Friday, August 7, 2020

439.....रवींद्रनाथ.टैगोर

आज का अंक सादर समर्पित
रवींद्रनाथ टैगोर

तुम नए-नए रूपों में, प्राणों में आओ / 
रवीन्द्रनाथ ठाकुर » गीतांजलि »

तुम नए-नए रूपों में, प्राणों में आओ।
आओ, गंधों में, वर्णों में, गानों में आओ।

आओ अंगों के पुलक भरे स्पर्श में आओ,
आओ अंतर के अमृतमय हर्ष में आओ,
आओ मुग्ध मुदित इन नयनों में आओ,
तुम नए-नए रूपों में, प्राणों में आओ।

आओ निर्मल उज्ज्वल कांत
आओ सुंदर स्निग्ध प्रशांत
आओ विविध विधानों में आओ।

आओ सुख-दुख में, आओ मर्म में,
आओ नित्य नैमेत्तिक कर्म में,
आओ सभी कर्मों के अवसान में
तुम नए-नए रूपों में, प्राणों में आओ।

मूल बांग्ला से अनुवाद : रणजीत साहा

----////---////---////---

थोड़ी सी छुअन लगी
थोड़ी सी बातें सुनी
उन ही से मन में मेरे
रची मन में फाल्गुनी


कुछ तो पलाश का नशा
कुछ चंपा के गंध मिला
उन ही से सुर पिरोये
रंग ओ’ रस जाल बुने


जो थोड़ी देर पास आते
क्षणों के बीच में से
चकित मन कोने में
स्वप्न की छवि बनाते

जो थोड़ी सी दूर भी जाते
भावना स्वर कँपाते
उन ही से दिन बिताये
नूपुर के ताल गिने

थोड़ी सी छुअन लगी...

हिन्दी में अनुवाद : मानोशी चटर्जी

-----////----////-----////------

अगर प्‍यार में और कुछ नहीं
केवल दर्द है फिर क्‍यों है यह प्‍यार ?
कैसी मूर्खता है यह
कि चूँकि हमने उसे अपना दिल दे दिया
इसलिए उसके दिल पर
दावा बनता है,हमारा भी
रक्‍त में जलती इच्‍छाओं और आँखों में
चमकते पागलपन के साथ
मरूथलों का यह बारंबार चक्‍कर क्‍योंकर ?

दुनिया में और कोई आकर्षण नहीं उसके लिए
उसकी तरह मन का मालिक कौन है;
वसंत की मीठी हवाएँ उसके लिए हैं;
फूल, पंक्षियों का कलरव सब कुछ
उसके लिए है
पर प्‍यार आता है
अपनी सर्वगासी छायाओं के साथ
पूरी दुनिया का सर्वनाश करता
जीवन और यौवन पर ग्रहण लगाता

फिर भी न जाने क्‍यों हमें
अस्तित्‍व को निगलते इस कोहरे की
तलाश रहती है ?

अंग्रेज़ी से अनुवाद : कुमार मुकुल

-------////-----////-------

आज जागी क्यों मर्मर-ध्वनि !
पल्लव पल्लव में मेरे हिल्लोल,
हुआ घर-घर अरे कंपन ।।
कौन आया ये द्वारे भिखारी,
माँग उसने लिए मन-धन ।।
जाने उसको मेरा यह हृदय,
उसके गानों से फूटें कुसुम ।
आज अंतर में बजती मेरे,
उस पथिक की-सी बजती है ध्वनि ।।
नींद टूटी, चकित चितवन ।


मूल बांगला से अनुवाद : प्रयाग शुक्ल

('गीत पंचशती' में 'पूजा' के अन्तर्गत 133 वीं गीत-संख्या के रूप में संकलित)
-------//////-------

