Thursday, August 19, 2021

735..मुसलमानों में ही बंटवारा करवा दिया है। कत्लेआम शुरू करवा दिया है।

 सादर अभिवादन..

इस नगर में,
लोग या तो पागलों की तरह
उत्तेजित होते हैं
या दुबक कर गुमसुम हो जाते हैं।
जब वे गुमसुम होते हैं
तब अकेले होते हैं
लेकिन जब उत्तेजित होते हैं
तब और भी अकेले हो जाते हैं।

- अलकनंदा सिंह


आज की स्टोरी
दयानन्द पाण्डेय उवाचः
अब देखिए न उत्तर प्रदेश का चुनाव जीतने के लिए अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान को भेज दिया है। अभी तक हिंदू , मुसलमान करते थे। अब मुसलमान , मुसलमान करने लगे हैं। मुसलमानों में ही बंटवारा करवा दिया है। कत्लेआम शुरू करवा दिया है। औरतों पर ज़ुल्म तो ज़ुल्म , मुसलमानों को मुसलमानों से ही लड़वा दिया है। यहां तक कि पाकिस्तान और हिंदुस्तान के मौलवी , मुल्ला को भी लड़वा दिया है। पाकिस्तान के मुल्ला , मौलवी अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान की हरक़तों की मजम्मत कर रहे हैं और भारत के मौलवी , मुल्ला तालिबान की खुशामदीद में संलग्न नज़र आ रहे हैं। अजब मंज़र है।

ये भाजपा , आर एस एस वाले जो न करवा दें , कम है। पंजाब में चुनाव जीतने के लिए पाकिस्तान में महाराजा रणजीत सिंह की मूर्ति भी कल तोड़वा दी। और सिद्धू से कह दिया , खबरदार जो इस पर कुछ बोला। सो सिद्धू समेत समूची सिख संगत ख़ामोश है। सिख संगत की देखा-देखी , सभी वामपंथी और कांग्रेसी आदि-इत्यादि भी डर कर ख़ामोश हो गए। और तो और अतिवादी राकेश टिकैत के जहरीले बोल भी बंद। ऐसे , गोया शत्रुघन सिनहा ने ख़ामोश ! बोल दिया हो। अभी देखिए और क्या-क्या करते हैं यह लोग !

सब का साथ , सब का विकास , सब का विश्वास शायद कम पड़ रहा था जो अब की 15 अगस्त को लाल क़िले से इस में सब का प्रयास भी जोड़ दिया। सब का प्रयास शब्द जोड़ते ही भाजपा वालों ने अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान को इशारा किया और तालिबान ने बिना किसी देरी के 15 अगस्त से ही प्रयास शुरू कर दिया। बताइए कि कमल खिलाने के लिए भाजपा वाले अब सरहद पार भी पहुंच गए। मैं तो कहता हूं कि अगर भाजपा , आर एस एस से सब लोग डरे हुए हैं , कुछ नहीं बोल पा रहे तो चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट को इस का स्वत: संज्ञान ले लेना चाहिए। क्यों कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता , 
सहिष्णुता आदि शब्द बौने हो कर विश्राम मोड में आ गए हैं।




ताकत और हथियारों के बल पर
सत्ता स्थापित करने की  कहानियाँ
इतिहास के लिए नयी नहीं...,
नयी तो होती है
पुनर्जन्म लेकर भी
गुलामों की फौज में शामिल होने की
अपरिवर्तित प्रवृतियाँ।


सायादार दरख़्तों के बीच है
पिंजरों का संसार, बंद कांच के घरों में तैरती,
रंगीन मछलियां,
खोलती हैं मुग्धता का द्वार,
इन कटहरों से झांकते हैं
कुछ विश्व विख्यात चेहरे,
जिन्हें मिल चुका है,
चुप रहने का - -पुरस्कार,


शरीया कानून को अल्लाह का हुक्म मानने वाले तालिबानी ज़ुल्म-ओ-सितम की सारी हदें पार कर दिया करते हैं, इधर भारत के देवबंदियों को अफगानिस्तान में अमन-ओ-चैन का आलम दिखायी देने लगा है । ज़ाहिर है कि देवबंदियों के सपनों में भारत के लिये भी वैसे ही अमन-ओ-चैन के आलम की तस्वीरें बड़ी हिफ़ाजत से सुरक्षित हैं । जो सेकुलर यह कहते नहीं थकते कि दुनिया के सभी धर्म इंसानियत का पाठ पढ़ाते हैं उन्हें एक बार अफगानिस्तान, यमन, सीरिया और पाकिस्तान जैसे देशों में कुछ दिन ज़रूर गुजारने ही चाहिये


