझ बिन जिया उदास ....
..
आज का दिन अच्छा-बुरा कहने का है
कुछ लोग सराहना कर रहे हैं
कुछ सहानुभूति दर्शा रहे हैं
और कतिपय लोग न्यायपालिका की अवमानना
कह रहे हैं....काश 

सभी राज्यों की पुलिस ऐसा साहस कर ले
तो बलात्कार का नामो-निशान मिट जाएगा
सादर


Friday, December 6, 2019

197....मत खोज लिखे से लिखने वाले का पता

उन चारों अत्याचारियों की तो
सजाए मौत निश्चित थी
पर मौत उन लोगों को जल्दी चाहिए थी
सो उन लोगों ने पुलिस वालों से राइफल
छीनने की कोशिश कर अपनी मौत को स्वयं ही
आमंत्रित कर लिया...पुलिस का गोलियों से 

मारे गए अत्याचारी....
एनकाउंटर हैदराबाद से 50 किलोमीटर दूर महबूब नगर ज़िले के चटनपल्ली गांव में हुआ। ये वही जगह है जहां 28 नवंबर को एक टोल प्लाज़ा के पास 26 साल की एक डॉक्टर का जला हुआ शव बरामद हुआ था। जांच में पता चला कि महिला के साथ गैंगरेप हुआ था और बाद में हत्या करने के बाद जला दिया था।

पुलिस ने उसी स्थान पर आरोपियों का एनकाउंटर किया जहां इस घटना को अंजाम दिया गया था। एनकाउंटर के बाद बड़ी संख्या में लोग घटनास्थल पर पहुंचे और पुलिसकर्मियों को कंधे पर उठा लिया। उन्होंने फूल बरसाकर पुलिस का स्वागत भी किया।

चलिए रचनाओं की ओर...


हादसे स्तब्ध हैं ...रश्मि प्रभा

हादसे स्तब्ध हैं, ... हमने ऐसा तो नहीं चाहा था !
घर-घर दहशत में है,
एक एक सांस में रुकावट सी है,
दबे स्वर,ऊंचे स्वर में दादी,नानी कह रही हैं,
"अच्छा था जो ड्योढ़ी के अंदर ही 
हमारी दुनिया थी"
नई पीढ़ी आवेश में पूछ रही,
"क्या सुरक्षित थी?"
बुदबुदा रही है पुरानी पीढ़ी,
"ना, सुरक्षित तो नहीं थे, लेकिन ...,
ये तो गिद्धों के बीच घिर गए तुम सब !



जिन राहों पर चला नहीं मैं ....अमित निश्छल

व्यथित हृदय की कठिन वेदना
कर में थाम रखा कल्पों से,
अपनों का सहयोग मिलेगा
रहा प्रताड़ित इन गल्पों से।
आँखें भी अपने गह्वर में, क्लिष्ट वेदना को भर-भरकर
प्रलयकाल की जलसमाधि में, जन्मों से बर्बाद रही हैं।


प्रेम तो प्रेम है ....रोली अभिलाषा

उस रोज़
जब पतझड़ धुल चुका होगा
अपनी टहनियों को,
पक्षी शीत के प्रकोप से
बंद कर चुके होंगे अपनी रागिनी,
देव कर चुके होंगे पृथ्वी का परिक्रमण,
रवि इतना अलसा चुका होगा
कि सोंख ले देह का विटामिन,
सड़कों पर चल रहा होगा प्रेतों का नृत्य,



शलभ-सी प्रीत ...अनीता सैनी

शलभ-सी प्रीत पिरोये हृदय में, 
 तड़प ऊँघती कलिकाल में मुस्कुराती,  
उम्मीद नयनों में ठहर,चराग़ जलेंगे, 
पवन से गुस्ताख़ियाँ जता रहे |



उलूक नामा भी यही कहता है

बात अलग है
अचानक
बीच में
मोमबत्तियाँ
लिखे लिखाये पर
हावी होना
शुरु हो जाती हैं

आग लिखना
कोई नयी बात
नहीं होती है

हर कोई
कुछ ना कुछ

किसी ना किसी
तरह से
जला कर

उसकी
रोशनी में
अपना चेहरा
दिखाना चाहता है
....
बस इतना ही
खुशी का मौका है
पर वो डॉक्टर तो वापस आने से रही
पर अब दूसरी नहीं जलेगी ये तो तय है
सादर




