Monday, October 4, 2021

780..कल प्रकृति दिवस था , कोई बात नहीं प्रकृति दिवस तो रोज मना सकते है

 सादर अभिवादन
कल प्रकृति दिवस था , कोई बात नहीं
प्रकृति दिवस तो रोज मना सकते है
ये नई कि आज एक पौधा लगाए और 
उसकी याद अगले प्रकृति दिस मे आए

आज की रचनाएं...




आज विश्व प्रकृति दिवस है,
प्रकृति है तो हम हैं ,
प्रकृति की गोद में ही हम
फलते फूलते हैं जीते हैं खेलते हैं सीखते हैं
विकास करते हैं इस लिए
अपनी मां जननी सरीखी इस
प्रकृति के लिए सदा हम कुछ करते रहें 




जिंदगी नही, जिंदगी का भरम, जी रहा आज का आदमी
जिंदगी की ख्वाइश में जिंदगी, खो रहा आज का आदमी

सुबह सबेरे उठके तडके, करने लगता जुगाड दो रोटी का
खुशी की तलाश में, खुद से दूर हो रहा आज का आदमी





दही मथें माखन मिले,  केसर संग मिलाय,  
होठों पर लेपित करें,  रंग गुलाबी आय..

बहती यदि जो नाक हो,  बहुत बुरा हो हाल,  
यूकेलिप्टिस तेल लें, सूंघें डाल रुमाल..

अजवाइन को पीसिये, गाढ़ा लेप लगाय,
चर्म रोग सब दूर हो, तन कंचन बन जाय..

अजवाइन को पीस लें, नीबू संग मिलाय,
फोड़ा-फुंसी दूर हों, सभी बला टल जाय..

अजवाइन-गुड़ खाइए, तभी बने कुछ काम,
पित्त रोग में लाभ हो, पायेंगे आराम..





वही शहर है वही रास्ते वही घर है और वही लॉन भी
मगर इस दरीचे से पूछना वो दरख़्त अनार का क्या हुआ

मिरे साथ जुगनू है हम-सफ़र मगर इस शरर की बिसात क्या
ये चराग़ कोई चराग़ है न जला हुआ न बुझा हुआ  



मुझे ऑनलाइन देख तुम खुश होती हो
स्टेटस पे मुझे तुम जोहती हो
जो जोड़े हमें 'नेट' वो डोर है
तेरे अंदर बैठा एक चोर हैं
यह सब उसी चोर का खेल है
कहीं सच उजागर न हो जाए
उसी डर से खिली यह बेल है

सादर

Sunday, October 3, 2021

779 ...कितनी गांठें, बंध गई, इस मन के अन्दर

सादर अभिवादन
श्राद्ध पर्व अब रवानगी की ओर है
अब कौवों के दिन भी लदने वाले हैं
फिर घूरे-मुक्कड़ो में मन रमाना होगा
बच्चों से पत्थर खाना होगा
रचनाओं की ओर चलें


तुम्हारी लिखी जिन चिट्ठियों को मैं
अब तक हृदय से लगा कर संजोती आई थी
उनकी राख और चुन चुन कर तुम्हारे दिए
सभी स्मृति चिन्ह और उपहारों के फूल
एक पोटली में बाँध विसर्जित कर आई हूँ




कितनी गांठें, बंध गई, इस मन के अन्दर,
प्यासा रह गया, कितना समुन्दर,
बहता जल, नदी का, ज्यूं कहीं हो ठहरा,
लगाए, खुद पे पहरा,
हर शै, यहां कितना अधूरा!




मीलों लम्बी
घिरी उदासी
देह ज़रा-सी।

कुर्सी, मेजें,
घर, दीवारें
सब कुछ तो मृतप्राय लगें





वर्ष भर तो याद न किया
कागा अब क्यों याद आया
पहले जब भी मुडेर पर बैठते
बच्चे तक तुम्हें उड़ा देते थे
पर अब बहुत आदर सत्कार से
बुलाकर सत्कार  किया जाता तुम्हारा




तुमसे मिले हुए
कई दिन हो गए हैं
पर लगता है जैसे
कल ही की बात है
होंठों पे स्वाद है
साँसों में ख़ुशबू है
हाथों को अहसास है

सादर 

Saturday, October 2, 2021

778 ...छोटा कद पर सोच बड़ी थी तेज सूर्य का चमके भाल।

 सादर अभिवादन

आज गांधी जी और शास्त्री जी का जन्मदिवस है
दोनो ही अपने समय के महान विभूति थे...
आज का विशेष अंक आपके सन्मुख...



