Friday, February 7, 2020

259..मेरे गीतों में गुलाबों की महक पाओगे

सादर अभिवादन
पाश्चात्य प्रेम सप्ताह का आगाज़
आज पहला दिवस
रोज़ डे
हमारे भारत में
पूरे 366 दिन..
प्रेम किया जाता हैअपनी माटी से
अपने राष्ट्र से
अपने माता -पिता से
और अपने भाई-बहन से
रोज़ डे का इतिहास अंत में

अभी रचनाएं की ओर चलें...

एक तमन्ना तुम्हें गुलाब देने की,
एक झिझक तुम्हारे मना करने की,
साल दर साल गुजरते गए,
कई गुलाब खिले कई मुरझा गए,


मेरे गीतों में गुलाबों की महक पाओगे
रोज़ डे तुम तो मनाना ही भूल जाओगे ।

खार की कुछ तो चुभन हाँ ! तुम्हें सहनी होगी
बाद में तुम भी गुलाबों से खिलखिलाओगे ।


किसी की चाहतों में ख़ुद को मिटा देना
नहीं आसां, बड़ी सहजता से उसने
तोड़ा था नाज़ुक रिश्ते, लेकिन
न जाने क्यूँ वो शख़्स रहा
ताउम्र परेशां।  बिखरे
हुए ख़्वाबों में
कहीं न कहीं


अंग्रेजी शब्दों को अपना वजन डालना आता है,
हिप्नोटिज्म  सफल हुआ गिटपिट करना आता है,
अंधी मोहब्बत कर कीमत चुकाने में चूको नहीं-
हिप्नोटाइज्ड होना जो आई लव यू सुनना आता है।


पर उसका क्या उसकी इच्छा का क्या
मीठे पानी की खोज में
सतह पर उभर-उभरकर
चाँद को बुलाता है...पर चाँद
ज्वार-भाटे में उसे उलझाकर छिप जाता है.

रोज डे के साथ वेलेंटाइन वीक की शुरूआत हो चुकी है। इस दिन प्यार करने वाले लोग एक दूसरे को खूबसूरत फूल देकर अपने प्यार की खुशबू को महकाने का काम करते हैं और वो हमेशा  यही कामना करते है कि उनका ये प्यार भरा रिश्ता इन खूबसूरत फूलों की तरह महकता रहे, लेकिन जरूर नहीं है कि इस बार आप अपने जीवनसाथी या हमदर्द को लाल रंग का ही गुलाब  दे। बल्कि इस बार आप उन फूलों का भी चयन कर सकते है  जो आपकी फीलिंग को आपके पार्टनर तक आसानी से पहुंचा सकें। तो आइए जानते है कि कौन से रंग के गुलाब का फूल आपके किस प्यार के एहसास को बताता हैं।

अब आज काफी है
पूरे सप्ताह प्रेम ही प्रेम है
जय श्री राधे...




Thursday, February 6, 2020

258..मुश्किल है जमीँ से ज़ुदा होना

सादर अभिवादन
पिछले एक सप्ताह से
मौसम ज़रा गमनीन सा है
पानी कोहरा फिर पानी
ठण्ड मानो पलटकर
फिर आ गई है...
उंगलिया जम सी गई है
सारा कार्यक्रम जम सा गया है
फिर भी...चलिए चलते हैं....


मजहब से ऊपर ....शारदा अरोरा 

हिन्दू होना या मुसलमाँ होना
मजहब से ऊपर है इन्साँ होना

वतन वतन है , जड़ें तेरी
मुश्किल है जमीँ से ज़ुदा होना


जो चल सको तो चलो ...निदा फ़ाज़ली

सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो
सभी हैं भीड़ में तुम भी निकल सको तो चलो