Thursday, December 5, 2019

196..जी रहे हैं या यूँ कहें कि जी रहे थे ढेरों परेशानियों संग

सादर नमस्कार
पता नही क्यों
हो गई है बावरी
मेरी कलम
औरतों के जिस्म से सब मर्द बने हैं
मर्दों की जहाँ बात हो, नामर्द खड़े हैं

शेरों से खेलने को पैदा हुए थे जो वो
किसी के नाज़ुक़ बदन से खेल रहे हैं

यहीं नही हो रहा है अनाचार
विदेशों में भी कायम है ...
क्या वास्तव में कलिकाल अंतिम पड़ाव पर है
हम-आप शायद न देख पाए वो जलजला
जब मनु-शतरूपा को नाव में बिठाकर
पूरी पृथ्वी को जलमग्न कर दिया था नारायण ने
शायद वैसा ही कुछ होगा..
लगता है इसबार आग बरसेगी
बहुत बकवास हो गई...
चलें काम पर..

हिम की सतह सा है ये मन देखो
टोह  लेता ही रहे ये निर्वहन , देखो

फिर पिघल रहा है ओ  मेघों इसे सम्भालो
फिर भी चलता रहे आवागमन ! , देखो


अब सारा गुस्सा
पीड़ाएँ हो जायेंगी धाराशायी
बस हौले से हथेली को
दबा कर कह देना
'आल इज वेल'
और फिर हम डूब जाएंगे
अपनी मुस्कुराहटों संग
अपनी ही खास दुनिया में
आखिर इतना तो सच है न कि
बीपी शुगर से
ज्यादा अहमियत रखतें हैं हम
मानते हो न ऐसा !!


एक दिन सामान्य-विज्ञान की कक्षा में शिक्षक पढ़ा रहे थे - 
" बच्चों ! सूरज आग का गोला है। "
उसी समय दोनों भाई-बहन कक्षा में ही ऊँघ रहे थे। शिक्षक महोदय की नज़र उन दोनों पर पड़ते ही वे आग-बबूला हो गए। अपने हाथ की हमजोली ख़जूर की छड़ी सामने के मेज पर पटकते हुए बोले - " का (क्या) रे तुम दोनों रात भर खेत में  मिट्टी कोड़ रहा था का (क्या)? चल ! इधर आके (आकर) दुन्नो (दोनों) मुर्गा बन के खड़ा हो जाओ। "
कलुआ अपनी शरारती आदतानुसार मुर्गा बनने के पहले बोल पड़ा - " सर ! हम तअ (तो) मुर्गा बन ही जाएंगे, पर सुगिया दीदी के तअ (तो) मुर्गी बने पड़ेगा ना !? "
कक्षा के सारे विद्यार्थी ठहाका मार के हँस पड़े। पर प्रतिक्रिया में शिक्षक के चिल्लाते हुए डाँटते ही - " चुप !!! .. शांति से रहो सब। ना तो सब के धर (पकड़) के कूट देंगें। समझे की नहीं !? " सब सटक सीता-राम हो गए।



अनसुने ये गीत मेरे, तू जरा गुनगुना.. 
अनकहा वही, जो है अनसुना, 
आवाज मेरी, जो न अब तलक बना, 
गीत ये मेरे, तू जरा गुनगुना... 



हालात-ए-जिस्म सूरत-ए-जाँ और भी ख़राब 
चारों तरफ़ ख़राब यहाँ और भी ख़राब 

नज़रों में आ रहे हैं नज़ारे बहुत बुरे 
होंटों में आ रही है ज़बाँ और भी ख़राब 

पाबंद हो रही है रिवायत से रौशनी 
चिम्नी में घुट रहा है धुआँ और भी ख़राब 




Wednesday, December 4, 2019

195..आखिर डर के साए में कबतक जीना होगा

सादर अभिवादन
आज एक संग्रहालय की सैर कीजिए
सच में कुछ अलग सा ही लगेगा


भारतीय वन अनुसंधान संस्थान, देहरादून... गगन शर्मा

चांदबाग, आज जहां दून स्कुल है, वहां 1878 में अंग्रेजों द्वारा स्थापित ब्रिटिश इंपीरियल फॉरेस्ट स्कूल को 1906 में इंपीरियल फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट का रूप प्रदान किया गया था। फिर 1923 में आज के विशाल भूखंड पर सी.जी. ब्लूमफील्ड द्वारा निर्मित एक नई ईमारत में 1929 में इसका स्थानांतरण कर दिया गया। 


