Thursday, May 7, 2020

347..पूनम का दिन है तो, रात भी पूनम की ही होगी

पूनम का दिन है तो
रात भी पूनम की ही होगी

बुद्ध जयन्ती की शुभकामनाएँ
कुछ तो है इस पूनम में
जो चाँँद शुक्रवार की सुबह तक
दिखाई देगा
अब देखें रचना..

मौसम बड़ा सुहाना है,
हमको घर भी जाना है,
चलो, चलें अब हम-तुम
दोनों करते जाएँ बात।
हम चलते जाएँ साथ।


बड़े बड़े जंग जीते है 
ये भी जीत जायेंगे , 
मन मे रक्खे धीरज 
मुश्किल से निकल जायेंगे , 
ये समय नही सियासी बातों का 
ये समय है जीवन रक्षा का, 


क्यों न आज हम
उन लम्हों की
कसमें खायें
सूर्य,चन्द्र और
अग्नि-वरुण-जल
साथ चले थे.....


मेरे हस्ताक्षर में ... सुबोध सिन्हा

संपूर्ण
पन्ने का
मूल्यांक
और
मूल्यांकन व
अवलोकन को
सत्यापित
करते
हस्ताक्षर
ये सभी तो
होते हैं
हाशिए पर ही ..
..
आज बस
कल फिर
सादर



Wednesday, May 6, 2020

346..मन में उठी इच्छा को तृप्त करना असम्भव है

सादर अभिवादन
आज का अंक
पता नहीं क्यूँ
मन नहीं हो रहा था कि
प्रकाशित न करें..
रिक्त जाने दें आज का दिन

चलिए रचनाओं की ओर..


बुद्ध कहते हैं...
अतृप्त रहना 
इच्छा का स्वभाव है. 
मानव इस सत्य को 
भूल जाता है... और 
इस असंभव कार्य को 
पूरा करने में अपना 
सारा जीवन लगा देता है. 


एक बार फिर...
वीर सैनिकों के 
रक्तरंजित शव
कंधों ने उतारकर रखें है 
चिताओं पर,
मातृभूमि के लिए
मृत्यु का भोग बने
शहीदों की शहादत पर
तिरंगे में लिपटे शौर्य की
गर्वित गाथाएँ


तुझे जब याद करती हूँ, स्वयं को भूल जाती हूँ।
सदा अपने  स्वरों  में  मैं ,तुझे  ही  गुनगुनाती हूँ।

वो' तेरे प्यार का संगम, अदा वो मुस्कुराने की।
तसव्वुर  में बसाकर  लाज  से नजरें झुकाती हूँ।



नागफ़नी!!! 
सरल नहीं है तुमसे प्यार करना, 
कुपोषित ,बंजर , 
ऊसर जमीन की उत्पन्न तुम 
और तुम्हारी उत्पन्न भी 
खुरदुरी, काँटोभरी। 


हर ओर मन आक्रांत है
चारों दिशाएं रो रही
छाई निशा में मौन है
है कहर हर ओर ढा रही
जीवन को है झुलसा रही
कैसी तूफानी रात है


न जाने कौन सी जगह है
उस पार, जो लुभाती है
मुझे जुगनुओं के
द्वीप की तरह
हर बार,
मेरा जिस्म होना चाहे कोई
विस्मृत, पुरातन मंदिर,
तुम विशालकाय
बरगद बन
पाओ
.....

आज बस इतना ही
कल फिर


Tuesday, May 5, 2020

345..एक मित्र डॉक्टर से बात हुई उसने कहा...लोग घर पर हैं खर्चे कम हो रहे हैं

आज हम शहर घूमें
कही कोई ख़ौफ नही
एक मित्र डॉक्टर से बात हुई
उसने कहा...लोग घर पर हैं
खर्चे कम हो रहे हैं
बाजार में मिलने वाली वस्तुएं घर पर
ही बनाई और खाई जा रही है
लोग बीमार कम पड़ रहे हैं
सारे नर्सिंग होम खाली है..
अब तक ठीक है
लापरवाही करेंगे लोग तो
 लगेगा एक प्रश्न चिन्ह...

देखें रचनाएँ आज की...