इधर उधर कई मंज़िल हैं चल सको तो चलो
बने बनाये हैं साँचे जो ढल सको तो चलो


अकेला होना और अकेले में रोना ...सवाई सिंह राजपुरोहित

यह बात एकदम सकते हैं कि जो व्यक्ति अकेला होना और अकेले में रोना वह इंसान को बहुत मजबूत बनाता है पर कई बार इंसान टूट भी जाता है अकेलेपन के कारण इसलिए अपनों को टाइम जरूर दें क्योंकि रिश्तो की अहमियत जिस दिन हम समझ जाएंगे


तंज़... मोहित शर्मा ज़हन

"मौज तो तुम गरीब-लेबर क्लास और अमीरों की है। देश का सारा टैक्स तो मिडिल क्लास को देना पड़ता है। एक को सब्सिडी तो दूसरे को लूट माफ़ी।"

आज बस
कल फिर
सादर




Wednesday, February 5, 2020

257..पागल सरदार का हर पागल अपने खोल से बाहर निकल निकल कर आ रहा है

सादर अभिवादन
आज कुछ अव्यवस्थित हैं हम
मौसम रायपुर का
रो रहा है
और शहर वासियों को भी रुला रहा है
ये सब मानवीय अनियमितता की वजह से है
खैर अब भुगत रहे हैं सब तो
हमको भी तो भुगतना ही होगा

चलिए चले आज की 
संक्षिप्त प्रस्तुति का अवलोकन करें..

फिर कहीं मधुमास की पदचाप सुन,
डाल मेंहदी की लजीली हो गई।

दूर तक अमराइयों, वनबीथियों में
लगी संदल हवा चुपके पांव रखने,
रात-दिन फिर कान आहट पर लगाए
लगा महुआ गंध की बोली परखने


निष्ठुर स्मृति का
कर्कश कुकृत्यों की
अश्लील अतीत के
जश्न नहीं मनाना।
एक नया नालंदा बनाना।
अपने अख्तियार की!


कल्पनाऐं भी शायद,
बिखरना छोड़ दें,
मगर फिर क्या होगा,
धुँआ घरों से नहीं,
देह से उठा करेगा,
शोर मुँख से नहीं,
दिलो-दिमाग़ को फाड़कर,
आत्मा की परिधि से निकलेगा,
फिर क्या होगा।


क्या करे
पागल ‘उलूक’

उस के
लिखते ही
हर गली का पागल

उसे
पागल
सिद्ध
करने के लिये

अपने
पागल
सरदार की टोपी
हाथ में
लहराता हुआ
सा
निकल रहा है।

आज अब बस
फिर मिलेंगे
सादर..

Tuesday, February 4, 2020

256..हर पल जीत लेती हूँ जीने के लिए...

सादर अभिवादन
आज विश्व कैंसर दिवस है

1933 में अंतर्राष्ट्रीय कैंसर नियंत्रण संघ ने स्विट्जरलैंड में जिनेवा में पहली बार विश्व कैंसर दिवस मनाया। यह दिवस कैंसर के बारे में जागरूकता बढ़ाने, लोगों को शिक्षित करने, इस रोग के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए दुनिया भर में सरकारों और व्यक्तियों को समझाने तथा हर साल लाखों लोगों को मरने से बचाने के लिए मनाया जाता है। 2014 में इसे विश्व कैंसर घोषणा के लक्ष्य 5 पर केंद्रित किया गया है जो कैंसर के कलंक को कम और मिथकों को दूर करने से संबंधित है

वर्तमान में, दुनिया भर में हर साल 76 लाख लोग कैंसर से दम तोड़ते हैं जिनमें से 40 लाख लोग समय से पहले (30-69 वर्ष आयु वर्ग) मर जाते हैं। इसलिए समय की मांग है कि इस बीमारी के बारे में जागरूकता बढ़ाने के साथ कैंसर से निपटने की व्यावहारिक रणनीति विकसित करना है। वर्ष 2025 तक, कैंसर के कारण समय से पहले होने वाली मौतों के बढ़कर प्रति वर्ष 60 लाख होने का अनुमान है। यदि विश्व स्वास्थ्य संगठन के 2025 तक कैंसर के कारण समय से पहले होने वाली मौतों में 25 प्रतिशत कमी के लक्ष्य को हासिल किया जाए तो हर साल 15 लाख जीवन बचाए जा सकते हैं।