जिसका उद्घाटन उस समय के वायसराय लॉर्ड इरविन द्वारा किया गया था। शहर के ह्रदय-स्थल से करीब सात की.मी. की दूरी पर देहरादून-चकराता मार्ग पर यह ग्रीको-रोमन वास्तुकला की शैली वाला भव्य, सुंदर, शानदार, अप्रतिम, बेजोड़ भवन अपना सर उठाए बिना प्रयास ही पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित कर लेता है। इसमें एक बॉटनिकल म्यूजियम भी है तरह-तरह के पेड़-पौधों की जानकारी प्रदान करता है। इसके लिए अलग से प्रवेश शुल्क लिया जाता है।

अब चलते है रचनाओँ की ओर...


पहली बार लवली गोस्वामी

विलोम .... लवली गोस्वामी
मैंने कोमल शब्दों के बनने में
दांतों की भूमिका तलाशी   

कठोर शब्दों के बनने में
जीभ की

कोमल और कठोर का उच्चारण किया
और भाषा के धोखे पर हंसी..



ज़िन्दगी हर मोड़ पर है, अलग अलग ...मुक्ता दत्त

कोई ना जाने, कैसे, कब
किसको कोई छोड़ता है-2
हम भी हैं उस दर्द के मारे
जब अपना कोई तोड़ता है-2
पत्थर नहीं, पत्थर नहीं
दिल क़त्ल हो गए इस मोड़ पर।।


मोनालिसा की मुस्कान.! ...अनीता लागुरी

जर्जर पड़े मकानों में,
इंद्रधनुष नहीं उगा सकती हैं।
मोनालिसा की पेंटिंग ने
तीखी की अपनी बरौनियाँ,
और कह डाला कवि से
तुम 21वीं सदी के कवि हो
मै 1503 की एक अनसुलझी रह्स्य
मेरी मुस्कान में विलुप्त कुछ भी नहीं,


हाँ कविता बोलती है ...नरेंद्रपाल जैन

ज़िन्दगी रिश्ते निभाती है स्वयं को तोड़कर,
हाँ नदी सिंधु में जाती पत्थरों को मोड़कर।
प्रीत की मधुशाल में वो बिन पिये ही डोलती है,
हाँ कविता बोलती है, हाँ कविता बोलती है


आखिर कब ? ...रीना मौर्या

हमारा कानून
क्यों नहीं बनाता
कोई मिसाल
की जुल्म के बारे में
सोचकर ही काँप उठे
उन बेदर्दों की आत्मा
और उड़ सके ये बेटीयाँ
बिना किसी डर के
अपनी उड़ान..
आखिर डर के साए
में कबतक जीना होगा
बेटियों को ,
कब देंगे हम उन्हें यह विश्वास
की वो है अब सुरक्षित ?
कब दे पाएँगे हम उन्हें
खुला आसमान ??
आखिर कब ???
...
अब बस..
फिर मिलते हैं कल
सादर








Tuesday, December 3, 2019

194 ....यूँ ही अचानक कैसे हुआ इतना बड़ा

एकला ही चलें
200 क़दम तो पूरे
हो ही जाएँगे
सादर अभिवादन
आज की पसंदीदा रचनाएँ
कुछ यूँ है....

सिसकती साँसों  की जालियों  में, 
नवाँकुर खिलाने को प्रतिपल रहते थे आतुर, 
अर्चना का सबल बन सहलाती रही, 
धरा के दामन में न धसी, 
कविता कादम्बिनी कद अपना तलाशती है |


उस जली हुई बेटी की देह को जब पिता अंतिम संस्कार के लिए अग्नि देने लगे तो वह बोल उठी - 'पापा, दोबारा मत जलाइए, बहुत दर्द होता है।' प्रियंका, खूबसूरत, प्रतिभाशाली, भावुक, भावुक इसलिए कि वह बेज़ुबान जानवरों की तकलीफ समझती थी, समाज से भयभीत, भयभीत इसलिए कि अपनी बहन को अंतिम शब्द यही थे 


इतिहास किसी का पुख़्ता नहीं है
चंद दिनांकों व नामों के अलावा
सारे आंकड़े बेबुनियाद है
अलग- अलग किताबों में
किसी एक का अलग-अलग नाम मिल सकता है
उसका वही-वही काम अलग-अलग दिनांकों को हो सकता है।
सम्भवतः ये किताबें आज लिखी गयी हैं
और 2619 साल पुरानी बातें करती हैं।


