आईने का सच.. मीनल गुप्ता
दर्पण नाम है, उसका
अक्सर उससे वह
मिला करती है
लाखों सवाल
किया करती है
अपने अतीत की गलियों
के राग सुनाया करती है
कभी बालों का चुन्नटों
तो कभी माथे का शिकन को
अपने पंखों से सहला कर
तो कभी आँखें मिलाकर
अपनी परछाई में
अपने जख्मों के लिए
एक सुकून का
सहारा ढूंढकर
- मीनल
अकादमिक लेखन
अनकही पृष्ठ क्रं.28
प्रतिज्ञान से
- मीनल
अकादमिक लेखन
अनकही पृष्ठ क्रं.28
प्रतिज्ञान से

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में गुरुवार 29 अक्तूबर, 2026 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
ReplyDeleteसुंदर सृजन
ReplyDeleteसुंदर
ReplyDeleteसुन्दर रचना !
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