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Saturday, February 16, 2019

27....सारे कुकुरमुत्ते मशरूम नहीं हो पाते हैं

सादर अभिवादन
प्रेम दिवस का खात्मा
फिर भी बाकी है
बाती की गर्मी
चलेगा अभी कुछेक दिन और
लगभग होली तक...
चलिए चलें देखें इस सप्ताह क्या है.... 


हो दैय्या रे दैय्या चढ़ गए पापी बिछुवा....

" सुनो किसी ओझा को जानते हो  "
" क्या  "
" समझ नहीं आया क्या किसी झाड़ फूंक वाले को जानते हो  "
"  मुझसे झगड़ा कर , इतना सूना कर तुम्हारा मन नहीं भरा क्या अब मुझपे जादू टोना भी करवाओगी  "
" भूत उतरवाना है सर से  "


नज़र चुरा के चले, जिस्म-ओ-जाँ बचा के चले

बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे
बोल, ज़बाँ अब तक तेरी है
तेरा सुतवाँ जिस्म है तेरा
बोल कि जाँ अब तक तेरी है
आईए हाथ उठाएँ हम भी
हम जिन्हें रस्म-ए-दुआ याद नहीं


मीठी यादों वाली खिड़की और लोक की यादें

शब्दों का सफ़र- सोचती हूँ तो उन स्मृतियों में कितने सुंदर शब्द हुआ करते थे जिनकी अब सिर्फ यादे हैं. नाना जी अमरुद को हमेशा बिहीं कहा करते थे. कुँए से पानी निकालने वाली रस्सी को उघानी कहा जाता था और ताला चाबी को कुलुप और उघन्नी कहा जाता था. हम बाबा और नाना को नन्ना कहा जाता था. बिट्टा, लल्ला जैसे रस में भीगे हुए लगते थे. ‘बिट्टा तुम किते जाय रई’ अगर कहीं से कोई पूछ ले तो लगता है निष्प्राण होती देह में रक्त संचार बढ़ गया हो. यह है लोक से जुड़े अपनेपन की ऊष्मा का असर.


मंथन !....

पात-डालियों की जिस्मानी मुहब्बत,अब रुहानी हो गई,
मौन कूढती रही जो ऋतु भर, वो जंग जुबानी हो गई।

बोल गर्मी खा गये पातियों के,देख पतझड़ को मुंडेर पर,
चेहरों पे जमी थी जो तुषार, अब वो पानी-पानी हो गई।

सृजन की वो कथा जिसे,सृष्टिपोषक सालभर लिखते रहे,
पश्चिमी विक्षोभ की नमी से पल मे, खत्म कहानी हो गई।


है कैसी जुदाई...

भटकती रूहों को है पास आना ,
आंचल तुम्हारा है वो आशियाना ;
पथिक का नहीं है कोई ठिकाना-
मिलन की चाहत,है कैसी जुदाई?

उखड़ती सांसें वो - तरसी  निगाहें-
तुम्हें पुकारे जो बहे अश्रुधारा ;
अगन जला, है अनंत में समाना
बसंत की  आस, है कैसी   जुदाई ?


"प्यार का दिन "....

प्यार हो जाये तो ,इस प्यार का इजहार न कर 
शाक से टूट के गुंचे  भी  कभी  खिलते  है 
रात और दिन भी जमाने में कभी मिलते हैं 
छोड़ दे जाने दे तकदीर से तकरार न कर "


आखरी कब तक...

यूं वेकसूर को हर ले जाएगी मृत्यु आखरी कब तक
हंसते खेलते परिवार पर तुषारपात आखरी कब तक
कौन आया वो मौत का सौदागर इन सुंदर वादियों में
बिना मोल का ले जाना जारी रहेगा आखरी कब तक।

प्रेम दिवस उलूक के साए में

हैं एक जैसे
बहुत से 
गिरगिट
रंग बदलते 
चले जाते हैं 
इंद्रधनुष
बनने की 
चाह में
पर उन्हे 
पता ही
नहीं चल 
पाता है
कि वो कब
कुकुरमुत्ते 
हो गये

बहुत हो गई बक-बक
अब चलें कल रविवार है
बासी त्योहा भी मनाना है
यशोदा