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Saturday, February 24, 2018

परिक्रमा....डॉ. भावना कुँअर

परिक्रमा!
तुम यहाँ
तुम यहाँ क्यों खड़ी हो
अभी तो तुम वहाँ थी
ये कैसे सम्भव है
कि तुम दोनों जगह मौजूद हो
क्योंकि तुम तो एक हो
अभी तो सुख से विलीन थी
अब यहाँ दु:ख से आसक्त हो
असम्भव है ये
तुम्हारा दोनों जगह होना
क्या?
सुख दु:ख का
पाठ पढ़ा रही हो!
या व्यर्थ ही
चक्कर लगा रही हो!
कभी तो तुम
दो दिलों को
एक करने के लिये
अग्नि के फेरे लगा रही हो
कभी विरह व्यथा में जलते हुए
पिता का पुत्र से वियोग दिला रही हो
-डॉ. भावना कुँअर

Tuesday, February 20, 2018

प्रश्न....शबनम शर्मा


मत करो मुझसे कोई
भी प्रश्न
मैं प्रश्नों से घिरी
ज़िन्दगी जीना नहीं चाहती।
छटपटाती है ज़िन्दगी
तो कोई भी पूछता नहीं
फिर क्यों टकटकी सी
लगाते हो, जब कभी
चेहरे पर मुस्कुराहट
आती है पल भर के लिए
छिपाये हैं मैंने आँसुओं के
सैलाब, कई काली भीषण रातों,
तरसते दिल में।

- शबनम शर्मा

Monday, February 19, 2018

पानी की बूँदें कहें....मनोज कुमार शुक्ल ‘मनोज’

पानी की बूँदें कहें, मुझको रखो सहेज।
व्यर्थ न बहने दो मुझे, प्रभु ने दिया दहेज॥

बादल बरखें नेह के, धरा प्रफुल्लित होय।
हरित चूनरी ओढ़ के, प्रकृति मुदित मन होय॥ 

ताल तलैया बावली, बनवाने का काम।
पुण्य कार्य करते रहे, पुरखे अपने नाम॥

निर्मल जल पीते रहे, दुनिया के सब लोग।
नहीं किसी को तब हुआ, इससे कोई रोग॥

अविवेकी मानव हुआ, कर बस्ती आबाद।
नदी सरोवर बावली, किए सभी बरबाद॥

जल को संचित कीजिये, ताल बांध औ कूप। 
साफ स्वच्छ इनको रखें, नहीं छलेगी धूप॥

सरवर गंदे हो गये, तो जीवन दुश्वार । 
जल, थल, नभ-चर औ अचर, संकट बढ़ें हज़ार॥

जल जीवन मुस्कान है, समझो इसका अर्थ ।
पानी बिन सब सून है, नहीं बहाओ व्यर्थ॥
-मनोज कुमार शुक्ल ‘मनोज’

Sunday, February 18, 2018

इश्क़.....निर्मल सिद्धू

इश्क़ का शौक़ जिनको होता है
मौत का न ख़ौफ़ उनको होता है

घूमते फिरते हैं फ़क़त दर बदर
ये मर्ज़ न हर किसी को होता है

ली होती है मंज़ूरी तड़पने की
मिला ख़ुदा से यही उनको होता है

चुनता है वो भी ख़ास बन्दों को ही
इसलिये न जिसको तिसको होता है

सहरा की रेत हो या फ़ाँसी का फंदा
गिला कुछ भी न उनको होता है

अख़्तियार में कुछ रह नहीं जाता
ये इशारा जब दिल को होता है

ख़्याल निर्मल को ये सता रहा है
ख़ुदाया, क्यों नहीं सबको होता है
-निर्मल सिद्धू

Wednesday, February 14, 2018

बेमौसम हिमपात....अखिल भंडारी

दरख़्तों पर नये पत्ते
हरे होने लगे हैं लॉन 
चटखती महकती कलियाँ 
चमकती धूप, हल्की हल्की तपिश 
धीमे धीमे से बहती सर्द हवा 
खुला खुला सा नीला आकाश 
वापसी मौसमी परिंदों की 
गर्म कपड़ों में सैर करते बुज़ुर्ग
सब तरफ़ फूल खिलने वाले हैं 
मगर, अचानक, बरफ़ की चादर 
स्याह बादल, सूनी गलियाँ 
सारा मंज़र बदल गया है
-अखिल भंडारी

