Thursday, September 16, 2021

763 झूम के आई घटा, टूट के बरसा पानी

सादर अभिवादन
कल भगवान विश्वकर्मा जी की जयन्ती है
करबद्ध नमन
मोबाईल भी एक मशीन है
कल दुग्धाभिषेक कर के पुष्प अर्पण के
प्रसाद का चित्र ऑनलाईन प्रेषित करें
अब रचनाएँ...


मैं सोचने लगी कहीं हिन्दी दिवस के अवसर पर ऐसे वीडियो प्रचारित करना हिन्दी भाषा के प्रचार-प्रसार के विरुद्ध यह अंग्रेजी परस्तों की साजिश तो नहीं? खैर छोड़िए कोई बात नहीं, मैं तो उनसे यही कहूँगी कि-
“छोड़ दो साजिशें तुम्हारी अब एक न चलेगी
हिन्दी है माथे की बिन्दी माथे पर ही सजेगी“

हर चाह नश्वर की होती है
शाश्वत को नहीं चाहा जा सकता  
वह आधार है चाहने वाले का
हर याचक आकाश से उपजा है
और पृथ्वी की याचना करता है



जब तक जीवन है तुम जियो शान से
समझौता मत करो आत्मसम्मान से

अगर आत्मविश्वास हृदय में खास है
धीरज की पूंजी, जो तुम्हारे पास है

रखो हौसला ,लड़ लोगे तूफान से
समझौता मत करो आत्म सम्मान से


किसने भीगे हुए बालों से ये झटका पानी
झूम के आई घटा, टूट के बरसा पानी

कोई मतवाली घटा थी कि जवानी की उमंग
जी बहा ले गया बरसात का पहला पानी


किसी राष्ट्र का
गौरव उसकी
आज़ादी है भाषा ,
अपने ही
कुल,खानदान ने
समझा इसे तमाशा,
पढ़ती रही
ग़ुलामों वाली
भाषा दिल्ली,काशी ।


बचपन ही से
सुनती आई हूं
आगे बढ़ने की बात ,
तो निश्चय ही
पीछे लौटना होता होगा
गलत या बुरा।
फिर फिर मैं लौट रही हूं
तीन-चार दशक पीछे,


सादर


 

Wednesday, September 15, 2021

762 ..तुम्हारे जैसी बदमाश बहू की नितांत आवश्यकता है

सादर अभिवादन
भाग रहा है सितम्बर
मूसलाधार बरसकर
ठीके है....
आज रचनाएँ अधिक है ....


शाम ढले तलहटी पर थे सभी
चेहरे गहराई तक बोझिल, दूरत्व
रेखा अदृश्य बढ़ती गई,
अंततः सभी मिलन
बिंदु हो गए
ओझल।


सोचता कोई तो होगा, है वहम,
कौन करता है किसी की अब फिकर.
 
था खरीदा, बिक गया तो बिक गया,
क्यों इसे कहने लगे सब अपना घर.
 
मौत की चिंता जो कर लोगे तो क्या,
वक़्त ने करना है तय सबका सफ़र.



 इश्क़ का अब मुझे ख़याल कहां
“मैं कहां और ये वबाल कहां”

 इश्क़ का रोग मत लगाना तुम
हिज्र मिलता है बस विसाल कहां

 बिक गया आदमी का इमां जब
झूठ सच का रहा सवाल कहां



देहरादून के झंडा बाज़ार में बने वर्तमान दरबार साहिब का निर्माण 1707 में संपन्न हुआ था. दरबार साहिब की दीवारों पर कमाल की पुरानी भित्ति चित्रकारी है जो उत्तराखंड में अनूठी है. दरबार साहिब के सामने सौ फुटा झंडा है और यहाँ हर साल होली के पांचवें दिन से झंडा मेला आरम्भ हो जाता है. झंडा साहिब को उतार कर पुराने रुमाल, दुपट्टे उतर दिए जाते हैं और दूध, दही, गंगा जल से धो कर नए रुमाल, दुपट्टे और आवरण बांधे जाते हैं. इसके बाद एक बार फिर से झंडा साहिब को स्थापित कर दिया जाता है. परिसर में गुरु राम राय जी की समाधी के अलावा चार और समाधियां भी हैं जिन्हें माता की समाधियां कहा जाता है.



तू यूँ न कर, जल्दी जाने की जिद,
यूँ चल कहीं, वक्त से परे,
खाली ये पल, चल न, संग भरें,
छिनने लगे, क्यूँ सांझ के मेरे सहारे,
आ रख लूँ, तुझे बांध के!