जब उससे ... 
नजरें मिलती है ,
मेरी भी.. तुम्हारी भी ।
 तो , तार जुड़ते हैं ,
मन के ..मन से..
आ जाती है ।
कुशल-क्षेम ..
मिलना ना मिलना ,
तो बस…
नियति की बात है ।


Image result for Woman warrior
मैं एक हारे हुए युद्ध की
सिपहसालार हूँ
रोज़ अपने चीथड़े संभाले
देखती हूँ अपलक
किसी नए फायरिंग स्क्वाड की
बर्फ आँखों में
उनकी मृत अंतरात्मा
मुझसे आख़िरी बोटी
मांगती है


और
हर बार
एक
दुर्घटना
फिर
झिंझोड़ जाती है

पूछते हुऐ

कितनी बार
और

किस किस

छोटी
घटना से

बचते हुऐ
अपने
आसपास की
आँखे फेरेगा ‘उलूक’

जो
दिखाई
और
सुनाई दे रहा है
....
बस..कल मिलेंगे फिर
सादर

Monday, December 2, 2019

193..दोस्ती जब किसी से की जाए दुश्मनों की भी राय ली जाए

सादर अभिवादन
खबर ये है कि
खबर ही नहीं है आज
इसीलिए चलें सीधे रचनाओँ की ओर


"एक यादगार सफर" ...कामिनी सिन्हा

वो कहते हैं न कि -" शामें कटती नहीं और साल गुजर जाते हैं ",देखें न, कैसे एक साल गुजर गया पता ही नहीं चला,हाँ आज मेरे ब्लॉग के सफर का एक साल पूरा हो गया। कभी सोचा भी नहीं था कि मैं अपना ब्लॉग बनाऊँगी ,ब्लॉग की छोड़ें कभी कुछ लिखूँगी ये भी नहीं जानती थी ,हाँ कुछ लिखने के लिए हर पल दिल मचलता जरूर था। तो ,जहाँ चाह होती हैं वहाँ राह खुद -ब -खुद मिल जाती हैं। हाँ ,कभी -कभी देर हो जाती हैं पर मिलती जरूर हैं और मुझे भी मिली। आज ही के दिन  सखी रेणु ने मेरे ब्लॉग को आप सभी से साझा किया था और  पहली टिप्पणी भी की थी और देखते ही देखते 4 -5 दिनों में ही आप सभी ने सहर्ष मुझे अपना लिया था।


स्वप्न या हकीकत ....अमित मिश्रा 'मौन'

गाँव में एक आम का पेड़ है जिसमें नए नए फल लगे हैं। फल बड़े हो रहे हैं। कुछ को कच्चा तोड़ लिया गया अचार बनाने के लिए। अचार बन गया उन आमों का दायित्व पूरा हुआ, जो बचे थे उनको पकने के बाद तोड़ा गया, लोगों ने खाया और उस आम का काम भी ख़त्म। अब फ़िर से नए आम आएंगे और अपना दायित्व निभाएंगे। आम आते जाते रहते हैं पर पेड़ वहीं रहता है।
यहाँ पेड़ पृथ्वी है और आम का फल मनुष्य है।

परिन्दे ख़्वाब के ...लोकेश नदीश

न जाने हाथ में कैसे हसीं खज़ाने लगे
खिज़ां के रोजो-शब भी आजकल सुहाने लगे

तेरी यादों की दुल्हन सज गई है यूँ दिल में
किसी बारात में खुशियों के शामियाने लगे

किताब का एक पन्ना ...दिगम्बर नासवा
कोशिश, माँ को समेटने की
कहते हैं गंगा मिलन
मुक्ति का मार्ग है

कनखल पे अस्थियाँ प्रवाहित करते समय
इक पल को ऐसा लगा
सचमुच तुम हमसे दूर जा रही हो ...