पूज्य पिता जी
मैं बेहद शर्मिन्दा हूँ। आज आपको मेरी वजह से लज्जित होना पड़ा। आगे प्रयास करूँगा कि ऐसा मौका दोबारा ना आये। आप आम का वृक्ष लगा रहे हैं , आपको बबूल का काँटा ना मिले। भविष्य में शायद गर्व करने लायक पुत्र बन सकूँ। तब आप मुझे क्षमा कर देंगे न?
....
आत्म कथ्य 
गांधार,अफगानिस्तान और सम्पूर्ण वाहिक प्रदेश
भारत का था, है और रहेगा
सादर

Wednesday, August 18, 2021

734 ...इस्लाम से पहले बौद्ध ही उनका धर्म था ...

सादर अभिवादन
वह प्राइमरी स्कूल की टीचर थी |  
सुबह उसने बच्चों का टेस्ट लिया था और उनकी कॉपियां जांचने के लिए घर ले आई थी |
बच्चों की कॉपियां देखते-देखते उसके आंसू बहने लगे. उसका पति वहीं लेटे-लेटे मोबाइल देख रहा था |  

उसके रोने का कारण पूछा ।

टीचर बोली , “सुबह मैंने बच्चों को  
‘मेरी सबसे बड़ी ख्वाहिश ’ विषय पर कुछ  पंक्तियाँ लिखने को कहा था ;

एक बच्चे ने इच्छा जाहिर की है कि- भगवन उसे  "मोबाइल" बना दे |
यह सुनकर पतिदेव हंसने लगे |
टीचर बोली , “आगे तो सुनो बच्चे ने लिखा है-

यदि मैं mobile बन जाऊंगा, तो घर में मेरी एक खास जगह होगी और  
सारा परिवार मेरे इर्द-गिर्द रहेगा |  
जब मैं बोलूँगा, तो सारे लोग मुझे ध्यान से सुनेंगे |
मुझे रोका टोका नहीं जाएगा
और नहीं उल्टे सवाल होंगे |  

जब मैं mobile बनूंगा, तो पापा ऑफिस से आने के बाद थके होने के बावजूद मेरे साथ बैठेंगे |


मम्मी को जब तनाव होगा,
तो वे मुझे डाटेंगी नहीं, बल्कि मेरे साथ रहना चाहेंगी |

मेरे बड़े भाई-बहनों के बीच मेरे पास रहने के लिए झगड़ा होगा |  

यहाँ तक की जब mobile बंद रहेंगा, तब भी उसकी अच्छी तरह देखभाल होगी |  

और हाँ, mobile के रूप में मैं सबको ख़ुशी भी दे सकूंगा | “

यह सब सुनने के बाद पति भी थोड़ा गंभीर होते हुए बोला -


 ‘हे भगवान ! बेचारा बच्चा …. उसके माँ-बाप तो उस पर जरा भी ध्यान नहीं  देते !’

टीचर पत्नी ने आंसू भरी आँखों से  

पति की तरफ देखा और बोली-

“जानते हो, यह बच्चा कौन है? …हमारा अपना बच्चा……

.. हमारा छोटू |”

सोचिये, यह छोटू कहीं आपका बच्चा ....
तो नहीं ।

आज की भाग-दौड़ भरी ज़िन्दगी में हमें वैसे ही एक दूसरे के लिए कम वक़्त मिलता है , और अगर हम वो भी सिर्फ टीवी देखने , मोबाइल पर खेलने और फेसबुक से चिपके रहने में गँवा देंगे तो हम कभी अपने रिश्तों की अहमियत और उससे मिलने वाले प्यार को नहीं समझ पायेंगे।
**आज की स्टोरी**

गांधीजी चले गए,
मेरी नींद टूट गई,
मैं सोचता हूँ,
सपने देखना आसान नहीं है,
रात को सपने आते नहीं,
और दिन में सपने देखने का
न समय है, न साहस.