और चलते-चलते एक विशेष
लेख आप भी पढ़िए

मूलर के जीवनी लेखक नीरद चौधरी का मत है कि ‘इस भेंट के बाद उसने मध्यम मार्ग अपनाया’, (वही. पृ. १३४), या यह कहिए कि उसने एक बहुरुपिया जैसा खेल खेला जिससे कि ब्रिटिशों के राजनैतिक उद्‌देश्यों की भी पूर्ति होती रह और भारतीयों को भी शब्द जाल में बहकाए रखा ? मैक्समूलर एक अर्न्तमुखी व्यक्ति था जिसने ऋग्वेद के भाष्य करने के पीछे अपने सच्चे मनोभावों और उद्‌देश्यों को अपने जीवन भर कभी भी सार्वजनिक रूप से उजागर नहीं किया ! मगर अपने हृदय की भावनाओं को १५ दिसम्बर १८६६ को केवल अपनी पत्नी को लिखे पत्र में अवश्य व्यक्त किया ! उसके ये मनोभाव एवं उद्‌देश्य आम जनता को तभी पता चल सके जब उसके निधन के बाद, १९०२ में उसकी पत्नी जोर्जिना मैक्समूलर ने उसकी जीवनी व पत्रों को सम्पादित कर दो खण्डों में एक दूसरी जीवनी प्रकाशित की ! यदि श्रीमती जोर्जिना उसे अप्रकाशित पत्रों को प्रकाशित न करती तो विश्व उस छद्‌मवेशी व्यक्ति के असली चेहरे को आज तक भी नहीं जान पाता ! अपनी पत्नी को लिखे इस पत्र में मैक्समूलर ने अपने वेद भाष्य के उद्‌देश्य को पहली बार दिल खोलकर उजागर किया ! वह लिखता हैः
-----/////------

आज का अंक यही तक।

कल फिर से मिलिए यशोदा दी से।

#श्वेता 

Thursday, August 6, 2020

438..मेरा पुरुष बहुरूपिया ..फणीश्वर नाथ रेणु

हमारी ही लापरवाही से 
कम्प्यूटर के की बोर्ड पर 
चाय की प्याली लुढ़क गई...
असमर्थ हैं हम...और क्षमा के
अधिकारी भी नहीं है..
लोग कहेंगें कि की बोर्ड भी 
कप रखने की जगह है क्या
....


दुनिया दूषती है

हँसती है
उँगलियाँ उठा कहती है ...
कहकहे कसती है -
राम रे राम!
क्या पहरावा है
क्या चाल-ढाल
सबड़-झबड़
आल-जाल-बाल
हाल में लिया है भेख?
जटा या केश?
जनाना-ना-मर्दाना
या जन .......
अ... खा... हा... हा.. ही.. ही...
मर्द रे मर्द
दूषती है दुनिया
मानो दुनिया मेरी बीवी
हो-पहरावे-ओढ़ावे
चाल-ढाल
उसकी रुचि, पसंद के अनुसार
या रुचि का
सजाया-सँवारा पुतुल मात्र,
मैं
मेरा पुरुष
बहुरूपिया।
- फणीश्वर नाथ रेणु

Wednesday, August 5, 2020

437....आँखों में अमर प्रतीक्षा

आज का अंक
शिवमंगल सिंह 'सुमन' जी के जन्मदिन
पर सादर समर्पित

आंखों में अमर-प्रतीक्षा ही
बस एक मात्र मेरा धन है
मेरी श्वासों, निःश्वासों में
आशा का चिर आश्वासन है

शब्द, रूप, रस, गंध तुम्हारी
कण-कण में बिखरी
मिलन साँझ की लाज सुनहरी
ऊषा बन निखरी,
हाय, गूँथने के ही क्रम में
कलिका खिली, झरी
भर-भर हारी, किंतु रह गई
रीती ही गगरी।
कितनी बार तुम्हें देखा
पर आँखें नहीं भरीं।


तन खोया-खोया-सा लगता मन उर्वर-सा हो जाता है
कुछ खोया-सा मिल जाता है कुछ मिला हुआ खो जाता है।