कितनी आसानी से कह दिया उसने
आखिर क्या किया ,आपने मेरे लिए
जो भी किया,वो तो सब करते हैं
आज अगर मैं कुछ हूं
तो वो है परिणाम,
मेरी मेहनत का
मेरे पुरुषार्थ का
मेरे भाग्य का
या फिर मेरे पुण्य कर्मो का


ससुरजी ने बढ़ते हुए कहा-हां बहू तुमने ठीक कहा। आज समाज को तुम्हारे जैसी बदमाश बहू की नितांत आवश्यकता है। तुमने अन्याय के खिलाफ आवाज उठाकर और उसका प्रतिकार कर एक सशक्त बहू का फर्ज निभाया है।
तुम्हारे मन में यह हौसला तो है कि ईंट का जवाब पत्थर से देकर दुर्व्यवहार करने वाले को समझाया। वरना बड़ी बहू तो सद्व्यवहार करते-करते थक गई।किसी को इसकी अच्छाइयां समझ नहीं आई।



” आप भी मुआवज़े की माँग किया करो।”
संगीता अपनी समझदारी का तीर तरकस से निकालते हुए कहती है।

”बिटिया रानी के इन काग़ज़ों (टिसु पेपर ) की तरह होती है मुआवज़े की रकम। 'नाम बड़े दर्शन छोटे' किसान के ज़ख़्मों का उपचार नहीं करता कोई, दिलासा बाँटते हैं।

महावीर काका थकान में डूबी आँखों को पोंछते हुए कहते हैं।
एक लंबी ख़ामोशी संवाद निगल जाती है।

बस
सादर

 

Tuesday, September 14, 2021

761 ..कुछ शब्द कुछ यादें शब्दों की बचपन से आज तक की

सादर अभिवादन
आज हिन्दी दिवस है

सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ

रचनाओं पर एक नज़र..


कुछ शब्द कुछ यादें शब्दों की
बचपन से आज तक की
एक मास्टर और उसकी सौंटी से
बजते हाथ के साथ कान लाजवाब

कपड़े हमेशा आये समझ में
ढकने वाली एक ढाल झूठ को
सच समझ में आया हमेशा
कपड़े उतारी हुई
सारी शख्सियत साफ साफ

रौशनी जहाँ
पहुंची नहीं
वहां की आवाज़ हो
भाषा से
कुछ अधिक हो
तुम हिंदी


स्त्रियां निर्जला व्रत प्यार का प्रतीक मानती हैं
पति,बच्चों के लिए ...
ऐसा करके वे खुद को मान लेती हैं सावित्री
और दृढ़ माँ !
अनादि काल से ऐसा देखते देखते
पुरुषों ने,बच्चों ने मान लिया
कि उनकी पत्नी
उनकी माँ - सबसे जुदा हैं ।
गर्व से कहते हैं सब,
"बिल्कुल कुछ नहीं लगा ...!"

बाथरूम सिंगिग का भी एक घराना होना चाहिए ..कुछ अलग सा

गाने और पानी का सदियों से नाता रहा है या यूं कहिए पानी की कलकल ध्वनि ने गायन की विधा को ऊंचाइयों पर पहुंचाने में अहम योगदान दिया है। अब सागर, नदियां, सरोवर तो वैसे रहे नहीं कि उनके किनारे सुर साधे जा सकें ! ले-दे कर स्नानगृह ही ऐसी जगह बची है जहां कुछ-कुछ पानी भी है, कुछ-कुछ तन्हाई भी और कुछ-कुछ फुर्सत भी, जिसे दिल ढूँढ़ता रहता है। इसीलिए इसी कुछ-कुछ में बहुत कुछ ढूंढते इन अंजान कलाकारों को कोई तो ठीहा मिलना ही चाहिए ! तो क्या ऐसा लगता नहीं कि इन बहुआयामी कलाकारों को भी हक़ है अपनी पहचान बनाने का, अपनी कला को निखारने का, अपनी निश्छल सेवा भावना के बदले समाज से कुछ पाने का, अपना घराना बनवाने का !!  क्योंकि ये वे कलाकार हैं जो अपनी कला से प्यार करते हैं पर उस कला की मेहरबानी इन पर कभी नहीं होती। 




अनुवादकः 
पंखुरी सिन्हा
व्यर्थ कोशिश करती हूँ
पकड़ने की उसे
छूटता, बचता है वह
मौसम के जहाज़ सा
क्या पहुँच पाएगा वह
अन्ततः खुले समुद्र तक?