ये उन दिनों की बात है जब हम मिले पहली दफा स्टेशनपर अनजान से दूसरी दफा ताजमहल कितनी मन्नतों के बाद ये दिन आया था तुम और ताजमहल पास ही ,सपना लग रहा जैसे 


आओ आज कतरनों से कविताएं रचते हैं 
और मिलकर कचरों से कहानियाँ गढ़ते हैं।
.....
नज़रें हो अगर तूलिका तो ... कतरनों में कविताएं और ...
कचरों में कहानियाँ तलाशने की आदत-सी हो ही जाती है ।


पति की उलाहना से बचने के लिए सुमन ने ड्राइविंग तो सीख ली,  मगर भीड़ भरी सड़कों पर गाड़ी चलाते हुए उसके हाथ-पाँव फूल जाते।आज बेटी को स्कूल से लाते समय उसे दूर चौराहे पर भीड़ दिखी तो उसने स्पीड स्लो कर दी।
"मम्मा ! स्पीड क्यों स्लो कर दी आपने" ? बेटी  झुंझलाकर बोली तो सुमन बोली "बेटा !आगे की भीड़ देखो!वहाँ पहुँचकर क्या करुँगी, मुझे डर लग रहा है, छि!  मेरे बस का नहीं ये ड्राइविंग करना"


ढॅूढते हो छायीं पेड़ को उखाड़कर,
बने हैं कई मकान रिश्ते बिगाड़कर,

तालीम  भी तुमसे बदनाम हो गयी,
पायी है डिग्री जो तुमने जुगाड़कर,

चंपा फूल ने मुझे सदा सम्मोहित किया... बचपन से मुझे इससे इश्क है... हमारे घर में चंपा का पेड़ था। जब से होश संभला... 1973 तक इससे सारी बातें साझा करती रही... उसके बाद शहर बदल गया , इसका साथ छूट गया... परन्तु कहीं दिख जाता था तो कुछ देर के लिए ही सही मुझे ठमका ही लेता। 1994 के 29 अगस्त को हम पटना रहने आये। पटेल नगर पटना के जिस मकान में मैं रहती थी , वहाँ भी इस फूल का बड़ा पेड़ था.. एक बार सड़क चौड़ीकरण में उस पेड़ को जड़ समेत काट देना पड़ा.. जिस समय वह पेड़ कट रहा था , वहाँ मुझसे खड़ा नहीं रहा गया.. कटे पेड़ की टहनियाँ आग में जलती तो रौंगटे खड़े हो जाते.. मोटा तना सूख रहा था.. एक दिन यह भी जल जाएगा रोज मुझे रुंआसा करता। कुछ दिनों के बाद ,एक दिन अचानक उस सूखे तने में से पौधा निकल आया.. जिसे हम पुनः लगा सके। 




रात के अंतिम पहर में धुँधले पड़ते तारों में तलाशती है अपनों के चेहरे। ऐसा लगा जैसे एक-एक कर साथ छोड़ रहे हैं उसका और वह ख़ामोशी से खड़ी सब देख रही है। एक आवाज़ उसे विचलित कर रही है। "हक नहीं तुम्हें कुछ भी बोलने का। ज्ञान के भंडारणकर्ता हैं न,
समझ उड़ेलने को। 
तुम क्यों आपे से बाहर हो रही हो। तुम्हें बोलने की 
आवश्यकता नहीं है।"
....
बस
कल फिर..
सादर

Monday, May 4, 2020

344 ..."मॉम कहती है माँ कभी अनपढ़ नहीं होती।"

लॉक डाउन खुल गया रायपुर में
रेड जोन में होते हुए भी
दवा-दारू अब बेख़ौफ मिलेगी
पान-गुटखा पर विचार जारी है
खैर सरकार की मर्जी..
जो है सो है
सादर अभिवादन..
रचनाएं देखें..

उन्हें क्या कहें 
साहसी कहें 
और उनके 
साहस को 
नमन करें। 
या उन्हें 
कायर कहे
और
लक्ष्मण रेखा 
पार करने के जुर्म में 
उन्हें छोड़ दें 
यमराज के चंगुल में। 

आज सुबह से ही मौसम बिगड़ रहा था। गीता गांव के हाल-चाल फोन पर ले रही कि मौसम  की मार से पहले खलिहान में पड़ा अनाज घर तक सुरक्षित पहुँचा या नहीं।
पुनीत अख़बार पढ़ रहा था, सासु माँ अंदर रुम में आराम कर रही थी। 
"वह अपने बच्चों की भूख मिटाने के लिए पत्थर उबाल रही थी।"
पुनीत ने विस्फारित नेत्रों से मम्मी से कहा और फिर दूसरा समाचार पढ़ने लगा। 
"अनपढ़ होगी!"
गीता की सास ने कमरे के अंदर से आवाज़ दी। 
"मॉम कहती है माँ कभी अनपढ़ नहीं होती।"


धरती का श्रृंगार है , इनसे कर लो प्यार। 
वृक्षों ने हमको दिया , ये सुंदर संसार।। 

पंछी के घर बार है , बरसाते ये मेघ, 
बिना मुकुट के भूप हैं , करें प्रकृति श्रृंगार। 

