Tuesday, February 6, 2018

बात दिल की अब समझता है कौन.....आरती आलोक वर्मा



आंखों का दरिया छुपाने के लिये
मुस्कुराते  हैं      जमाने  के लिये ।।

बात दिल की अब समझता है कौन
जायें किसको गम दिखाने के लिये ।।

हां, हमे मजबूत होना ही पड़ा
राह से पत्थर  हटाने के लिये  ।।

सर झुकाना मंजूर कर "आरती "
फ़ासले दिल के मिटाने के लिये ।।

Monday, February 5, 2018

ये कैसा बचपन.....डॉ. आरती स्मित


मैली कुचैली बोरी 
ठूँस-ठूँस कर 
भरे जानेवाले कचरे ---
जूठन और भी बहुत कुछ !
उन्हें बटोरते नन्हे हाथ 
बचपन के।
खेल नहीं खिलौने नहीं
कूड़े को उलीचती उँगलियाँ 
गंदगी से खुजलाता बदन 
फेंके जूठे केक और बिस्कुट 
छीनने को आतुर श्वान
क्रंदन करता अन्तर्मन!
ये कैसा बचपन?

आँखें है ख़्वाब नहीं 
क़दम हैं गति नहीं 
साँसें हैं जीवन नहीं 
ना हँसी-ठिठोली ना अल्हड़पन!
ये कैसा बचपन?

ललचाई नज़रें 
टुक-टुक देखती किताबें /
जूते और पोशाकें 
सुनतीं प्रार्थना की ध्वनि 
और हमउम्रों का शोर 
चेहरा धँस जाता बरबस 
लोहे के सींखचों में;
कुछ थाह पा लेने की ललक 
दरबान की कठोर आवाज़ 
रपेटने को खूंखार कुत्ते 
झुरझुरी खा जाता तनमन!
ये कैसा बचपन?

कूड़े की गठरी में 
कूड़े–सी ज़िंदगी !
माँ–बाप की गोद नहीं 
फुटपाथ का जीवन 
मंदिर में मुस्काते भगवान
आकुल मन है अनबूझ प्रश्न!
ये कैसा बचपन?

-डॉ. आरती स्मित

Sunday, February 4, 2018

तेरा एहसास तो है.....अंतरिक्ष शर्मा


तू नहीं, 
तेरा एहसास तो है।
एक नूरानी चेहरा,
दिल के पास तो है।
तू न मिले फिर भी,
तेरे दीदार की आस तो है।
हम भी ख़ुश हैं ये सोचकर कि,
कोई कहीं हमारा भी, 
ख़ास तो है।
तुझे पाने की चाह से ही,
जीवन में कुछ,
हास-परिहास तो है।
तेरी ही फ़िकर, 
हर दिन, 
हर पल,
इसका गवाह,
वो इतिहास तो है।
अरसों बीत जाते हैं, 
ख़यालों में तेरे,
तेरे ही नाम की, 
हर एक साँस तो है।
कृष्ण के प्रेम में, 
गोपियाँ झूमें-गाए,
तुझे ही राधा मानता है कोई,
इसका तुझे भी, 
आभास तो है।

-अंतरिक्ष शर्मा

Saturday, February 3, 2018

यक़ीं उतना मुझे ख़ुद पर नहीं है....सुभाष पाठक ‘जिया’

किसी  से आस तुझको गर नहीं है
तो दिल के टूटने का  डर नहीं  है,

उसे रोता  हुआ देखा  किया मैं
कहूँ  कैसे कि दिल पत्थर नहीं है,

यक़ीं  जितना किया है मैंने तुझ पर
यक़ीं उतना  मुझे ख़ुद पर नहीं है,

ये दिल क्या चीज़ है मैं जान दे दूँ,
तेरी उल्फ़त से  कुछ  बढ़कर नहीं है,

किया है क़त्ल उसने इस अदा  से
कि ख़ूँ का दाग़ दामन पर नहीं है,

हुआ है  हादसा अंदर  कहीं कुछ,
जो हलचल जिस्म के बाहर नहीं है,

कहाँ जाकर 'ज़िया' रोयूँ ग़मे दिल,
कि सहरा में कोई भी दर नहीं है,

सुभाष पाठक ‘जिया’ 

Friday, February 2, 2018

क्या है मेरी बारी में....हरिवंशराय बच्चन


क्या है मेरी बारी में।


जिसे सींचना था मधुजल से
सींचा खारे पानी से,
नहीं उपजता कुछ भी ऐसी
विधि से जीवन-क्यारी में।
क्या है मेरी बारी में।



आंसू-जल से सींच-सींचकर
बेलि विवश हो बोता हूं,
स्रष्टा का क्या अर्थ छिपा है
मेरी इस लाचारी में।
क्या है मेरी बारी में।



टूट पडे मधुऋतु मधुवन में
कल ही तो क्या मेरा है,
जीवन बीत गया सब मेरा
जीने की तैयारी में|
क्या है मेरी बारी में
-हरिवंशराय बच्चन

क़ब्र में उतरते ही....मोहम्मद अलवी


क़ब्र में उतरते ही
मैं आराम से दराज़ हो गया
और सोचा
यहाँ मुझे
कोई ख़लल नहीं पहुँचाएगा
ये दो-गज़ ज़मीन
मेरी
और सिर्फ़ मेरी मिलकियत है
और मैं मज़े से
मिट्टी में घुलता मिलता रहा
वक़्त का एहसास
यहाँ आ कर ख़त्म हो गया
मैं मुतमइन था
लेकिन बहुत जल्द
ये इत्मिनान भी मुझ से छीन लिया गया
हुआ यूँ
कि अभी मैं
पूरी तरह मिट्टी भी न हुआ था
कि एक और शख़्स
मेरी क़ब्र में घुस आया
और अब
मेरी क़ब्र पर
किसी और का
कतबा नस्ब है!!