चिंता तो तब की थी जब
बामियान में तोड़े गए बुद्ध
मैने बुद्ध से कहा भी था कि वे हार जायेंगे अंततः
हथियारों के आगे
बुद्ध मुस्कुराते रहे
मुस्कुराते हुए बुद्ध को देख मुझे आया था क्रोध भी
लेकिन बुद्ध बेफिक्र थे
मैं कभी बुद्ध से मिला नहीं इसलिए मुझे नहीं करनी चाहिए चिंता
बुद्ध की भी।


किसी अंध मोह के लिए
मैं धृतराष्ट्र नहीं बन सकता,
साथ चलना हो ग़र तुम्हें,
उतार फेंकों अंधकार की पट्टी,
ये पथ है शूलों से भरा,
ये कोई अंतःपुर नहीं है,


कुछ नहीं होता है पढ़कर उस लिखे पर
जो होता है खुद का किया हमेशा
लिखने वाले रोज मरते हैं रोज जीते हैं
लिखना लिखाना तू कर और बता
तूने तो खुदा लिखा


Tuesday, August 17, 2021

733 ..हलाहल कंठ में लिए, करें निज जग कल्याण

सादर अभिवादन
सखी पम्मी जी स्वयं अपने से कह रही हैं कि
गुफ़्तगू
अनभिज्ञ हूँ
काल से सम्बन्धित सारर्गभित बातों से ,
शिराज़ा है अंतस भावों और अहसासों का,
कुछ ख्यालों और
कल्पनाओं से राब्ता बनाए रखती हूँ
जिसे शब्दों द्वारा काव्य रुप में ढालने की कोशिश....

निर्गुण,निराकार,नियंता,धारे रूप विशाल।
शिव रूपी सत् सनातनी,मुदित हुए शिवशाल।।

हलाहल कंठ में लिए, करें निज जग कल्याण।
ऊँ कारा के बोल से, करो शिवम् का ध्यान।।



छोड़ो भी..
प्रश्न के बदले प्रश्न को
लम्हो की खता वर्षो में गुज़र जाएगी..
पत्थरो को तराश कर ही बनती है,
जिन्दगी के क्या का जबाब.


तलाश रहे..
अब भ्रष्टाचार में शिष्टाचार,
न कर प्रश्न जम्हूरियत पर
सब है कुर्सी के आस - पास ,
हो दौर किसी का भी
रहबर -ए-कौम तो थे आप,
कर रहे है हम गुजर,
बचे खुचे नम निवाले से,
घटा क्या बढ़ा क्या
इक़्तेदार के ख़जाने में बस

व्यथा भरी विरह वेदना से
आश की चादर बुन रही,
अश्रुपूरित दृगों से
जीवन की जिजीविषा गुन रही
अब तो समझों.. है न..
एक अभिशाप सी ये निर्धनता।


हादसों के फ़लसफ़े केवल हमीं तक तो नहीं
आज़माने के हुनर से, हाँ.. निगहबाँ हूँ अभी,

मूझसे रूठा हुआ है आसमाँ.. मेरा ज़मीं
आस की शम्मा जलाकर अब फ़िरोजाँ हूँ अभी।


नव भोर की आश से
स्वर्णी तारे गुथ रही

खिल रही निलांजना
धुंध ऊर्मि मुखर रही

मौन सी अभिव्यंजना
कागज पर बिखर रही
....
उपरोक्त रचनाएं सखी पम्मी जी को ब्लॉग से हैं
शाबाशी सारी उनके खीसे में
और गलियाँ मेरे डस्टबिन में
सादर

Monday, August 16, 2021

732 ..आज का यह अंक राष्ट्रकवि स्मृतिशेष सुभद्रा कुमारी चौहान को समर्पित

सादर अभिवादन
आज का यह अंक राष्ट्रकवि  स्मृतिशेष सुभद्रा कुमारी चौहान  को समर्पित
सुभद्रा कुमारी चौहान (16अगस्त 1904-15 फरवरी 1948) हिन्दी की सुप्रसिद्ध कवयित्री और लेखिका थीं। उनके दो कविता संग्रह तथा तीन कथा संग्रह प्रकाशित हुए पर उनकी प्रसिद्धि झाँसी की रानी (कविता) के कारण है। ये राष्ट्रीय चेतना की एक सजग कवयित्री रही हैं, किन्तु इन्होंने स्वाधीनता संग्राम में अनेक बार जेल यातनाएँ सहने के पश्चात अपनी अनुभूतियों को कहानी में भी व्यक्त किया। वातावरण चित्रण-प्रधान शैली की भाषा सरल तथा काव्यात्मक है, इस कारण इनकी रचना की सादगी हृदयग्राही है।

