सादर वन्दे
आल ईज़ वेल
जनम दिन हमारा तो
मिलेंगे लड्डू भी हमको ही
आज का अंक देखिए...
......
मां-बाप उम्र से नहीं बल्कि
फिकर से बूढ़े होते हैं
कड़वा है मगर सच है
जब बच्चा रोता है तो पूरी
बिल्डिंग को पता चलता है
मगर साहब
जब मां-बाप रोते होते हैं तो बाजू
वाले को भी पता नहीं चलता है
ये जिंदगी की सच्चाई है
......
आइए चलें रचनाओं की ओर

यूँ तो किसी
चुनावी मौसम के
रंगबिरंगे पोस्टरों की
मानिंद मुझे
अपनी उम्र की
बासंती हलचल में
अपने दिल की
दीवार पर
है सजाया

इक यज्ञ सा जीवन, मांगती है आहुति!
हार कर, जो छोड़ बैठे!
तीर पर ही, रहे बैठे!
ये तो धार है, बस बहे जाना है!
डुबकियाँ ले, पार जाना है!

वो कोई फ़रिश्ता न था,
इन्सां का मुकर जाना है लाज़िम,
शाख़ फिर लद जाएंगे,
गुलों का बिखर जाना है लाज़िम,
सूरत के साथ सीरत भी हो,
उतना ही रौशन ज़रूरी नहीं,
जब ढल जाए उम्र की धूप,
कोने में ठहर जाना है लाज़िम,

सारे मौसम झोली में भर लाया दिन
सांझ हुई तो फिसला उन में ही अक्सर
यूं तो पत्थर को भी पूजा है हमने
बेशक पत्थर से ही खाई है ठोकर

पत्ते की
सूखी
पसलियों में
देखिये
कितना पानी है।
जमीन
के सूखने
का
दर्द
कुछ कम हो जाया करता है
....
आज बस
सादर
आज बस
सादर