हरे हवा के जहर को , इनसे मिलती श्वांस, 
देते हैं बिन लोभ के , करते नित उपकार। 


मेहनत मजदूरी, 
भाग्य लिखी मज़बूरी। 
रात दिन खट के भी, 
मान नहीं पाती है।1।

सिर पर छत नहीं, 
बीते रात दिन कहीं। 
ईंट गारा ढोती घर, 
दूजे का बनाती है।2। 


My Photo
देख लहरों को डर गए कुछ लोग 
नाव से ही उतर गए कुछ लोग 

करके क़ुर्बान ज़िंदगी अपनी 
प्यार में उफ्फ बिखर गए कुछ लोग 

हर सितम सह रहे यहाँ जीकर 
ज़िंदा रहकर भी मर गए कुछ लोग
..
बस कल की कल
सादर


Sunday, May 3, 2020

343 ...सोच कर लिखा नहीं जाता है और बिना सोचे लिखा गया लिखा नहीं होता है

सादर अभिवादन

आज फिर हम

सोच का क्या कुछ भी सोच लें

पर विश्वास तो जम सा रहा है कि 

ये सचमुच तीसरा विश्वयुद्ध ही है युगनिर्माण योजना के 

एक अंक मे पढ़ा था कभी नास्त्रेदमस ने कहा था कि

ऐसा एक दिन भी आएगा कि  इन्सान सूअर का मुखौटे में घूमेगा

वो सच होती दिख रही है सभी के मुख पर मास्क नज़र आ रहा है
अब रचनाएं.....


वह बिजली से चलनेवाली ट्रैन ..रवीन्द्र सिंह यादव

ज्ञात नहीं 
अब कहाँ हो तुम
मैं आज भी हूँ 
उसी स्मृति में गुम 
जब तुम्हें सी ऑफ़ करने 
रेलवे स्टेशन पर 
प्लेटफ़ॉर्म सात पर 
उस ट्रैन में बैठाया था 
जो ले गयी तुम्हें 
मुझसे बहुत दूर 
वह बिजली से चलनेवाली ट्रैन 



जिस छड़ी के सहारे चलकर वह चश्मा ढूँढने अपने बेटे के कमरे में आये थे, उसे पकड़ने तक की शक्ति उनमें नहीं बची थी। पलंग पर तकिये के नीचे रखी ज़हर की डिबिया को देखते ही वह अशक्त हो गये। कुछ क्षण उस डिबिया को हाथ में लिये यूं ही खड़े रहने के बाद उन्होंने अपनी सारी शक्ति एकत्रित की और चिल्लाकर अपने बेटे को आवाज़ दी,
"प्रबल...! यह क्या है..?"



मेरी फ़ोटो
समाचार सुनते हुए एक दिन न्यूज चैनल पर 
देखा-- "कोई बीमारी है जो चीन के वुहान प्रान्त में
 फैल रही है ।" हॉस्पिटलों की अफरा-तफरी देख दुख
 हुआ और बीमारी का कारण "वैट मार्केट" है यह जान
 कर क्षोभ हुआ कि क्या जरूरी है कुछ भी खाना ।
 ऐसे में ही एक दिन जाना कि इस बीमारी ने विश्व के 
अन्य देशों के साथ-साथ भारत में भी दस्तक दे दी है । 


मुझको तेरा ही सहारा मेरे मालिक।
रोक इन बेमौत मरती जिन्दगी को।।

कैसे कह दूं अब मुहब्बत की ग़ज़ल मैं।
हर तरफ रोते देखा हर आदमी को।।

उलूक टाईम्स से ...डॉ. सुशील जोशी

‘उलूक’ 
रात के अंधे को 
दिन की बात में 
दखल नहीं देना होता है 

कविता कहना 
गुस्ताखी होगी 

मगर 

लम्बी 
कविता का
फार्मेट 

और 
बकवास 
करने का फार्मेट 

लगभग
एक जैसा ही होता है ।
.....
अब बस
लग रहा है कि
अंक भी सिकुड़ते जा रहा है
बिलकुल हमारी तरह
सादर



Saturday, May 2, 2020

342..जब मुझे लोगों की जरूरत थी... उन्होंने मुझे छोड़ दिया....

सादर अभिवादन
कल का सारा दिन 

गहरी नींद में थी देवी जी
और रात में..
कभी किचन में..कभी बॉलकनी में
सुबह 5 बजे सोई अब उसका सबेरा हुआ

खैर ..अब दुरुस्त है..
चलिए आज के चयन की ओर....