जन्माष्टमी आ रही है..ये पंक्तियाँ याद आ गई
यह कदंब का पेड़ अगर माँ होता यमुना तीरे।
मैं भी उस पर बैठ कन्हैया बनता धीरे-धीरे॥

ले देतीं यदि मुझे बांसुरी तुम दो पैसे वाली।
किसी तरह नीची हो जाती यह कदंब की डाली।।

तुम्हें नहीं कुछ कहता पर मैं चुपके-चुपके आता।
उस नीची डाली से अम्मा ऊँचे पर चढ़ जाता।।


कुछ और कविताएँ  स्मृतिशेष सुभद्रा जी की
गलबाहें हों या कृपाण
चलचितवन हो या धनुष बाण
हो रसविलास या दलितत्राण;
अब यही समस्या है दुरंत
वीरों का कैसा हो वसंत


रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार,
घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर गया स्वर्ग तत्काल सिधार,
यमुना तट पर अंग्रेज़ों ने फिर खाई रानी से हार,
विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार।


सरिता के नीरव प्रवाह-सा बढ़ता हो अपना जीवन।
हो उसकी प्रत्येक लहर में अपना एक निरालापन।।

रचे रुचिर रचनाएँ जग में अमर प्राण भरने वाली।
दिशि-दिशि को अपनी लाली से अनुरंजित करने वाली।।
....
दिल नही भरा अभी तक
क्या - क्या नहीं पढ़वा दूँ सोच रही हूँ
सादर

Sunday, August 15, 2021

731...स्वर्णिम युग में प्रवेश करना ही है ! इसी विश्वास के साथ सबको इस दिवस की शुभकामनाएँ

सादर नमस्कार
शुभकामनाएं आजादी की

वर्षों तक लोग स्वंय-स्फुर्त हो घरों से निकल आते थे। पूरे साल जैसे राष्ट्रीय दिवस का इंतजार रहता था ! पर अब लोग इनसे  जुडे समारोहों में खुद  नहीं आते, उन्हें बरबस वहां लाया जाता है। दुःख होता है, यह देख  कर कि अब इन पर्वों  को मनाया नहीं, बस  किसी तरह निपटाया  जाता है। इससे भी इंकार नहीं है कि देश-दुनिया का माहौल, अराजकता, आतंक, असहिष्णुता जैसे कारक भी इनसे दूरी बनाने के कारण हैं, पर कटु सत्य यही है कि लोगों की भावनाएं अब पहले जैसी नहीं रहीं ............!


15 अगस्त, वह पावन दिवस जब देशवासियों ने एकजुट हो आजादी पाई थी।कितनी खुशी, उत्साह और उमंग थी तब। वर्षों तक लोग स्वंय-स्फुर्त हो घरों से निकल आते थे, पूरे साल जैसे इस दिन का इंतजार रहता था। पर धीरे-धीरे आदर्श, चरित्र, देश प्रेम की भावना का छरण होने के साथ-साथ यह पर्व महज एक अवकाश दिवस के रूप मे परिवर्तित होने पर मजबूर हो गया। इस कारण और इसी के साथ आम जनता का अपने तथाकथित नेताओं से भी मोह भंग होता चला गया।
   
फिर स्वर्णिम युग में प्रवेश करना ही है ! इसी विश्वास के साथ सबको इस दिवस की, जिसने हमें भरपूर खुश होने का मौका दिया है, ढेरों शुभकामनाएं। वंदे मातरम, जय हिंद, जय हिंद  की सेना!  


असंख्य गुमनाम चीखें .. आहें ..
सिसकियाँ .. चित्कार भी ना जाने कितने
और इन्क़लाबी नारे भी शहीदों के
संग जले थे सपने भी कई उनके --
सयानी होती बेटियों को ब्याहने के सपने
सयाने होते बेटों के भविष्य के सपने
बेटे, भावी बहू, भावी पोते-पोतियों के सपने
बीमार अम्मा-बाबू जी के बुढ़ापे की
लाचारी को दूर करने के सपने
नवविवाहिता युवा पत्नी के वीरान दिनों
और सूनी रातों को गुलज़ार करने के सपने
प्रेयसी को किए गए रूमानी वादों को
अपनी बाँहों में भर कर पूरे करने के सपने ...
सब के सब .. जल गए .. सब राख हुए ..
और राख की धूसर कालिमा से
तैयार हुई साहिब ! .. काली स्याही ..
हाँ .. हाँ ...  काला पानी  की काली स्याही