-मोहम्मद अलवी
सौजन्यः ठाले-बैठे

Thursday, February 1, 2018

छत से कूदकर आत्महत्या.....ओम प्रकाश 'आदित्य'

इस रचना का प्रसंग है कि एक नवयुवती छज्जे पर उदास बैठी है। उसकी मुख-मुद्रा देखकर लग रहा है कि जैसे वह छत से कूदकर आत्महत्या करने वाली है। आदित्य जी ने इस प्रसंग पर विभिन्न कवियों की शैलियों में लिखा है:

मैथिलीशरण गुप्त
अट्टालिका पर एक रमिणी अनमनी सी है अहो
किस वेदना के भार से संतप्त हो देवी कहो?
धीरज धरो संसार में, किसके नही है दुर्दिन फिरे
हे राम! रक्षा कीजिए, अबला न भूतल पर गिरे।

सुमित्रानंदन पंत
स्वर्ण–सौध के रजत शिखर पर
चिर नूतन चिर सुंदर प्रतिपल
उन्मन–उन्मन‚ अपलक–नीरव
शशि–मुख पर कोमल कुंतल–पट
कसमस–कसमस चिर यौवन–घट

पल–पल प्रतिपल
छल–छल करती निर्मल दृग–जल
ज्यों निर्झर के दो नीलकमल
यह रूप चपल ज्यों धूप धवल
अतिमौन‚ कौन?
रूपसि‚ बोलो‚
प्रिय‚ बोलो न?

रामधारी सिंह 'दिनकर'
दग्ध हृदय में धधक रही
उत्तप्त प्रेम की ज्वाला।
हिमगिरि के उत्स निचोड़‚ फोड़
पाताल बनो विकराला।
ले ध्वंसों के निर्माण त्राण से
गोद भरो पृथ्वी की।
छत पर से मत गिरो
गिरो अंबर से वज्र–सरीखी।

काका हाथरसी
गोरी बैठी छत्त पर‚ कूदन को तैयार
नीचे पक्का फर्श है‚ भली करे करतार
भली करे करतार‚ न दे दे कोई धक्का
ऊपर मोटी नार कि नीचे पतरे कक्का
कह काका कविराय‚ अरी! मत आगे बढ़ना
उधर कूदना‚ मेरे ऊपर मत गिर पड़ना

गोपाल प्रसाद व्यास
छत पर उदास क्यों बैठी है‚
तू मेरे पास चली आ री।
जीवन का सुख–दुख कट जाए‚
कुछ मैं गाऊं‚ कुछ तू गा री।

तू जहां कहीं भी जाएगी‚
जीवन–भर कष्ट उठाएगी।
यारों के साथ रहेगी तो‚
मथुरा के पेड़े खाएगी।

श्यामनारायण पाण्डेय
ओ घमंड मंडिनी‚
अखंड खंड–खंडिनी।
वीरता विमंडिनी‚
प्रचंड चंड चंडिनी।

सिंहनी की ठान से‚
आन–बान–शान से।
मान से‚ गुमान से‚
तुम गिरो मकान से।

तुम डगर–डगर गिरो
तुम नगर–नगर गिरो।
तुम गिरो‚ अगर गिरो‚
शत्रु पर मगर गिरो।

भवानीप्रसाद मिश्र
गिरो!
तुम्हें गिरना है तो ज़रूर गिरो
पर कुछ अलग ढंग से गिरो
गिरने के भी कई ढंग होते हैं!
गिरो!
जैसे बूंद गिरकर किसी बादल से
बन जाती है मोती
बख़ूबी गिरो, हँसते-हँसते मेरे दोस्त
जैसे सीमा पर गोली खाकर
सिपाही गिरता है
सुबह की पत्तियों पर
ओस की बूंद जैसी गिरो
गिरो!
पर ऐसे मत गिरो
जैसे किसी की आँख से कोई गिरता है
किसी गरीब की झोपड़ी पर मत गिरो
बिजली की तरह
गिरो! पर किसी के होकर गिरो
किसी के ग़म में रोकर गिरो
कुछ करके गिरो

गोपालदास "नीरज"
यों न उदास रूपसी‚ तू मुस्कुराती जा‚
मौत में भी ज़िन्दगी के फूल कुछ खिलाती जा।
जाना तो हर एक को एक दिन जहान से‚
जाते–जाते मेरा एक गीत गुनगुनाती जा।

सुरेन्द्र शर्मा
ऐ जी, के कर रही है
छज्जे से नीचे कूदै है?
तो पहली मंज़िल से क्यूँ कूदे
चौथी पे जा!
जैसे के बेरो तो लाग्ये के कूदी थी!

-ओम प्रकाश 'आदित्य'
साभारः कविता कोश