“गौरवशाली यादें” ....विभा रानी श्रीवास्तव 'दंतमुक्ता'

मरने के बारे में सोचती ही नहीं... यानी सोचने के लिए समय नहीं निकाल पाती कि कभी मरना भी है... हर पल जीत लेती हूँ जीने के लिए... सहित्योपचार नहीं मरेगा, हमलोगों द्वारा स्थापित साहित्य और समाज के प्रति जागरूकता और पागलपन नहीं मरेगा... मर ही नहीं सकता न... बूँद हूँ! दरिया के संग मिलकर सागर का दशा-दिशा बदलने की चाहत रखती हूँ..!




अभी वह अपने बचपन में अठखेलियां करती है। बेखबर है दुनिया के रंग -ढंग से। खुश है। खेल रही है अपने मेमने के साथ। प्यारे मेमने को वह सोमू कहती है। दे रही है उसे अपना सम्पूर्ण स्नेह और प्रेम। वह करती है सोमू पर अथाह विश्वास। उसकी हर कलाबाजी पर लड़की भरती है किलकारी और प्रसन्न रहती है। दोनों एक दूसरे की खुशी का रखते हैं पूरा ध्यान। 

खेलती हुई लड़कियां... प्रतिभा कटियार

मुस्कुराती हैं वो
करती हैं अगली गेंद का इंतजार
खेलती हुई लड़कियां फुटबाल को जब मारती हैं पैर से
तो मारती हैं जिन्दगी में आई मुश्किलों को भी
थोड़ा संभल के भी और पूरे जोर से भी
जिन्दगी में घिर आई नफरतों को वो एक ही बार में
कर देना चाहती हैं 'गोल' सिर्फ प्यार बचाना चाहती हैं धरती पर



असाध्य वीणा .... अज्ञेय

ओ दीर्घकाय!
ओ पूरे झारखंड के अग्रज,
तात, सखा, गुरु, आश्रय,
त्राता महच्छाय,
ओ व्याकुल मुखरित वन-ध्वनियों के
वृंदगान के मूर्त रूप,
मैं तुझे सुनूँ,
देखूँ, ध्याऊँ
अनिमेष, स्तब्ध, संयत, संयुत, निर्वाक् :
कहाँ साहस पाऊँ
छू सकूँ तुझे!

सुनो गर्जना ..पंकज प्रियम

मंचों के आसन से
धृतराष्ट्री शासन से
कालाबाज़ारी राशन से
उठती गर्जना हर ओर सुनो।
अंधा दिखाए राह यहाँ
कुर्सी की बस चाह यहाँ
दिन दहाड़े खुद लूटकर डाकू
सिपाही को कहता चोर सुनो।
...
आज बस
घर का खाइए...
साफ सुथरा खाइए
भूख से कम खाइए
जीभ की बातें अनसुना करिए
कभी कैंसर नहीं होगा

......
सादर







Monday, February 3, 2020

255...दोस्ती की मिसाल..

