अम्बर सजा
इंद्रधनुषी रंग
बौराई दिशा।
चांद सितारे
ले उजली सी यादें
आये आंगन।
कौन छेडता
मन वीणा के तार
धीरे धीरे से।
दूधिया नभ
निहारिका शोभित
मन चंचल ।
हवा बासंती
बहती धीरे धीरे
गूंजे संगीत।
दरख्त मौन
बसेरा पंछियों का
सुबह तक।
सूरज जला
पहाड़ थे पिघले
नदी उथली ।
राह के कांटे
किसने कब बांटे
लक्ष्य को साधें।
-कुसुम कोठारी



