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Thursday, July 22, 2021

707 ..आज कल ब्लॉग में इतना मौलिक और अच्छा सामान मिलने लगा है हमारी तो रोजी छिन रही है

सादर अभिवादन
आज की अदाकारा (रचनाकार) शिखा दीदी, 
परिचयः सूरज को मोमबत्ती दिखाने जैसा ही है
लंदन मे रहती है , अखबारों में छपती हैं,
खाना बनाना भी जानती हैं
खिलाते भी रहती है...खाना है तो आइए भुक्खड़ घाट

फिलहाल रचनाएँ....

सहायता कीजिये भगवान रहम कीजिये हर उपाय कर लिया है.कुछ ब्लॉगरों  को ब्लॉगिंग  छुडवाने के लिए टंकी पर भी चढ़ाया पर अब उसे भी कोई भाव नहीं देता. तो बेचारे खुद ही उतर आते हैं थोड़ी देर में. माना कि ब्लोगिंग सहज, सरल अभिव्यक्ति का मंच है पर अगर वो हमारे क्षेत्र में घुसपेठ करेंगे तो गुस्सा तो आएगा ना प्रभु !
दुहाई है …दुहाई है…दुहाई है…..
स्वर्ग लोक में से आता शोर सुनकर यमराज के कुछ गणों के भी कान खड़े हो गए .उन्हें उत्पात करने का मौका  मिल गया .सोचा चलो बहती गंगा में हमऊँ हाथ धो लें इसी बहाने दो चार पर भड़ास निकाल आयें .
सो उन्होंने आकर सभा में उत्पात मचाना शुरू कर दिया और सभा बिना किसी हल या नतीजे के ही समाप्त हो गई.


शास्त्रों ने मुझे संवारा है.
कविता ने फिर सराहा मुझको,
गीतों ने पनपाया है.
हूँ गौरव आर्यों का मैं तो,
मुझसे भारत की पहचान।
भारत माँ के माथे की बिंदी,
है हिन्दी मेरा नाम.


पहले जब वो होती  थी
एक खुमारी सी छा जाती थी

पुतलियाँ आँखों की स्वत ही
चमक सी जाती थीं
आरक्त हो जाते थे कपोल  
और सिहर सी जाती थी साँसें


खड़े वट वृक्ष की तरह
देते छाया कड़ी घूप में
और रहते मौन
नहीं मांगते क़र्ज़ भी
कभी अपने पितृत्व का।


मम्मी ने चेतावनी दी – सोच लो, रह लोगी? नमक नहीं खाते बिलकुल, मीठे पर रहना पड़ेगा. रात को भी सब्जी – वब्जी नहीं मिलेगी. बेसन के परांठे खाने पड़ेंगे चीनी पड़े दही के साथ. सुनकर एक बार को दिल धड़का, बोला – छोड़ न, ऐसा भी क्या है. बेकार का झमेला. फिर आत्मा ने कहा – अरे कुछ नहीं होगा. यूँ भी जन्माष्टमी, शिवरात्री के व्रत नहीं रखते क्या. और दो सही. हो जायेगा और आखिरकार हमें व्रत रखने की इजाजत मिल गई.


आंचलिक बोली में या आम बोलचाल की स्थानीय भाषा में और पाठ्यक्रम की किताबों की भाषा में अंतर होता है और वह अंतर होना ही चाहिए. यही सब देखना शिक्षा बोर्ड, शिक्षाविद और लेखकों का काम भी है और फ़र्ज़ भी. ..यूँ कुछ आंचलिक भाषाओं में गालियाँ भी सहज रूप से प्रयोग की जाती हैं. तो क्या हम उन्हें बच्चों की पाठ्यपुस्तक में शामिल कर लेंगे?
हालाँकि मेरा व्यक्तिगत रूप से मानना है कि शब्द कोई बुरा नहीं होता, उसे बोलने और समझने वाले की नियत बुरी हो सकती है.
......
2009 से 2021 तक की रचनाएँ हैं
बीच के वर्ष छोड़ दिए...पढ़ने लायक होते हुए भी
चांवल पकाते समय दो-चार दाने ही देखा जाता है
सादर..