लगता; सुख-दुख की स्‍मृतियों के कुछ बिखरे तार बुना डालूँ
यों ही सूने में अंतर के कुछ भाव-अभाव सुना डालूँ

सागर की अपनी क्षमता है
पर माँझी भी कब थकता है
जब तक साँसों में स्पन्दन है
उसका हाथ नहीं रुकता है
इसके ही बल पर कर डाले
सातों सागर पार


शिवमंगल सिंह 'सुमन' के
स्वर में एक कविता
तुम्हें भूला नहीं हूँ

----
आज का अंक
उम्मीद है आपको अच्छा लगा होगा।

कल फिर से मिलिए
यशोदा दी से।

श्वेता





Tuesday, August 4, 2020

436..हिम्मती हैं भारतवासी डरते नहीं है

सादर नमस्कार
राखी गई..कोरोना को साए में
हिम्मती हैं भारतवासी
डरते नहीं है
शरीर भले ही छूट जाए
बहना नहीं छूटनी चाहिए
सख़्त लॉकडाउन के चलते
आवा-गमन जारी रहा
चलिए आज की रचनाएँ देखें
आज तीन अनीता की रचना है...

गर मुहब्बत सहारा नहीं,
दुश्मनी से गुज़ारा नहीं ।

पास अपने बुला लो हमें,
या तो कह दो तुम्हारा नहीं ।

दूरियाँ सह न पायेंगे हम,
तेरे बिन अब गुज़ारा नहीं ।



राम राम बस राम मय,हृदय बसे श्रीराम।
घट घट में जो व्याप्त हैं,कौशलेय हरि नाम।।
दिव्य अलौकिक रूप को,पूजें सब नर नारि
बीज मंत्र के जाप से,पतित पावनी धाम।।


कुछ बुलबुले हवा में गढ़ता
सूनेपन की सिहरन दौड़ाता  
कुछ विचार अधरों पर रखता  
हल्की साँकल की ध्वनि  
अंतस पर मढता प्रभाव लिए लाया है।


कोविड के साये में मनाया है 
राखी का उत्सव इस बार
बचा रहे भाई इस संक्रमण से 
कलाई में बाँधा है रक्षा सूत्र 
 शुभकामना यही देकर हजार बार 
बदले में भाई भी दे रहा यही दुआ 
बहना ! नित मास्क पहनना 


जीवन -
पथ अशेष, उम्र का सफ़र फिर भी
अधूरा, बेशुमार वादे और
असंख्य इंतज़ार,
हथेलियों
में आए सिर्फ़ बादलों का चूरा। ये
कौन है जो आख़री पहर देता
है दस्तक, न ज़मीं, न
कोई आसमां मेरा,
...
बस
कल की कल
सादर

Monday, August 3, 2020

435 ..ये लड़के आपस में कैसी बातें करते हैं ?

अदा से हाथ उठते हैं गुल-ए-राखी जो हिलते हैं  
कलेजे देखने वालों के क्या क्या आह छिलते हैं  
-नज़ीर अकबराबादी
सादर अभिवादन
आज का अंक
एक ही ब्लॉग से
आत्ममंथन
ब्लॉग निगार हैं
आदरणीय डॉ. टी.एस.दराल
मेडिकल डॉक्टर, न्युक्लीअर मेडीसिन फिजिसियन-- ओ आर एस पर शोध में गोल्ड मैडल-- एपीडेमिक ड्रोप्सी पर डायग्नोस्टिक क्राइटेरिया सरकार से स्टेट अवार्ड प्राप्त-- दिल्ली आज तक पर --दिल्ली हंसोड़ दंगल चैम्पियन -- नव कवियों की कुश्ती में प्रथम पुरूस्कार --- अब ब्लॉग के जरिये जन चेतना जाग्रत करने की चेष्टा -- अपना तो उसूल है, हंसते रहो, हंसाते रहो. --- जो लोग हंसते हैं, वो अपना तनाव हटाते हैं. --- जो लोग हंसाते हैं, वो दूसरों के तनाव भगाते हैं. -- 
बस इसी चेष्टा में लीन...
सीधे व सरल डॉ. दराल आपका स्वागत है
पढ़िए उनकी रचनाएँ..

