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Thursday, March 15, 2018

दिल को जीने का सहारा भी न दें....कुसुम कोठारी


माना उम्मीद पर जीने से हासिल कुछ नही लेकिन 
पर ये भी क्या,कि दिल को जीने का सहारा भी न दें।

उजडने को उजडती है बसी  बसाई बस्तियां 
पर ये भी क्या के फकत एक आसियां भी ना दे। 

खिल के मिलना ही है धूल मे जानिब नक्बत
पर ये क्या के खिलने को गुलिस्तां भी न दे।

माना डूबी है कस्तियां किनारों पे मगर
पर यूं भी क्या किसी को अश़्फाक भी न दे।

बरसता रहा आब ए चश्म रात भर बेजार 
पर ये क्या उक़ूबत तिश्नगी मे पानी भी न दे।

मिलने को तो मिलती रहे दुआ ए हयात रौशन 
पर ये क्या के अजुमन को आब दारी भी न दे ।

-कुसुम कोठारी

नक्बत=दुर्भाग्य, अश़्फाक =सहारा, आब ए चश्म = आंसू,
उक़ूबत =सजा,तिश्नगी =प्यास

Wednesday, February 21, 2018

मैं भी मुस्कुरा उठी ....कुसुम कोठारी

ख्वाबों मे वो हंस रही थी 
मैं भी मुस्कुरा उठी 
ख्वाबों मे वो गुदगुदा रही थी
मै भी खिल खिला उठी 
ख्वाबों में वो हिम्मत दे रही थी 
मैं पंख फैला के उड़ी
ख्वाबों मे वो गा रही थी
मैं भी गुनगुन उठी 
ख्वाबों मे वो ठुमक रही थी 
मैं भी थिरक उठी
ख्वाबों मे वो अलसा रही थी 
मैं भी मीठी नींद छोड़ उठी
ख्वाबों मे दूर खड़ी वो कौन थी 
वो जिंदगी थी वो मेरी जिंदगी ।। 
-कुसुम कोठारी