आज के लिए बस
सादर


Monday, September 13, 2021

760 ...कंठ में सुर कौन भरता वाग्देवी ! वाग्देवी !

सादर अभिवादन
कल हिन्दी दिवस है
वैसे तो पंद्रह दिन पहले से ही हिन्दी
का  प्रचार-प्रसार  हिन्दी दिवस पखवाड़े 
के रूप में चल रहा है...आम दिवसों की भांति
नहीं है हिन्दी, सभी भारतीय भाषाओं को
देवनागरी भाषा मे ही बोला जाता है, 
सभी भाषाओं की अपनी लिपि है..पर 
बोलने के समय देवनागरी का भी उपयोग होता है
कोई भी बंगाली भाषा में नहीं रोता और न ही कन्नड़ में हंसता 
अब देखिए रचनाएँ ....



दिल घायल हुआ उसके नैन कटारे।
ओढ़ हया चूनर खुद में सिमटते है।।

कैसे बताऊं उसको दिले बेकरारी।
वो बदनामी से बहुत डरती है।।

जब जवां दिल धड़कते हैं साथ साथ।
इस प्यार को दुनियाँ गुनाह कहती है।।



इस सूखी दुनिया में प्रियतम मुझ को और कहाँ रस होगा?
शुभे! तुम्हारी स्मृति के सुख से प्लावित मेरा मानस होगा!

दृढ़ डैनों के मार थपेड़े अखिल व्योम को वश में करता,
तुझे देखने की आशा से अपने प्राणों में बल भरता,

ऊषा से ही उड़ता आया, पर न मिल सकी तेरी झाँकी
साँझ समय थक चला विकल मेरे प्राणों का हारिल-पाखी


उनींदी आँखों लिखने बैठा तेरी सहर की कली l
नज़्म ढलती गयी खुद ही नज़र की इस कली ll

जादू कर गयी तेरे ताबीज़ की वो कच्ची डोरी l
बंधी थी जिससे तेरे संग मेरे रूह की डोरी ll  

सुन तेरे पाक इबादत के नूरों को इस घड़ी l
सिमट मिटते गयी हर फासलों की ये घड़ी ll


राम नाम की महिमा सुनकर,हनुमत भ्रम से हर्षाए।
तेजस्वी साधू यह लगता,प्रभो नाम के गुण गाए।

शीश झुका चरणों में बोले,राम काज करने जाऊँ।
शक्ति बाण से बेसुध लेटे,लक्ष्मण के प्राण बचाऊँ।


कूक कोकिल को सुरीली
चेतना में प्राण भरती,
उल्लसित उर सहज होता
रात का ज्यों अलस हरती !

कंठ में सुर कौन भरता
वाग्देवी ! वाग्देवी !
कह रहे हर बोल में वे
कर रहे ज्यों वंदना ही !
....
बस आज के लिए


Sunday, September 12, 2021

759..रिमेंबर ..फोर्टीन 'थ ऑफ सेप्टेंबर इज़ अलाटेड फॉर हिंदी दिवस सेलिबरेन

सादर नमस्कार
हिंदी दिवस पर

व्हाट डू यू नो अबाउट हिंदी
नथिंग वांट टू नो अबाउट हिंदी
आई लाईक दि सब्जी ऑफ भिंडी
कैन यू राईट अ पोईट्री इन रोमन इंग्लिश
प्लीज़ डू  इट नॉव

हिन्दी बोलना लिखना आसान है
पर रोमन इंग्लिश लिखना
काफी से अधिक जटिल है
...
रचनाएँ.....


और जागरण के नादों में,
मूल्य कहाँ इन स्वप्नों का है ।
निश्चय मानो जीवन अपना,
उत्तर गहरे प्रश्नों का है ।।



वो प्रेम ही क्या
जो आह भरा-भरा कर
सबके सीने पर
जलन का साँप न लोटवाए
काश! उन्हें भी कभी
कोई ऐसा प्रेम मिल पाता
ये सोचवा-सोचवा कर
प्रेम हलाहल न घोटवाए



तड़पाए मन, भावों के आवागमन,
उलझाए, अन्तः अवलोकन,
लब कैसे दे, यूँ, शब्दों को थिरकन!

शिकन, यूँ चेहरों पे, भाव न गढ़ते,
नैनों में, यूँ न, बहाव उतरते,
टीस भरे, गहरे से ये घाव ना रहते!