एक मित्र हमारे ,
बन्दे सबसे न्यारे।

मूंछें रखते भारी   ,
सदा सजी संवारी ।

कोई छेड़ दे मूंछों की बात ,
फरमाते लगा कर मूछों पर तांव।


आप यहाँ इस कवि सम्मेलन में क्या कर रहे हैं ?
जी हम यहाँ कविता सुनाने आये हैं।
क्या बुलाने पर आये हैं ?
जी नहीं, हम बिन बुलाये स्वयं ही चले आये हैं।
क्या आपको पता है, बिन बुलाये कविता सुनाने पर
आपको पैसे नहीं मिलेंगें ?
जी, पता है।
जब आपको पता था कि बिन बुलाये
कविता सुनाने पर आपको पैसे नहीं मिलेंगे,
तो फिर आप यहाँ क्यों आये ?
जी, राष्ट्र हित में आये।



फेसबुक पर हम इतना झूल गए,
के कविता ही लिखना भूल गए।

जिसे देनी थी जीवन भर छाया ,
उस पेड़ को सींचना भूल गए।

मतलब में अपने कुछ ऐसे डूबे,
देश पर मर मिटना भूल गए ।

भूले बिसरे

एक हरियाणवी ताऊ का छोरा, जब टॉप कर गया
रिजल्ट देख कर ताऊ का दिल,  गर्व से भर गया .

उसे अपने मेडिकल कॉलेज के दिन याद आ गए
जो दिल के सोए बरसों पुराने अरमान जगा गए .

बोला , अब तो काली कम्बली वाले को भेंट चढाऊंगा ,
और सोच लिया , छोरे को लेडी हार्डिंग में ही पढ़ाऊंगा .



पुरुष प्रधान समाज में 
पुरुषों की हेरा फेरी -- 
बार बार, लगातार !
कॉलिज के दिनों में एक जोक बहुत सुना जाता था -- 
दो सहेलियां आपस में बातें कर रही थी . 
एक ने कहा -- ये लड़के आपस में कैसी बातें करते  हैं ?  
दूसरी बोली -- जैसी हम करते हैं . 
आज तीस साल बाद वे सब लड़के लड़कियां पुरुष और महिलाएं बन चुके होंगे . लेकिन अब ऐसा महसूस होता है कि शायद पुरुष महिलाओं से कहीं ज्यादा बदमाशी करते हैं . फिर जाने महिलाएं क्यों बराबरी का दम भरती हैं .
....
एक निवेदन..
ब्लॉग मे जाकर सारे पढ़ डालिए
सादर

Sunday, August 2, 2020

434..कलाकारों पर क्यों नहीं छोड़ देता है वो बना लेंगे पेंटिंग हूबहू

नमस्कार
आज मित्रता दिवस है
मित्र के बारे में एक नज़रिया
जो आपको 

हर अच्छाई और कमी के साथ 
स्वीकार करे. 
वही सच्चा मित्र है
...
आज की पसंदीदा रचनाओं की ओर चलें


रिक्त हुई समाज से रीत लौट आई है ..अनीता सैनी

बात हृदय पर लगे आघात की है 
शब्दों के भूचाल से उठे  बवंडर की है 
सूखी घास में लगाई जैसे आग की है 
लगानेवाले भी अपने ही किसी ख़ास की है 
किसी का गढ़ा द्वेष 
किसी के सर मढ़ा जाएगा  


तुम एक टूटा हुआ काँटा हो ...पूजा प्रियंवदा

होना और नहीं होना
निरंतर प्रक्रिया है
जैसे खोना पाना
कुछ और खोना कुछ और पाना
फिर खुद ही कोई गुम लम्हा हो जाना
जिसे कोई नहीं ढूंढ रहा