17 जून 2007 को संयुक्त राष्ट्र महासभा में एक प्रस्ताव पारित कर दुनिया से आग्रह किया गया था कि गाँधीजी को जन्म दिवस को  शांति और अहिंसा पर चलने का प्रण लेते हुए अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस के रूप में मनाएँ।
गांधी जी के तीन मुख्य सूत्र.....
1) कथनी और करनी में कोई अंतर न होना
गाँधीजी मितव्ययता पर ज़ोर देते थे। वे स्वयं अल्प वस्तुओं के साथ जीवन निर्वाह करते थे। गाँधीजी का यह गुण आज भी उतना ही प्रासंगिक है।

2) व्यवहारिक नज़रिया या दृष्टिकोण ....
उन्हें बौद्ध धर्म और जैन धर्म की अहिंसा की बातों ने बेहद प्रभावित किया। जैन धर्म के मानने वालों का नजरिया अंहिसा के मामले में थोड़ा कट्टर है। वे नाममात्र की हिंसा में भी विश्वास नहीं रखते। वहीं बौद्ध धर्म का नज़रिया  अहिंसा को लेकर लचीला है। 
गाँधीजी ने दोनों के बीच का मार्ग चुना।

3) हर किसी के साथ  संवाद स्थापित करने की कला
अपनी संवाद कला को जरूरत के हिसाब से बदलकर गाँधीजी ऐसा करने में सक्षम होते थे। गाँधी को गाँधीजी बनाने में उनके  संवाद कौशल ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।




छोटा कद पर सोच बड़ी थी
तेज सूर्य का चमके भाल।
भारत माँ के गौरव थे वो
कहलाये गुदड़ी के लाल।।

कुर्ता धोती गाँधी टोपी
यही रही उनकी पहचान।
सादा जीवन सदा बिताए
कौन यहाँ उनसे अनजान।।




हाय गजब कैसी करी ये दुश्मन नें चाल।
ताशकन्द में उठ गया भारत माँ कौ लाल॥
भारत माँ कौ लाल वात मित्रन ने कीनी।
घर में लियौ बुलाय, धौंस बहुतेरी दीना॥
जबरन सन्धि कराया कै, दस्तखत लिये कराय।
हाय हमारौ शास्त्री, मुख न दिखायौ आय॥





एक अनंत विश्वास
छा  जाता है जब
जो सदा से वहीं था
सचेत हो जाता है मन उसके प्रति
तो चुप लगा लेता है स्वतः ही
वह अखंड मौन ही समेटे हुए है अनादि काल से
हर ध्वनि हर शब्द को
सारे सवाल और हर जवाब भी वहीं है




ग़ज़ल को गाना मिरे बस की बात कब है मियां
ये कारोबार तो मीरासियो के होते है

"तुफ़ैल' आयेंगे इतने कहाँ से राजकुमार
कि ऐसे ख्वाब सभी लड़कियों के होते है




अंधकार के राज्य में, दीये का संघर्ष,
त्रास हारता है सदा, विजयी होता हर्ष ।

कहीं खेल विध्वंस का, कहीं सृजन के गीत,
यही सृष्टि का नियम है, यही जगत की रीत ।




भर ही जाएं, ना कुरेदो ज़ख़्म कोई,
रहने दो, यूं ही पड़ा,
सह लूंगा, राह की ठोकरें!

टूटे पत्थरों के गीत, कोई क्यूं सुने‌....




