अनकहा प्रेम ...नितेश मोहन वर्मा
मोटी खाकी वर्दी में
सीलन लगी दीवारों के बीच
चोरों खूनी ,मक्कारों के बीच
हर 15 मिनट में एक सिगरेट सुलगाता है
लगातार बजती टेलीफोन की घंटी
किसी की शिकायत, कभी अफसर की डांट
गाली गलौज, चिल्लम चिल्ली
लावारिस लाश का पंचनामा
नारा लगाते विद्यार्थियें का हंगामा
मन में क्रोध है , द्वेष है
उन्माद भी है
वो और उसका फटफटी
शहर को चीर घर पहुंचते हैं
आटा सनी उंगलियों से पसीने को रोकती
वो बस मुस्कुराती है
और सब थम जाता है
घंटी, शोर, अफसर
लावारिस लाश,रात और शहर
प्रेम में शब्दों की न अहमियत है , न दरकार
साभार
प्रतिज्ञान
पृष्ठ क्रं. 59
प्रतिज्ञान
पृष्ठ क्रं. 59


आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में शनिवार 31 अक्तूबर, 2026 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
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