वो, महफ़िल और इश्क़ ...महेश बरमटे "माही"

मैंने कुछ कहानियाँ गढ़ीं 
कुछ किस्से कहे 
वो शामिल थे मुझमें 
वो सुनते रहे। 

वो दूर बैठे थे महफ़िल में 
तमाशबीन बन कर 
सीने से लगने को जी किया 
अश्क़ बहते रहे। 


सावन की छटा निराली है ..सुरेन्द्र शुक्ल

मलयानिल बह रही आज ,
रिमझिम फुहार सुखदाई है
खिले पुष्प अनुपम गुलाब
हर ओर बिछी हरियाली है



गरमा-गरम पन्ना उलूक का

चेहरा लिखना
किसी के बस में
होता भी है या नहीं होता है
इस पर ना किसी ने कभी कुछ कहा होता है
ना कुछ कहीं लिखा होता है

मुखौटे
एक चेहरे के कई हो सकते हैं
कई चेहरों पर
एक मुखौटा कभी हो ही नहीं सकता है

सारा लिखा लिखाया
मुखौटा ओढ़ कर ही लिखा जाता है

कोई हो
तुलसी हो कबीर हो सूर हो
सबके मुखौटे की छाया
लिखा लिखाया साफ साफ दिखा जाता है

..
आज बस
कल की कल
सादर


Saturday, August 1, 2020

433.दर्द यदि हद से गुजर जाए तो फिर कोई दवा काम नहीं करती

1 अगस्त
इस वर्ष पहले ही दिन से
उत्सवों की शुरुआत हो गई है
बंद को दौर भी चालू है
खैर ये तो होना ही था
और सहना भी पड़ेगा
जीवित जो रहना है..


चाय और कविता ...
Black Coffee, Coffee, Cup, Desk, Drink
शायद मेरी कविता 
चाय पी-पीकर ऊब गई है,
लगता है,अब चाय नहीं,
कुछ और चाहिए उसे.


ये दर्द कब हद से गुजरेगा ....
मेरी फ़ोटो
कहते हैं ना कि दर्द यदि हद से गुजर जाए तो 
फिर कोई दवा काम नहीं करती, 
दर्द खुद ही दवा बन जाता है। 
इसलिए यह बात तो साफ़ है कि 
इस बहादुर वर्ग को भी डर तभी तक सताएगा 
जब तक इसकी जेब और रसोई साथ देगी। 
जिस दिन दोनों रीत गए 
फिर इसे किसी हारी-बिमारी-कोरोना का डर नहीं रहेगा, 
चिंता रहेगी तो अपने परिवार की ! 
क्योंकि है तो वो एक पारिवारिक प्राणी ही ! 


कि मेरे भगवान हो तुम ...

शाम-ए -महफ़िल है- 
मेरे दिल के मेहमान हो तुम।
मेरी चाहत है समंदर! 
फिर क्यों परेशान हो तुम?

सबने मुख मोड़ लिया, 
आँखें हैं नम,व्याकुल मन
दीप आँधी में जला लूँगी  
कि मेरे भगवान हो तुम।


मोहब्बत में तुम कुछ यूँ भीग जाना ....
Romantic hindi poetry
भीगे बदन में 
ठिठुरन जो होगी
मीठा सा दर्द होगा
उसे तुम सह जाना

ये सावन का मौसम
और बारिश की बूँदें
मोहब्बत में तुम
कुछ यूँ भींग जाना


प्रेमचंद... एक पत्र

यूँ तो आपसे मेरा प्रथम परिचय आपकी लिखी कहानी 
'बड़े घर की बेटी' से हुआ। हाँ हाँ जानती हूँ आप मुझे नहीं जानते हैं 
परंतु मैं आपको आपकी कृतियों के माध्यम से बहुत अच्छे से जानती हूँ और आज तक आपके विस्तृत विचारों के नभ की अनगिनत 
परतों को पढ़कर समझने का प्रयास करती रहती हूँ।
...आज के लिए बस
सादर