है तुम्हारे हवाले वतन साथियों
कर गया कोई हमें नामजद साथियों
सांस् अटकी यहां प्रेम से साथियों
कर हवाले तुम्हारे  वतन साथियों
वक़्त मुश्किल कटा हाथ सबका छूटा
हो गए अजनबी हम तो अब साथियों


आज बस
सादर

Friday, October 1, 2021

777 ...सुनता कोई भी नहीं था पर सब बोले जा रहे थे

सादर अभिवादन
आज विश्व बुजुर्ग दिवस है


प्रत्येक साल 1 अक्टूबर को अंतरराष्ट्रीय वृद्ध दिवस के रूप में मनाया जाता है. 
विश्व में वृद्धों एवं प्रौढ़ों के साथ होने वाले अन्याय, उपेक्षा और दुर्व्यवहार पर 
लगाम लगाने के उद्देश्य से हर साल इंटरनेशनल डे ऑफ ओल्डर पर्सन 
(International Day Of Older Persons) मनाया जाता है.

प्रस्तुत है रचनाएँ....

विश्व बुजुर्ग दिवस .....डॉ. टी.एस.दराल


पार्क में एक पेड़ तले दस बुज़ुर्ग बैठे बतिया रहे थे,
सुनता कोई भी नहीं था पर सब बोले जा रहे थे !
भई उम्र भर तो सुनते रहे बीवी और बॉस की बातें,
दिन मे चुप्पी और नींद मे बड़बड़ाकर कटती रही रातें !
अब सेवानिवृत होने पर मिला था बॉस से छुटकारा,
बरसों से दिल मे दबा गुब्बार निकल रहा था सारा !



रात भर जागकर हरसिंगार वृक्ष
उसकी सख्त डालियों से लगे
नरम नाजुक पुष्पों की करता रखवाली

भूले गले लगाना ! ..डॉ. ज्योत्सना शर्मा


चंदा-सूरज
मुट्ठी में बाँध लिए
सागर सारे
पर्वत नाप लिए
अँधियारों पे
विजय पा गए  हो
उजालों में क्यूँ
यूँ भरमा गए हो ?


अंतरराष्ट्रीय वृद्धजन दिवस पर ...गिरीश पंकज


जिसने इस दुनिया में आकर,
गर वृद्धों का सम्मान किया ।
उसने अपने लघु जीवन का,
प्रतिफल जैसे उत्थान किया।
उसका वंदन जो बूढ़ों का,
बढ़कर अभिनंदन करता है ।
जो वृद्धजनों की सेवा में,
तन-मन- धन अर्पण करता है।।


आज नया इक गीत लिखूँ ......कुसुम कोठारी


वीणा का जो तार न झनके
सरगम की धुन पंचम गाएँ
मन का कोई साज न खनके
नया मधुर सा राग सजाएँ
कुछ खग के कलरव मीठे से
पीहू का संगीत लिखूँ मैं।।
...
आज बस
कल आऊँगी गांधी जी के साथ
सादर

Thursday, September 30, 2021

776 ..ठाढ़ा सिंह चरावै गाई का ना ऐसा हाल था

 सादर अभिवादन

कल का उपवास
मन को हल्का कर गया
आभार जिउतिया
....
रचनाएँ....



मचल कर, मखमली सवालों में!
वो अक्सर, आ ‌‌‌‌‌ही जाते हैं, ख्यालों में!

न बदली, अब तक, उनकी शोखियां,
वो ही रंग, अब भी, वो ही खुश्बू,
और वही, नादानियां,
वो अक्सर, कर ही जाते हैं ख्यालों में!




हिलते हाथों से
गजरा लगाते देखा है।
चढ़ती उम्र के साथ
प्यार को भी चढ़ते देखा है।



जीवन के अनसुलझे,
रहस्यमयी प्रश्नों
विपश्यना,
"मैं से मोक्ष"
की यात्रा में
तुम ही
निमित्त
बन सकते हो
कदाचित्।




ठाढ़ा सिंह चरावै गाई का
ना ऐसा हाल था
चींटी मुख में हाथी
समा जाए का काल था
गार्गी सूर्या मैत्रयी सुलभा के बाद आयी
सावित्री बाई अरुणा सुचेता दुर्गा बाई
उत्‍तमोत्‍तम ओजोन थीं


तृण शीर्ष पर कुछ ओस बूंद, देते हैं
आख़री सहारा झरते हुए पारिजात को,
दूरत्व तो होता है बस एक बहाना,
हर कोई चाहता है ज़िन्दगी को