सादर नमस्कार
एक अनुकरणीय कथा 
श्रीमति चंचलिका शर्मा की वाल से
बिना टीप दिये उनका निकलना ......
उन चारों को होटल में बैठा देख, मैं हड़बड़ा गया था।
लगभग 25 सालों बाद वे उसके सामने थे। शायद अब 
वो बहुत बड़े और संपन्न हो चुके थे।
मुझे अपने मित्रों का आर्डर लेकर परोसते समय 
बड़ा अटपटा लग रहा था।
उनमे से दो मोबाईल फोन पर व्यस्त थे. और दो लैपटाप पर।
मैं पढ़ाई पूरी नही कर पाया था।शायद इसीलिए उन्होने 
मुझे पहचानने का प्रयास भी नही किया होगा।
वे भोजन कर बिल अदा करके चले गये ।
अब मुझे लगा कि वो चारों शायद पहचानना ही नही चाहते थे या 
मेरी हालत देखकर,जानबूझ कर पहचानने की कोशिश ही नही की।
खैर....एक लंबी सांस के साथ मै फिर अपनी टेबल साफ करने लगा.
टिश्युपेपर उठाकर कचरे मे डालने ही वाला था, पर एक पेपर कुछ अलग सा था, शायद उन्होने कुछ जोड़ा-घटाया था ।।
अचानक मेरी नजर उस, लिखे हुये शब्दों पर पड़ी,
लिखा था - प्रिय मित्र तू हमें खाना खिला रहा था पर, आज, बचपन की तरह साथ बैठा नही। तुझे टीप देने की हिम्मत हममें नही थी, 
हमने तेरे इस होटल के पास ही उद्योग पुरी मे एक नयी फैक्ट्री 
के लिये जगह खरीदी है,अब इधर आनजाना तो रहेगा ही. तो सुन, आज तेरा इस होटल का आखरी दिन। हमारी फैक्ट्री की कैंटीन भी कोई तो चलायेगा ही ना? तुझसे अच्छा पार्टनर और कहां मिलेगा??? स्कूल के दिनों हम पांचो आपस मे एक दूसरे का टिफिन खा जाते थे.... 
अब से तेरा बनवाया ही खाएंगे

अब चलिए चलते हैं रचनाओं की ओर..

प्रेम बस अक्षर नहीं, जिसे लिख डालें,
शब्दों का मेल नहीं, जिसे हर्फो से पिस डालें,
उष्मा है ये मन की, जो पत्थर पिघला दे,
ठंढ़क है ये, जलते मन को जो सहला दे,
कोशिशें अनथक अनवरत जारी हैं मेरी,
वो ठंढ़क, वही उष्मा जीवन में नित भरने की!


" कर्मचंद !  कैसे सहा तुमने घराती और बराती  दोनों का इतना सारा खर्च। यह समाज भी कैसा विचित्र है .. दिल बड़ा तो लड़की के पिता का होता है , पर ढोल लड़के वालों का बजता है..। "


जमाना सो रहा था पर जाग रहे थे हम,
खुद की परछाई से अब भाग रहे थे हम,
अँधेरे का डर दिखाके तुम जीत जाओगे,
एक जमाने में कभी आग रहे थे हम।


भूख का चल रहा वह भीषण दौर भयावह था,
चीख़ती आवाज़ें अंतरमन की अकेलेपन के नुकीले दाँत, 
वसंत में फूटती मटमैली-सी मन की अभिलाषा, 
 मैं जीवन का सारा सब्र चबा चुकी थी। 

आज की एक रचना
ऊपर की कहानी निगल गई
मिलते हैं फिर
सादर

Sunday, February 2, 2020

254..आज का दिन 02-02-2020, 2 अंक चार बार आया है

सादर अभिवादन
आज का दिन
02-02-2020
2 अंक चार बार आया है
इस माह एक संयोग और होगा
22-02-2020
है ना अद्भुत संयोग

अब चलें रचनाओं की ओर...

कई रंग, अंग-अंग, उभरने लगे,
चेहरे, जरा सा, बदलने लगे,
शामिल हुई, अंतरंग सारी लिखावटें,
पड़ने लगी, तंग सी सिलवटें,
उभर सा गया हूँ!
या, और थोड़ा, निखर सा गया हूँ?
कभी था, अव्यक्त जैसे!


चाह देखकर भाव बढ़ाता
हाथ लगाओ खूब रुलाता
है सखी उसको खुद पर नाज
क्या सखी साजन ?.....
..........ना सखी प्याज ।

खुद का भरोसा नित करो 
मन में न भय कोई पले, 
है स्वप्न में जन्नत अगर 
सुख की फसल भीतर खिले !