यूँ तो .. ग़ुम रह जाती हैं ..
आज भी गुमनाम, ना जाने ..
एक मीरा नहीं, कईं मीराएँ,
अनगिनत कामकाजी मीराएँ,
थिरकाती हुईं,
'शेप' में बढ़ाए हुए,
रंगे 'नेलपॉलिश' से
अपने नाखूनों वाली
टपटपाती उंगलियाँ,
किसी दफ़्तर के
'कंप्यूटर' वाले
'क्वर्टी की-बोर्ड' पर ही।
कुछ कुशल गृहिणी मीराएँ,


इतने में सरदार पटेल  की आत्मा ने
अम्वेडकर  की आत्मा से पूछा
भाई संविधान में ये आरक्षण का
क्या चक्कर चलाया था ?
बेचारी सकपका कर बोली कि
मैंने तो बेहतरी के लिए ही
कानून बनाया था ।
मुझे क्या पता था कि
देश के नेता इतने नीचे गिर जायेंगे
कि इसी को अपना वोट बैंक बनाएँगे ।


कहो शान से
शायर ने भी कहा
दिलो जान से
सारे जहाँ से अच्छा
हिन्दोस्तान हमारा !

आन रखेंगे
अपने भारत का
मान रखेंगे
सूर्य से भी ऊपर
तेरा नाम रखेंगे !

,,,,
अब बस
कल लगा तो बुला लिया जाऊँगा
सादर 


Saturday, August 14, 2021

730..राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे। सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने।।

सादर अभिवादन
स्वतंत्रता दिवस की पूर्वसंध्या पर
आप सभी को नमन
एक दिन माता पार्वती जी ने महादेव जी से पूछा---
'आप हरदम क्या जपते रहते हैं?'
उत्तर में महादेव जी ने कहा "श्रीविष्णुसहस्त्रनाम"
इस पर माता पार्वती जी ने कहा, आपके लिए तो सब सम्भव है 
पर कलियुग में साधारण मनुष्य के लिए तो 
इस का पाठ, जाप करना कठिन है, 
तो प्रभु मनुष्यों के कल्याण के लिए कोई 
एक नाम बताइये जो सहस्त्र नामों के ही बराबर हो..
इस पर महादेव जी ने कहा----
राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे।
सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने।।
अर्थात-राम नाम का जप ही सबसे शुभ है,
और सब प्रकार के आनंद का धाम है,
सहस्रनामों के समान है और
राम नाम सभी अभिलाषाओं की पूर्ति करता है...
पुनः महादेव जी राम जी से कहते हैं..

मुमूर्षोर्मणिकणर्याम तु अर्धोदकनिवासिनः।
अहं ददामि ते मन्त्रं तारकं ब्रह्मदायकम्।।
----अर्थात्----
मृत्यु के समय मणिकर्णिका घाट पर गंगाजी में
जिस मनुष्य शरीर गंगाजल में पड़ा रहता है,
उसको मैं आपका तारक मन्त्र देता हूँ,
और वो ब्रह्म में लीन हो जाता है.

अब देखिए आज की पाँच रचनाओं के शीर्षक

उपरोक्त लिंक से हट कर
आज सुबह-सुबह पढ़ी कि एक सप्ताह में
चीन पाकिस्तान का प्रशासन अपने हाथ में ले लेगा
यदि ये सही नहीं, तो गलत भी नहीं
हालात कुछ ऐसे ही हैं तालिबान और
चीन दोनों ओर से घिरा है पाक
अपनी ही कुल्हाड़ी में पैर मार लिया पाक

एक ख़ुशगवार सुबह की चाह में
सभी खड़े हैं गेरुआ नदी के किनारे,
नाभि पर्यन्त पानी में
डूबा हुआ देह कर चला है -
अन्तर्जलि यात्रा,


अब हम वो सब कुछ खोना चाहते हैं
ऐ मणिकर्णिका हम तो बस तेरे ही होना चाहते हैं




खाद, बीज
आकाश छू रहे
डीजल ने भी
पर खोले
दिल्ली
नहीं किसी की सुनती
कोई
कितना भी बोले
भूमि-पुत्र कब तक
अपनी
इस बदहाली पर रोयेगा
सब्र कभी तो


