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Thursday, February 8, 2018

फगुनायौ अम्बर आकाश......डॉ. इन्दिरा गुप्ता

फागुन छायो अब बसंत पर 
फगुनायौ अम्बर आकाश 
अबीर गुलाल भर घट के भीतर 
दियो उंडेल उषा नभ आज ! 

चटख केसरी रंग घुल गयो 
थोड़ो टेसू दिनो डार 
नव लाजवंती नार सरीखो 
अम्बर सजो धजो सो जाय ! 

नीलाम्बुज ने ओढ़ी चुनर 
हरीत पात की बूटी छाय
जल लागे ज्यू धूलि चुनरिया 
सागर जल रंग दिनो जाय ! 

फागुन आयो बजे दुंदभी 
मनइ चंग फगुनाई जाय 
चहुँदिश बाज रहे नक्कारे 
ऋतु गुलाल की हिय भरमाय! 

डॉ. इन्दिरा गुप्ता ✍

Wednesday, January 24, 2018

ना .....री .....डॉ. इन्दिरा गुप्ता

पल पल लांछित होती नारी
मूक निहारे दुनियाँ सारी
नारी को ही जागना होगा
तभी मिटेगी ये व्यभिचारी !

बिखरे भाव समेटने होगे
रक्ताभ नयन पुनि करने होगे
ज्वाला सी धधको तुम जग में
तजो विवशता और लाचारी !

नारी का मतलब है ना ....री
सर झुका काहे तू हारी
असत्य का प्रतिरोध करो तुम
दोयम दर्जा तू तो ना ...री !

घर समाज की धुरी तू है
काहे की लघुता लाचारी
उठो झाड़ लो धूल समय की
निरीह नहीँ तू है बलशाली !

डॉ. इन्दिरा गुप्ता ✍