माईईईई...!ऐ माई रे..! गज़ब हो गया..!
क्या हुआ रजुआ..? काहे सुबह-सुबह से चिल्ल मचाए हो?
जानकी ने बाहर आकर पूछा।
अरे माई..!वो..वो हरिया काका..!
हांफते हुए रजुआ बोला।माई..! हरिया काका ने 
खुद को पेड़ से लटका लओ।
का कह रहो है..?सच है माई..!हे भगवान जै का हो गयो..? 
चल जल्दी..!जानकी बसंत पंचमी की पूजा की तैयारी कर रही थी।

ए दोस्त  कहाँ  हो ,कैसे  हो  ,
बोलो  न , कुछ  तो  बोलो
बात  बनेगी , राह  दिखेगी ,
अपने  अंतर्मन  को  खोलो
धूप  ,छाँव  ,शहर  और  गाँव ,
सब इक  से  हो  जायेंगे
महफ़िल  तुम  जहाँ  बनाना ,
अधरों  में  मिश्री  को घोलो
...
आज बस इतना ही
फिर मिलते हैं कल
सादर






Saturday, February 1, 2020

253..सद‍ियों पुरानी चरक संह‍िता में भी वायरस का उल्लेख व न‍िदान द‍िए गए हैं

सादर अभिवादन
फरवरी का पहला दिन
सच मे खुशगवार है
कुछेक चिन्ताओ को छोड़कर
कोई चिन्ता नहीं

चलिए देखते हैं सारा विश्व चिन्तित क्यों है

कोरोना संक्रमण के सबसे संभावित जीव चमगादड़ और सांप बताए जा रहे हैं, इन्हें खाने से बचने को चीनी सरकार ने एडवाइजरी जारी की है परंतु सोशल  मीडिया प्लेटफार्म ट्विवटर पर ही कोरोना से रिलेटेड जो वीड‍ियो तैर रहे हैं , उनमें जीवित (हाफ-बॉयल्ड ) चमगादड़, चूहे, टैडपोल, मेढक, कुत्ते खाने की मेज पर सजे द‍िखाई दे रहे हैं, उन्हें चाव से खाते लोग और इनके अंगों को प्लेटों में रखकर डिनर टेबल डेकोरेट करते दिखाई दे रहे हैं।
https://youtu.be/JHo5BGGN3gA
 ये सब क्या है।


अन्य नियमित रचनाएँ

बारात वसंत की ..सुजाता प्रिय
मौसम की पालकी पर सज सँवरकर ।
आया है वसंत देखो जी दुल्हा बनकर।

नव पल्लवों ने वंदनवार सजाए।
मंजरियों ने स्वागत द्वार सजाए।

कोयल गा रही स्वागत गान।
भौंरों  ने  मीठे  छोड़े  तान।


तारीख़ पे तारीख़ ...पंकज प्रियम
कौन बचा रहा दरिंदो को?
फिर क्यूँ टली दरिंदो की फाँसी?
अपनी बेटी को इंसाफ़ दिलाने को
लड़ रही एक माँ को चुनौती दे गया वकील
अनन्तकाल तक नहीं होने देंगे फाँसी!


बसंत के दरख्त ...पुरुषोत्तम सिन्हा

कई रंग, अंग-अंग, उभरने लगे,
चेहरे, जरा सा, बदलने लगे,
शामिल हुई, अंतरंग सारी लिखावटें,
पड़ने लगी, तंग सी सिलवटें,
उभर सा गया हूँ!
या, और थोड़ा, निखर सा गया हूँ?
कभी था, अव्यक्त जैसे!

एक रोटी चार टुकड़े ...आँचल पाण्डेय

एक रोटी चार टुकड़े बाँटकर खाते रहे,
हम तो अपना पेट यूँ ही काटकर जीते रहे।

ए गुले गुलज़ार तेरी थाल में बोटी सजी,
मांस अपना दे के तेरा पेट पालते रहे।

आज अब बस
कल फिर मिलते हैं
सादर