और अंत में
अभी न होगा मेरा अंत ..निराला जी
पुष्प-पुष्प से तंद्रालस लालसा खींच लूँगा मैं,
अपने नवजीवन का अमृत सहर्ष सींच दूँगा मैं,
......
मन की सोच है
सादर


Friday, August 13, 2021

729 ...यह भी एक प्रयोग ही है, होगा और शत-प्रतिशत सफल होगा

 सादर अभिवादन

नए अंक का आगाज़ एक नया अंदाज ..
लगभग नकार दिए गए....नहीं कह सकते ऐसा
प्रयोग यदि सभी एक बार में सफल हो जाते..तो
मंगल , शनि , चाँद बरसों  पहले पृथ्वी पर आ चुका होता
या इन जगहों पर हम लोग क्षण मात्र में आ-जा सकते
सो यह भी एक प्रयोग ही है, होगा और शत-प्रतिशत सफल होगा
उतना ही, जितनी कि आज शाम अंधियारी होगी
और कल का सूरज तीखा होगा
"दाद" लेने की "खुजली" बनाम ज़ालिम लोशन है ना !!! ... :
अक़्सर हम जैसे नौसिखिए लोग, दिग्गज़ों से सुनते-पढ़ते हैं, कि तथाकथित कुछ अलग-सी, "सर्वाधिकार सुरक्षित"  या "Copyright Reserve" वाली विशिष्ट, 'ब्रांडेड', ब्लॉग की दुनिया में एक दूसरे की पीठ खुजलाने जैसी कोई प्रथा या रीति-रिवाज़ भी है .. शायद ...  अब ये कोई लोकोक्ति हो या मुहावरा, जो भी हो, पर वैसे भी पूरे बदन की खुजली को तो हम भी खुद ही खुजा लेते हैं, सिवाय अपनी पीठ के। वहाँ की खुजली के लिए धर्मपत्नी की मदद यदाकदा जरूर लेनी पड़ती  है। पर आज कल तो एक खुजाने वाली लम्बी कलम जैसी "खुजली स्टिक" भी स्थानीय बाजार में या 'ऑनलाइन' पर भी उपलब्ध हैं, जिसे हम खरीद लाये हैं। अब तो वो भी निर्भरता खत्म। अपने माननीय प्रधानमंत्री जी भी तो बार-बार  कहते हैं, कि स्वावलंबी बनो, आत्मनिर्भर बनो .. तो हम भी बनने की कोशिश भर कर रहे हैं .. बस यूँ ही ...
ऐसी बातों की चर्चा, जब भी, जहाँ कहीं भी, होती है तो ... ऐसे में सन् 1929 ईस्वी में स्थापित इंदौर की 'ओरिएंटल केमिकल वर्क्स' नामक कम्पनी की एक आयुर्वेदिक उत्पाद - "ज़ालिम लोशन" के विज्ञापन के एक संवाद अनायास याद हो आते है, कि "क्या शरमा रहा है ? दाद, खाज, खुजली है। सबको होती है। हमें भी होती है।" मतलब ये है, कि "दाद" लेने की "खुजली" सभी को होती है। पर ऐसे में हमें खुजलाना क्यों भला ! अपने पास "खुज़ली स्टिक" अगर ना भी हो तो कोई चिन्ता की बात नहीं है साहिब !! .. वो भी ज़ालिम लोशन के रहते !! .. अरे बाबा! .. बाज़ार में या 'ऑनलाइन' पर भी तो साहिब .. ज़ालिम लोशन है ना !!! .. बस यूँ ही .


अब देखिए आज की पाँच रचनाओं के शीर्षक

लौट गए उसी ईशान कोणीय देश में, सभी मेघ दल,


बात दिल की पन्नो पे उतारिये ना
पढेगें अपने तो बवाल हो जायेगा

लोटे में पानी लाकर पौधे को अर्पित कर दिया...
उसके चरण छूकर बोला हम तुम्हें वृक्ष अवश्य
बनाएंगे क्योंकि तुम हमारे लिए बहुत जरुरी हो...।
तुम हमारा जीवन हो...।


हर तरफ़ खौफ़ की आहट  है
दिल में मायूसी और नजरों में घबराहट है