सादर

Wednesday, September 29, 2021

775 ..यह विश्व राजनीति का महान एक केंद्र है

सादर अभिवादन
आज जीवित्पुत्रिका व्रत है
जिसा जिउतिया उपास भी कहते हैं
व्रती महिला की मनोकामना पूर्ण हो
सभी बच्चे स्वस्थ और निरोगी रहें
इसी कामना के साथ आज का यह अंक



हवाओं का झोंका उड़ा ले गया।
अब न अपनी ख़बर न ख़बर हो तेरी।

खूब गुनाहों को मेरे मुझसे कहा।
कब तल भला, दिल में फिकर हो तेरी।




यह विश्व राजनीति का
महान एक केंद्र है,
यहाँ का वीर सरहदों पे
बज्र ले महेंद्र है,
विभिन्न भाषा,बोलियाँ
विभिन्न भूषा-वेश है।
यह उत्तर प्रदेश है,यह उत्तर प्रदेश है।



ख़ुदा की यूँ कुदरत लिखेंगे
उन्हीं की  इबारत  लिखेंगे

वही दो जहानों का रहबर
उन्हीं की इनायत लिखेंगे

मुहब्बत के शायर है हम भी
कलम  से  मुहब्बत  लिखेंगे




अब न रहे वे घर,
न वे रोशनदान,
जहाँ मैं तिनके जमा कर सकूँ,
अंडे दे सकूँ,
उन्हें से सकूँ,
जहाँ मेरे नन्हें चूज़े
आराम से रह सकें,
उड़ने लायक हो सकें.




कहीं पुष्प बन कर उभरती है ,
कहीं नदिया बन कर उमड़ती है ,
प्रकृति तो प्रकृति है
कहीं पाखी बन उड़ती है

कितने ही रूप में
कह जाती है मन की
समां जाती है शब्दों में
जैसे भावों की अनुकृति !!


सादर

 

Tuesday, September 28, 2021

774 ...आज जन्म दिन है लता जी का दीर्घायु हों यही कामना है

 सादर अभिवादन

आज जन्म दिन है लता जी का
दीर्घायु हों यही कामना है


98 वर्षीय भारत रत्न लता मंगेशकर, एक ऐसा नाम जिसपर हर भारतवासी को गर्व है। संगीत की दुनिया में बेहद सम्मान के साथ इस नाम को लिया जाता है। भारत रत्न लता मंगेशकर की आवाज में जादू है, उनके अंदर ईश्वर प्रदत्त प्रतिभा है
सुनिए ये गीत..




जबकि पुस्तकालय में
खड़ा आदमी
खड़े-खड़े ही पहुँच गया
देश-दुनिया के
कोने-कोने में




आहटें हलकी थी इनके अल्फ़ाज़ों की l
दस्तक चुप चुप थी इनके हुँकारों की ll

फिरा ले उन्हें डाकिया हर गली गली l
मिला ना ठिकाना उसे किसी गली भी ll




मैं स्वप्न में एक स्त्री से मिला,
जो हुस्न-ए-अप्सरा लिए थी ,
जिसके केशों ने पग छुए थे उसके
और आँखों मे समुद्र समाया था।




सागर ने अपने गर्जन-तर्जन से
मुझको थोड़े शब्द दे दिये,
तट पर छोड़ गया जो सागर
चिकने पत्थर, कंकड़-सीपी
चुनकर उनको मैंने अपनी
अँजुरी भर ली;
उसने मुझको मुद्राएँ दीं
उच्चावच लहरों ने मुझको संज्ञाएँ दीं,




कहानियाँ लिखने का मन करता है ख़ूब। अपनी पसंद के कुछ लोगों से मिलने का भी। आख़िरी कहानी मन मलंग लिखी थी। कोई किरदार हो…ज़िंदा…मीठी आँखों वाला…कच्ची मुस्कान और मिट्टी का दिल लिए हुए आए मेरे शहर…और कहे आख़िर को, ऐसे दिल को तो टूट ही जाना चाहिए ना।

क्लोज़ करते हुए याद आ रहा है फ़ैज़ का शेर, 
ऐसे ही, बेसलीके, बेतरतीबी से, 
‘अपना ग़म था गवाही तेरे हुस्न की, 
देख क़ायम रहे इस गवाही पे हम’।

 मुझे दुःख हो कि पिछले दो अंक छूट गए
अब से शायद ही छूटे
सादर