सादर अभिवादन
जमनदिन हमारा
आज कुछ लोग मना रहे है
कुछ कल मनाएँगे
सभी को अग्रिम आभार
उमर एक वर्ष अऊर बाढ़ गवा
सादर
आज की रचनाएँ....

कुछ अबीर गुलाल
अभी तक हैं मेरे एहसासों में,
इक वासंती स्पर्श उभरती है,
प्रायः मेरी सांसों में,

ये जो पत्ती हरी हुई है, फूल गुलाबी-से
ये चर्चाएं हैं मौसम की और विज्ञापन भी
दौर आज का यक्ष सरीखा 'कैटवॉक' करता
उसके सभी पुरातन में है एक नयापन भी

आज क्यों भीगी अँखियन कोर!
रह-रह कर मन हुआ विकल
डोल रहा हृदय अविचल
सुप्त व्यथाएँ जाग उठीं
करतीं क्रन्दन घोर!

अक्षर की कटारों में
समय की धार लिखें।
छांव के नाम लिखें...
इज़हार-ए-मुहब्बत धूप का।
ज़रूरत आन पड़ी तो...
आग को आधार लिखें।

बंदर और मदारी
दोनो का एक साथ दीदार हुआ जा रहा है
लेकिन
किसने मदारी बदल दिया
और
किसके पास
नया बंदर आ रहा है
इसका अंदाज कोई भी नहीं लगा पा रहा है
इन
सब के बीच
गौर करियेगा जरा
मेरा
सीखा सिखाया हुआ नाच
कितनी बेदर्दी से डुबोया जा रहा है
दिमाग वालों को कम
देखने वालों को ज्यादा
बारीकी से ये सब
समझ में आ जा रहा है ।
.....
बस
कल की कल
सादर
बस
कल की कल
सादर