गाँव शहर हो जाते हैं ...श्वेता सिन्हा

सूखे बबूल के काँटों में
उलझी पतंगे,आँख-मिचौली
मांदर-ढोल,भूल गये बिरहा,चैता
 टूटी आस की बँसुरी,ढफली 
'प्रेमचंद',' रेणु' की चिट्ठियाँ
'गोंडवी' के संदेशे पढ़ते-पढ़ते
गाँव शहर हो जाते है....।

मलिन मन के ... सुबोध सिन्हा

कई दफ़ा तो गढ़ते हो नई रजाई
तकिए .. मसनद और तोशक भी
नई विवाहित जोड़ों के लिए भी
नई-नई हल्की-मुलायम रुइयों से
और कई दफ़ा तो तुम
फैलाते हो आस-पास प्रदूषण भी
धुनते वक्त पुरानी रुइयाँ
खैर! जाने भी दो ना तुम
एक तुम ही तो नहीं हो जो
फैला रहे प्रदूषण
पर्यावरण में चहुँओर

दोस्ती जब भी कीजिए... सुनीता शानू

दोस्ती जब भी किसी से की जाए, पहले जांच परख ली जाए, जांच लिया जाए कि आपने जिससे दोस्ती की है उसे आप पर भरोसा है भी कि नहीं, यह भी देख लिया जाए कि वह आपकी निस्वार्थ दोस्ती को आपकी मतलबपरस्ती तो नहीं मान बैठेगा, आपको जानना पड़ेगा आपके दोस्त के दोस्त कैसे हैं, इंसान किसी की न सुनता हो मगर हर वक्त कान के पास आने वाली आवाजें दिमाग में घर बना लिया करती हैं।
आपको देखना होगा मौकापरस्त  दोस्तो की दोस्त को पहचान है भी की नहीं?
....
आज बस
कल फिर मिलते हैं....
या सुनीता दीदी को ही कहेंगे
मंगल की प्रस्तुति आप बना दें
सादर












Sunday, December 1, 2019

192...आज महसूस करेगी वह कि अमृत का स्वाद कैसा होता है

सादर नमस्कार....
आखिर आ ही गया..
महीना दिसंबर का..
अब लोग करेंगे.. प्रतीक्षा
उत्सवों का....
बहुत सारे हैं इस दिसंबर में..

रचनाएं पहले देखें .....

बंद ठण्डे कमरों में बैठी सरकार
नीति निर्धारित करती 
पालनार्थ आदेश पारित करती 
पर अर्थ का अनर्थ ही होता 
मंहगाई सर चढ़ बोलती 
नीति जनता तक जब पहुँचती 
अधिभार लिए होती 
हर बार भाव बढ़ जाते 
या वस्तु अनुपलब्ध होती 
पर यह जद्दोजहद केवल 
आम आदमी तक ही सीमित होती 


बहुत ख़ुश है आज वह लड़की,
आख़िर वह भी चखेगी कॉफ़ी,
देर तक महसूस करेगी उसका स्वाद,
घूँट-घूँट उतारेगी गले से नीचे,
आज महसूस करेगी वह 
कि अमृत का स्वाद कैसा होता है.


आह‚ अंंतिम रात वह‚ बैठी रहीं तुम पास मेरे‚
शीश कंधे पर धरे घन कुंतलों से गात घेरे‚
क्षीण स्वर में कहा था‚ ‘अब कब मिलेंगे?’
आज के बिछुड़े न जाने कब मिलेंगे?

‘कब मिलेंगे?’ पूछता मैं विश्व से जब विरह कातर‚
‘कब मिलेंगे?’ गूंजते प्रतिध्वनि निनादित व्योम सागर‚
‘कब मिलेंगे?’ प्रश्न उत्तर ‘कब मिलेंगे?’
आज के बिछुड़े न जाने कब मिलेंगे?


मोमबत्तियां जल जाती हर बार
जुलूस भी निकाल लिये जाते
पर वासना से उत्पन्न
गंदी नाली के कीड़ों में
अब कहाँ बचा है होश
कागज पर उतरता आक्रोश ।


छिपा अरूप रूप के पीछे
उसे निहारा किन नयनों से,
सुख की गागर सदा लुटाये
व्यक्त हुआ ना वह बयनों से  !

रूप, रंग, रस स्वाद अनूठा
कौन सुनाये अपनी गाथा,
कोई नहीं अलावा उसके


अरे !  दादी ये क्या बुदबुदा रही हैं.. क्या वे सच में  बद्दुआ दे रही हैं..मम्मी तो यही कहती हैं कि यह बुढ़िया हमें शाप देती है..परंतु क्यों, वे ऐसी ही हैं..?
नहीं - नहीं, गलत है यहसब, हमारी दादी तो हम तीनों भाई-बहनों को कितना दुलार करती हैं..हिमांशु कुछ भी नहीं समझ पाता था कि यह उनका शाप था अथवा विलाप..।
....
आज बस..
कल फिर मिलते हैं
सादर