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Friday, February 23, 2018

लक्ष्य को साधें (हाइकु)....कुसुम कोठारी

अम्बर सजा
इंद्रधनुषी रंग
बौराई दिशा। 

चांद सितारे
ले उजली सी यादें
आये आंगन। 

कौन छेडता
मन वीणा के तार
धीरे धीरे से।

दूधिया नभ
निहारिका शोभित
मन चंचल ।

हवा बासंती
बहती धीरे धीरे
गूंजे संगीत।

दरख्त मौन
बसेरा पंछियों का
सुबह तक।

सूरज जला
पहाड़ थे पिघले
नदी उथली ।

राह के कांटे
किसने कब बांटे
लक्ष्य को साधें।

-कुसुम कोठारी 

Wednesday, February 21, 2018

मैं भी मुस्कुरा उठी ....कुसुम कोठारी

ख्वाबों मे वो हंस रही थी 
मैं भी मुस्कुरा उठी 
ख्वाबों मे वो गुदगुदा रही थी
मै भी खिल खिला उठी 
ख्वाबों में वो हिम्मत दे रही थी 
मैं पंख फैला के उड़ी
ख्वाबों मे वो गा रही थी
मैं भी गुनगुन उठी 
ख्वाबों मे वो ठुमक रही थी 
मैं भी थिरक उठी
ख्वाबों मे वो अलसा रही थी 
मैं भी मीठी नींद छोड़ उठी
ख्वाबों मे दूर खड़ी वो कौन थी 
वो जिंदगी थी वो मेरी जिंदगी ।। 
-कुसुम कोठारी

Thursday, February 8, 2018

फगुनायौ अम्बर आकाश......डॉ. इन्दिरा गुप्ता

फागुन छायो अब बसंत पर 
फगुनायौ अम्बर आकाश 
अबीर गुलाल भर घट के भीतर 
दियो उंडेल उषा नभ आज ! 

चटख केसरी रंग घुल गयो 
थोड़ो टेसू दिनो डार 
नव लाजवंती नार सरीखो 
अम्बर सजो धजो सो जाय ! 

नीलाम्बुज ने ओढ़ी चुनर 
हरीत पात की बूटी छाय
जल लागे ज्यू धूलि चुनरिया 
सागर जल रंग दिनो जाय ! 

फागुन आयो बजे दुंदभी 
मनइ चंग फगुनाई जाय 
चहुँदिश बाज रहे नक्कारे 
ऋतु गुलाल की हिय भरमाय! 

डॉ. इन्दिरा गुप्ता ✍

Wednesday, January 24, 2018

ना .....री .....डॉ. इन्दिरा गुप्ता

पल पल लांछित होती नारी
मूक निहारे दुनियाँ सारी
नारी को ही जागना होगा
तभी मिटेगी ये व्यभिचारी !

बिखरे भाव समेटने होगे
रक्ताभ नयन पुनि करने होगे
ज्वाला सी धधको तुम जग में
तजो विवशता और लाचारी !

नारी का मतलब है ना ....री
सर झुका काहे तू हारी
असत्य का प्रतिरोध करो तुम
दोयम दर्जा तू तो ना ...री !

घर समाज की धुरी तू है
काहे की लघुता लाचारी
उठो झाड़ लो धूल समय की
निरीह नहीँ तू है बलशाली !

डॉ. इन्दिरा गुप्ता ✍