Friday, February 9, 2018

पलाश (हाइकु).......ज्योत्सना प्रदीप


1.
पलाश-वन 
पद्मिनी का मानो 
जौहर-यज्ञ।
2.
तुम्हारी होली!
शहीद हुए देखो 
पलाश-पुष्प।
3.
पलाश-वन
बन गई देह ये
तुम्हारे बिन।
4.
जाने कब से
और किससे जले
पलाश–प्रेमी।
5.
लाल -पीले हैं
जन्म से ही क्रोधित
पलाश–पुष्प।
6.
पलाश-पुष्प
मानो नव-वधुएँ
सभा में साथ।

-ज्योत्सना प्रदीप

Wednesday, February 7, 2018

नदी जब चीरकर छाती पहाड़ों की निकलती है.....अवधेश कुमार मिश्र "रजत"

नदी जब चीरकर छाती पहाड़ों की निकलती है,
टकराकर वो चट्टानों से फिर थोड़ा सम्भलती है।
किसी नवजात बच्चे ने लिया हो जन्म जैसे कि,
हर्षित हो बड़े ही वेग से फिर वो नीचे उतरती है॥

बनाती राह ख़ुद अपनी सँवारे ज़िन्दगी सबकी,
पाले गोद में सबको करे ना बात वो मजहब की।
करे शीतल मरुस्थल को वनों को भी दे जीवन,
सींचकर फसलों को वो खेतों को दे नव यौवन।

करे निःस्वार्थ वो सेवा न थकती है न रुकती है॥
नदी जब चीरकर छाती पहाड़ों की निकलती है॥

हुए हम स्वार्थ में अंधे मिटाते रोज उपवन को,
करें दूषित उसे ही जो करे स्वच्छ तन–मन को।
बहाते मूर्तियाँ देवों की जब हम धारा में इसकी,
कभी सुनकर देखो लेती हैं प्रतिमायें वो सिसकी।

तुम्हें क्या भान है तब आस्था कैसे बिलखती है॥
नदी जब चीरकर छाती पहाड़ों की निकलती है॥

कूड़ों से, शवों से पाटते हैं हर दिन हम इसको,
ब्यथा अपनी सुनाये नदी जाकर अब किसको।
बाँधा हर कदम पर वेग को इसके अब हमने,
कहाँ देते हैं स्वच्छन्द हो इसको तो अब बहने।

बन्धन मुक्त होने के लिए यह हरपल तड़पती है॥
नदी जब चीरकर छाती पहाड़ों की निकलती है॥

सहन की दीवारें जब भी इसकी ध्वस्त होती हैं,
मनुष्यों की हर इक शक्तियाँ तब पस्त होती हैं।
सीमायें तोड़कर ये जब विनाशक रूप में आये,
इसके कोप के आगे न फिर तो कोई ठहर पाये।

प्रलय के बाद खुद भी "रजत" ये तो सिसकती है॥
नदी जब चीरकर छाती पहाड़ों की निकलती है॥
-अवधेश कुमार मिश्र "रजत"

Monday, February 5, 2018

ये कैसा बचपन.....डॉ. आरती स्मित


मैली कुचैली बोरी 
ठूँस-ठूँस कर 
भरे जानेवाले कचरे ---
जूठन और भी बहुत कुछ !
उन्हें बटोरते नन्हे हाथ 
बचपन के।
खेल नहीं खिलौने नहीं
कूड़े को उलीचती उँगलियाँ 
गंदगी से खुजलाता बदन 
फेंके जूठे केक और बिस्कुट 
छीनने को आतुर श्वान
क्रंदन करता अन्तर्मन!
ये कैसा बचपन?

आँखें है ख़्वाब नहीं 
क़दम हैं गति नहीं 
साँसें हैं जीवन नहीं 
ना हँसी-ठिठोली ना अल्हड़पन!
ये कैसा बचपन?

ललचाई नज़रें 
टुक-टुक देखती किताबें /
जूते और पोशाकें 
सुनतीं प्रार्थना की ध्वनि 
और हमउम्रों का शोर 
चेहरा धँस जाता बरबस 
लोहे के सींखचों में;
कुछ थाह पा लेने की ललक 
दरबान की कठोर आवाज़ 
रपेटने को खूंखार कुत्ते 
झुरझुरी खा जाता तनमन!
ये कैसा बचपन?

कूड़े की गठरी में 
कूड़े–सी ज़िंदगी !
माँ–बाप की गोद नहीं 
फुटपाथ का जीवन 
मंदिर में मुस्काते भगवान
आकुल मन है अनबूझ प्रश्न!
ये कैसा बचपन?

