Monday, October 5, 2026

816 दवा जो किस्मत ने बनाई


 एक वैद्य इतना माना हुआ था कि जैसे ही लोगों की नाड़ी पर हाथ रखता दवाईयां भी जैसे बोल पड़ती हों कि इसका इलाज मैं करूंगी। बहुत दूर दूर से लोग दवाइयां लेने आते थे और भगवान की ऐसी कृपा थी कि जो भी आता ठीक होकर ही जाता।

एक बार वैद्य की लड़की का पति यानी उसका दामाद बीमार हो गया। उसने आस-पास से बहुत इलाज करवाया लेकिन ठीक न हुआ हालत बिगड़ती चली गई। आसपास के लोगों ने कहा कि भाई क्यों मुफ्त में जान दे रहा है तेरा ससुर इतना बड़ा वैद्य है तू उसके पास जा।

दूर के आना जाना हुआ करता था तो उसे आने में ही 5–7 दिन लगा दिए, उसके वैद्य ससुर ने कहा कि बेटा बहुत समय लगा दिया तुम पहले क्यों नहीं आए अब तक तो ठीक हो चुके होते। खैर वैद्य ने उसकी नाड़ी पर हाथ रखा और मायूस हो गया।

पास बैठी उसकी बेटी ने कहा कि बापू आपका चेहरा तो बीमार आदमी को देखते ही खिल उठता था कि मैं इसे ठीक कर दूंगा, लेकिन आज आप ही मायूस हो गए हैं ? वैद्य ने कहा बेटी इसकी दवाई बन ही नहीं सकती ये ज्यादा से ज्यादा एक हफ्ते में गुजर जाएगा। बेटी ने कहा कि आपका इतना बड़ा दवाखाना दवाओं से भरा हुआ है और आप कहते हैं कि इसकी दवा बन ही नहीं सकती?

वैद्य का दामाद ये बात सुनकर दुखी हो गया उसे पहले ही रोग से बहुत अधिक पीड़ा थी, अब ससुर की बात सुनकर यकीन हो गया कि मेरी मृत्यु निश्चित है। तभी उसने कहा कि जी मैं अपने ठिकाने पर ही मरना चाहता हूं अतः मुझे इजाज़त दें वह उठा और जैसे ही गांव की सीमा पर पहुंचा तो तेज बारिश शुरु हो गई उसने आस-पास देखा कि बारिश से कैसे बचें? तभी सामने श्मशान घाट नजर आया।

बचाव हेतु वह श्मशान में घुस गया और आड लेकर एक तरफ खड़ा हो गया, तभी उसे सामने पड़ी मुर्दे की खोपड़ी नजर आई एकाएक एक कोबरा सांप खोपड़ी के पास आया और खोपड़ी में अपना जहर उगल दिया। वैध के दामाद ने सोचा कि अब मेरा इलाज तो हो नहीं सकता इसलिए इस खोपड़ी में मौजूद जहर को पी लेता हूं इस कष्टदायक असहनीय पीड़ा से छुटकारा मिलेगा।
ऐसा सोचकर उसने वह खोपड़ी उठाई और पी गया, लेकिन वह मरने की बजाय ठीक होने लगा कुछ ही क्षणों में उसकी पीड़ा जाती रही और आनंद महसूस होने लगा। तब तक बारिश भी बंद हो चुकी थी वह जिससे चला भी नहीं जाता था दौड़ते हुए अपने ससुराल वापस पहुंचा।
अपने ससुर को लक्ष्य करके कहने लगा कि आप कहते थे कि मेरी दवा बन ही नहीं सकती जबकि देखिए मैं बिल्कुल ठीक हो गया हूं। 

वैद्य ने उसकी नाड़ी पर हाथ रखा और कहा कि तुम्हारी एक ही दवा थी-
मुर्दे की खोपड़ी हो उसमें कोबरा सांप का जहर डाला जाए और फिर उसमें एक नक्षत्र की बूंद गिरे फिर तुम उसे पियो। लेकिन मैं मुर्दे की खोपड़ी ले आता कोबरा सांप का जहर भी ले आता, लेकिन 12 वर्ष में महज एक बार गिरने वाली नक्षत्र की बूंद कहां से लाता?
ससुर की बात सुनकर दामाद ने कहा कि हां मुर्दे की खोपड़ी थी उसमें कोबरा ने जहर उगला था और मैं उसे पीकर मरना चाहता था लेकिन ठीक हो गया लेकिन नक्षत्र की बूंद उसमें गिरी या नहीं मुझे नहीं मालूम, मगर उस समय बारिश अवश्य हो रही थी।

उस दिन के बाद उस वैद्य ने अपनी दवाखाने की दीवार पर एक पंक्ति लिखवा दी कि
वैद्य इलाज करता है, दवा अपना काम करती है, लेकिन जीवन और मृत्यु का फैसला किसी और के हाथ में है।

2 comments:

  1.  आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में शनिवार 10 अक्तूबर, 2026 को लिंक की जाएगी ....  http://halchalwith5links.blogspot.in  पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!

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