इतना कि बन जाते हो मेरी सुबहों का मंगल
मैं औषधि का प्याला बढ़ाती हूँ तुम्हारी ओर
तृप्त होऊँ तुम्हें पीते देखकर और
ले लूँ चुम्बन तुम्हारे अधरों का
अमरत्व चखना है मुझे सृष्टि का
तुम्हारे होने तक उत्सव मना सकूँ मैं भी.
तुम्हारे मन का गृहस्थ मौन है न
और मेरे मन का सन्यास, मोह भर उपजी पीड़ा.


नशा  छाया  हैं  कैसा  ये  नज़र में।
ज़रा  नैनों  से  लड़कर  देख लेना।।

नहीं  गहराई  साग़र  की पता हो
मेरे दिल मे उतर कर देख लेना।।

तड़प होती हैं क्या आकिब' ये समझो।
कभी सहरा  में रहकर देख लेना।।
....
बस

Saturday, September 11, 2021

758 ..ये काटे से नहीं कटते ये बांटे से नहीं बंटते

 सादर अभिवादन

आज क्षमा दिवस है
मन,वचन काया से
भूल से भी आपको ठेस लगी होगी
हृदय से क्षमा माँगती हूँ


आज की रचनाएँ.....


हे नगाधिराज तू,
भारत की ढाल च।
आसरु च तेरु ही,
तू ही रक्षपाल च।।

गंगा जमुना जी कु मैती,
बद्रीनाथ धाम च।
केदारनाथ  तेरा सिर्वाणा,
तू पर्वतों की शान च।।
नगाधिराजः हिमालय ; पर्वतराज ; नगाधिपति


जोड़-तोड़ और
बेहिसाब रतजगों का मरोड़
रेल की छूटती सीटियों के सुरझरों में
एक नये पौधे की अलसाहट में
झुका-झुका उठता
फूट जाऊंगा।

निदा साहब

ये दिल कुटिया है संतों की यहाँ राजा-भिखारी क्या
वो हर दीदार में ज़रदार है, गोटा-किनारी क्या.

ये काटे से नहीं कटते ये बांटे से नहीं बंटते
नदी के पानियों के सामने आरी-कटारी क्या.

कबीरदास
हमन है इश्क मस्ताना, हमन को होशियारी क्या ?
रहें आजाद या जग से, हमन दुनिया से यारी क्या ?

जो बिछुड़े हैं पियारे से, भटकते दर-ब-दर फिरते,
हमारा यार है हम में हमन को इंतजारी क्या ?



हे वृक्ष
कतिपय
तुम्हारी छाया के अवलंबन में
अभ्रांत सहृदयता के पलों के
सात्विक तत्व से
आश्रय पाकर ही
सूर्य की तेजस्विता से
आलोकित होता है जीवन ...!!


सुबह
मेरी खिड़की की पल्लों पर
ठहरी हैं
कि कब खोलूंगा मैं खिड़की

आज के लिए बस
सादर

Friday, September 10, 2021

757एक कबूतर लिख एक कबूतर खाना लिख गुटरगूं लिख चोंच लड़ाना लिख



जय श्री गणेश
स्वागत, अभिनन्दन
...

मयखाना लिख
कुछ पीना लिख
 कुछ पैमाना लिख

दिन हो गये कुछ नहीं लिखे
लिख ले किसी दिन सारा जमाना लिख

नियम लिखने लिखाने के रहने दे
बेखौफ लिख
लेखक एक दीवाना लिख

किस ने रोकना है लिखने लिखाने को
एक बन्दूक लिख
एक बंदर को डराना लिख

गलत है
बंद हो जाना कोटर में
मत पहन
एक रखा हुआ पैजामा लिख

अच्छा नहीं है कुछ नहीं लिखना
कुछ लिख
लिखने वालों का कुछ इतराना लिख

रहने दे मत लिख
कबूतर उड़ाने वालों की बात
लिख
एक कबूतरखाना लिख

लिखने लिखाने को लिख
धूप दिखा
धुएं धुएं में धुएं का धुआं हो जाना लिख

कहीं भी नहीं है जब
वो

 
जिसे जहां होना होता है
लिख हुआ
लिख हो रहा
लिख
कल के  कुछ होने का
हो जाना  लिख

‘उलूक’
फोड़ कुछ
फोड़ सकता है
होना कुछ भी नहीं है किसी से
कुछ फोड़ ले
बच गया कुछ
चोंच लड़ाना लिख



आज के लिए बस
कल से नियमित
सादर