सादर वन्दे..
आज फेसबुक में एक स्टेटस
दिखाई पड़ी अक्षरशः प्रस्तुत है
आभार दीदी को
विश्व में कोई भी व्यक्ति पूर्ण "संस्कारी" नहीं है,
इसीलिए ...शायद ... मरने के बाद ही,
उसे "अंतिम संस्कार" मिलता है
अब चलिए रचनाओं की ओर..
अब चलिए रचनाओं की ओर..
शीतकाल के अंत में,
जब महुआ पेड़ के पल्लव विहीन
टहनियों में उभरते हैं पुष्प शंकु,
उस पतझर के मौसम में
अरण्य -नदी ख़ुद को
अपने ही में समेट कर बहे जाती है,
चल री गुलाबो
सुबह सुबह अपने मुख पर
हम भी धूल का उबटन लगा लेते हैं
वो कोठी वाली मेम साब की तरह
हम भी अपना चेहरा
अच्छी तरह से चमका लेते हैं !
हे उद्धार कारणी मुझे अवगुणों से दूर रखना
मन के अंधेरे को ज्ञान ज्योति का प्रकाश देना
पंकज सी निर्मलता मेरी जिन्दगी को प्रदान कर
मेरी राहों को अपनी आशीष का वरदान देना!!
माँ शारदे वर दे.....
धान ,गेहूँ,दलहन,तिलहन
कपास के फसलों के लिए
बीज की गुणवत्ता
उचित तापमान,पानी की माप
मिट्टी के प्रकार,खाद की मात्रा
निराई,गुड़ाई या कटाई का
सही समय
मौसम और मानसून का प्रभाव
भूगोल की किताब में
पढ़ा था मैंने भी
पर गमलों में पनपते
बोनसाई की तरह जीने की
विवशता ने
सीमित कर दिया
अर्जित ज्ञान।
वो पहली नज़र में देखना तुमको,
देखके तुमको यूँ मेरा तड़पना।
और फिर इस दिल का धड़कना,
इज़हार-ए- मोहब्बत को मेरा झिझकना।
....
बस
सादर..