-डॉ. आरती स्मित

Sunday, February 4, 2018

तेरा एहसास तो है.....अंतरिक्ष शर्मा


तू नहीं, 
तेरा एहसास तो है।
एक नूरानी चेहरा,
दिल के पास तो है।
तू न मिले फिर भी,
तेरे दीदार की आस तो है।
हम भी ख़ुश हैं ये सोचकर कि,
कोई कहीं हमारा भी, 
ख़ास तो है।
तुझे पाने की चाह से ही,
जीवन में कुछ,
हास-परिहास तो है।
तेरी ही फ़िकर, 
हर दिन, 
हर पल,
इसका गवाह,
वो इतिहास तो है।
अरसों बीत जाते हैं, 
ख़यालों में तेरे,
तेरे ही नाम की, 
हर एक साँस तो है।
कृष्ण के प्रेम में, 
गोपियाँ झूमें-गाए,
तुझे ही राधा मानता है कोई,
इसका तुझे भी, 
आभास तो है।

-अंतरिक्ष शर्मा

Wednesday, January 31, 2018

शब्द...........डॉ. प्रभा मुजुमदार


मिट्टी से सोच
आकाश की कल्पना
वक़्त से लेकर
हवा, धूप और बरसात
उग आया है
शब्दों का अंकुर
कागज़ की धरा पर
समय के एक छोटे से 
कालखंड को जीता
ज़मीन के छोटे से टुकड़े पर
जगता और पनपता
फिर भी जुड़ा हुआ है
अतीत और आगत से
मिट्टी की
व्यापकता से।
-डॉ. प्रभा मुजुमदार

Tuesday, January 30, 2018

माँ (छन्द : माहिया).....कृष्णा वर्मा

माँ का घर में होना
चौरे पर दीपक
रोशन कोना-कोना।

हर उफ़्फ़ पर आह भरे
कितना बदलो तुम
माँ की ममता ना मरे।

दुख-दर्द सभी पीती
खोजे नेह सदा
घर की ख़ातिर जीती।

माँ छोड़ न तू डोरी
बचपन ज़िंदा रख
ना मरने दे लोरी।

माँ तेरे साय तले
लगते बिटिया को
तीज-त्योहार भले।
-कृष्णा वर्मा

Sunday, January 28, 2018

इनकी ख़ुशबू से....सीमा गुप्ता "दानी"

इनकी ख़ुशबू से मुअत्तर है ये गुल्शन मेरा,
मेरे बच्चों से महकता है नशेमन मेरा।

खेलते देखती हूँ जब भी कभी बच्चों को,
लौट आता है ज़रा देर को बचपन मेरा।

मुझको मालूम है दरअस्ल है दुनिया फ़ानी,
मोहमाया में गुज़र जाए न जीवन मेरा।

तू जो आ जाए तो बरसात में भीगें दोनों,
सूखा-सूखा ही गुज़र जाए न सावन मेरा।

खो गई कौन सी दुनया में न जाने 'सीमा',
आ तरसता है तेरे वास्ते आँगन मेरा।
-सीमा गुप्ता "दानी"

Saturday, January 27, 2018

अश्रु नीर....दीपा जोशी

यह नीर नही
चिर स्नेह निधि
निकले लेन
प्रिय की सुधि

संचित उर सागर
निस्पंद भए
संग श्वास समीर
नयनों में सजे

युग युग से
जोहें प्रिय पथ को
भए अधीर
खोजन निकले

छलके छल-छल
खनक-खन मोती बन
गए घुल रज-कण
एक पल में
-दीपा जोशी

Thursday, January 25, 2018

बसंत आया (ताँका)...........डॉ. सरस्वती माथुर

बसंत राग
धरा गगन छाया
सुमन खिलाने को
ऋतुराज भी
कोकिल सा कूकता
मधुबन में आया।
.......
सरसों झूमा
बासंती मौसम में
खेतों में लहराया
धरा रिझाने
तरूवल्ली सजाने
बसंतराज आया।
.......
बौराया मन 
कोयलिया पंचम
राग छेड़ती डोले
ओढ़ कर चूनर
बासंती रंग संग 
फूल पात पे डोले।
.......
प्रीत के गीत
गुनगुनाता आया
पीताम्बर डाल के
बसंत छाया
कोयलिया कुहकी
पलाश दहकाया।
-डॉ. सरस्वती माथुर

Sunday, January 21, 2018

सच कहेगा..........’गुमनाम’ पिथौरागढ़ी


२१२२
सच कहेगा
तो मरेगा

दुश्मनी से
घर जलेगा

झूठ यारों
सर धुनेगा

हाल दिल का
कब सुनेगा

कोठरी दिल
ग़म पलेगा

दिल है दर्पण
सच कहेगा

साथ तू है
जग जलेगा
-’गुमनाम’ पिथौरागढ़ी