आँधी के आमंत्रण का गीत ...जयकृष्ण राय तुषार

षड्यंत्रों से 
महायुद्ध से 
कभी नहीं हम डरते ,
अतिशय हो 
तो महाकाल बन 
केवल तांडव करते ,
इसका प्रहरी 
चक्र सुदर्शन 
परशुराम का बान है | 

अज्ञात सफ़र ....रवीन्द्र सिंह यादव

सफ़ेद कबूतर ने
लौटने का निश्चय किया
जहाँ से उड़ा था
उस ओर मुड़ा था
थक-हारकर
साहिल पर आ गिरा था
ज्वार आया तो
सुरक्षित ज़मीन पा गया था
सांसें सामान्य हुईं
प्राची में लालिमा देख
नवजीवन पाकर
जिजीविषा के साथ
उड़ गया ज्ञात परिवेश में





पंछियों का आमद सुकून है .....प्रतिभा कटियार

कल सारा दिन जररररर्र से निकल गया. किया क्या कुछ याद नहीं. लेकिन बेजारी सी रही हर वक्त. इतनी बेजारी कि कुछ लिखने का भी जी न किया. यूँ बेजारी तो रहती ही है इन दिनों हरदम. सारी दुनिया मजदूर दिवस मना रही थी सिवाय मजदूरों के. कहीं से कोई खबर न आई कि आज मजदूरों ने पेटभर खाया और इस तरह दिन सेलिब्रेट किया. कहीं से कोई खबर न आई कि आज मजदूरों का भी सम्मान होना जरूरी है ऐसा कहा सुना गया हो कहीं. 


मुखौटा ...कुसुम कोठारी

जो फूलों सी ज़िंदगी जीते कांटे हज़ार लिये बैठे हैं ।
दिल में फ़रेब मुख पे मुस्कान का मुखौटा लिये बैठें हैं।।

खुला आसमां ऊपर,ख्वाबों के महल लिये बैठें हैं ‌
कुछ, टूटते अरमानों का ताजमहल लिये बैठें हैं। ‌।


छाँह कहाँ रह गई ....विनोद प्रसाद

मनचाही जाने अब चाह कहाँ रह गई
पहुँचा दे घर तलक,राह कहाँ रह गई

दंतहीन वृक्ष खड़े रास्तों में कतारों से
सुलग रही धूप में छाँह कहाँ रह गई


भूख के लिए विश्व युद्ध ... गुरुमिन्दर सिंह

तीसरे विश्वयुद्ध की,
शुरूआत हो रही है,
समझौतों के बंड़ल,
जेब में डालो,
और करो परीक्षण,
कश्मीर या रवांडा में,
समुन्द्र और एकान्त बचा नहीं,
हो सके तो,
कहीं घनी आबादी में,
बम्ब फोड़कर देख लो,
..
आज बस
शायद कल फिर
सादर



Friday, May 1, 2020

341..अपना अडिगासन जमाए रखें अपने ही निवास में

सादर अभिवादन

अपना अडिगासन जमाए रखें
अपने ही निवास में
बाहर में फंसे लोग जैसे ही घर
पहुंचे कि व्यापारे-कोरोना
में लेन-देन शुरु हो गया
समझ में आ रहा है कि
2020 का वर्ष 
कोरोना की बेरीकेडिंग में ही बीतेगा
देखतें है आज क्या है
कोरोना के अलावा..


majdoor%2Bdiwas
फिर वह एक मंदिर में जाकर भजन कीर्तन करने लगा। यह भगवान का ही प्रसाद था कि लोग उसे महात्मा समझकर उसके भक्ति भाव में डूबे भजन सुनने दूर-दूर से आने लगे। एक दिन एक सज्जन आए जिसने उसे अपने घर भोजन पर बुलाया। घर पहुंचकर उसने स्वादिष्ट भोजन किया। थोड़ा विश्राम करने के बाद जब उस सज्जन को उसने अपनी कहानी सुनाई तो वे सिहर उठे। सुनकर उन्हें लगा जैसे उन्हें कोई अपना आत्मीय मिल गया। उन्होंने उसे अपनी फैक्टरी में नौकरी करने का आमंत्रण दिया तो उसने झट से अपनी स्वीकृति दे ही। अंधे को क्या चाहिए दो-आँखें। वह बहुत खुश था आखिर उसे नौकरी मिल गई। 


वह मेरा खपरैल का घर
मेरा इंतज़ार कर रहा होता है
फिर सुस्त हो जाता हूँ चलते- चलते
वहीं कहीं पेड़ की घनी छांव में
लेटकर तारों से बतियाना चाहता हूँ


मजबूर... एक मई मजदूर दिवस है। इस दिवस से करीब महीने भर पहले से मजदूर मजबूर हो गए हैं और अब भी मजबूर हैं। कोरोना वायरस के कहर ने उनसे उनका काम छीन लिया है और वो चिलचिलाती धूप में कभी पैदल तो कभी ट्रकों के उपर सवार होकर अपने घर जाने की कोशिश कर रहे हैं। इस मजदूर दिवस पर कोई समारोह नहीं होगा। यदि होता तो भी मजदूरों की हालत शायद ही बदलती।


Shayari
होश में लाने को
लोग मुझ पर
पानी डालते हैं
और फिर से
मैं बेहोश हो
जाता हू
सादर...