Saturday, October 27, 2018

12. मेंहदी वाले हाथ...

हिंदू संस्कृति में स्त्रियाँ अपने परिवार ,अपने जीवन-साथी के साथ और सुख-समृद्धि के लिए अनेक व्रत और उपवास रखती हैं।
करवा चौथ कार्तिक मास के कृष्णपक्ष में चतुर्थी तिथि को मनाया जाने वाला त्योहार है।
उत्तर पूर्वी भारत में प्रमुखता से मनाया जाने वाला यह त्योहार सुहागिन स्त्रियों के द्वारा किया जाता है।
दिनभर निर्जला उपवास करके शाम को सोलह श्रृंगार से अलंकृत होकर स्त्रियाँ शिव-पार्वती की पूजा करती है और चाँद निकलने पर चाँद की पूजा करके अर्ध्य देकर पति के हाथों पानी पीकर व्रत का समापन करती है।

  आज की रचनाएँ पढ़ते हैं-


अब हम भले ही डिफेक्टिव पीस निकल गए पर एक बात है कि हमें व्रत, पूजा-पाठ करती और खूब सजी-धजी स्त्रियाँ बेहद प्यारी लगती हैं. त्योहारों में इनमें एक अलग ही नज़ाकत और शर्मीलापन-सा भर जाता है. पति के छेड़ने पर जब ये मुस्कुराते हुए "चलो, हटो" कहती हैं तो उस समय उनकी ये अदा देखते ही बनती है. आस्था-विश्वास से भरे इन प्यारे चेहरों और इनके मेहंदी भरे हाथ देखना बेहद अच्छा लगता है. इसलिए मैं तर्क-वितर्क में नहीं पड़ती
★★★★★★




पिंकी छोटे-छोटे बर्तनों में खाना बनाने का खेल खेल रही थी और बोले जा रही थी –‘‘रवि! आइए! आपका पराठा बन गया ! ये लीजिए!”
सुमन की हँसी फूट पड़ी ! रवि उसके पति अर्थात् पिंकी के पापा का नाम था !
“अरे! ये तो ठंडा हो गया सुमन! इतना ठंडा नहीं खा सकता मैं!”
“कोई बात नहीं! आप छोड़ दो उसे, मैं खा लूँगी ! मैं आपके लिए और ला रही हूँ गर्म-गर्म ! ये लीजिए !

★★★★★★★




हमारे रुढ़िवादी समाज और धार्मिक कट्टरता का शिकार मैं कई बार मजहबी पाबंदियों के प्रति तल्ख़ हुई तो इसकी वजह मेरा भोगा हुआ यथार्थ ही था. एक संकीर्ण मानसिकता से मेरा हुआ नुकसान मुझे मुखरता से लिखने के लिए जैसे उकसाता था. फिर भी मैंने भरसक कोशिश की कि मेरा लेखन महज़ कोसाई का नमूना ही बन कर ना रह जाए. मैंने कोशिश की कि नकारात्मकता से पॉजिटिविटी की तरफ के सफ़र की मैं फ्लैग बियरर बनूँ. 

★★★★★

आज के लिए इतना ही

आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा में..




Saturday, October 20, 2018

11....उम्र ढल चुकी अब तो, और दूर चला नहीं जाता

सादर अभिवादन
दशहरा तो हो गया कल
जल गया पुतला रावण का
जिन्होंनें कल जलाया उनके भीतर का
श्री राम जीवित था....पर आज...
जस का तस हो गया.....
-*-*-*-
चलिए चले आज की संक्षिप्त प्रस्तुति की ओर....
विभा दीदी की कलम से...
"शुभोत्कर्षिणी"

सभी उलझन में ही थे कि लाल कमल से भरी टोकरी लेकर अलगू की बेटी चिकित्सक के सामने आ खड़ी हुई...
      "इसे लेकर मैं क्या करूँगी बेटी...? यह दुर्गा माँ के लिए होता है...।"
"जानती हूँ! आप इसमें से एक लाल कमल लेकर बोहनी समझिए डॉक्टर मैडम जी और बाबा का इलाज शुरू कीजिए... मैं मजदूरी नहीं कर सकती, व्यापार तो कर सकती हूँ...!"

-*-*-*-*-
मीना भारद्वाज जी की कलम से...
"त्रिवेणी"....

आज कल बोलने का वक्त है । 
कहने सुनने से आत्मबल बढ़़ जाता है ।

मछली बाजारों में बातें कहां शोर ही सुनता है ।। 

-*-*-*-
रविंद्र जी "रवी" पहला बार इस ब्लॉग में
ढलती उम्र.....

काफिले नजर नहीं आते ,
मंजिलें नजर नहीं आती
उम्र ढल चुकी अब तो,
और दूर चला नहीं जाता

-*-*-*-*-
संजय भास्कर की एक अनेखी पेशकश.....
हिंदी सिनेमा की सदाबहार अदाकारा और 
खूबसूरती की मल्लिका - रेखा

बॉलीवुड का ऐसा नाम जो आज भी सब के जुबां पर रहता है वो है रेखा सदाबहार अभिनेत्री रेखा हिन्दी फिल्म जगत की शान हैं। उनके चेहरे की चमक आज भी अन्य अभिनेत्रियों की शान को फीका कर देती है। अपने हिस्से आए हर किरदार को दमदार बनाने वाली रेखा के आंचल में कई बड़े पुरस्कार आए। वो राजकीय पुरस्कार पद्मश्री से भी सम्मानित हैं। 

चलते-चलते अंकित चौधरी का एक गीत

ये जो चाँद है ! चाँद नहीं है , एक सागर है ,
नाव चलाओ तो सही उसपर,
मैं  लहरों  की रवानी दे  दूं |   
पहुंच जाओ बचपन  में , कि बचपन बहुत याद आता है ,
खेल खेलो कोई फिर से ,कि मैं तुम्हे दादी की कहानी दे  दूं । 

आज बस
फिर मिलते हैं
यशोदा













Saturday, October 13, 2018

10...फितरत और फुरसत से साहित्य भी नहीं बनता है

दस नम्बरी प्रस्तुति
सादर अभिवादन.....

नवरात्रि का चौथा दिन
लगता है दीपावली करीब ही है
ऐसे मे छठ माई (सूर्य छठ) को नहीं न भूल सकते

ख्याल रखिए..बस आ ही गई छठ
छठ (पर्व) व्रत पूजा विधि और कथा

जानिए छठ पूजा कैसे करें,  2018 छठ पूजा की तारीख, इतिहास,
उत्पत्ति, छठ पूजा की कथा..सूर्य देव के पूजन व अटल आस्था का
महापर्व निर्जला व्रत छठ पर्व की शुरुआत रविवार, 11 नवंबर 2018, को नहाने और खाने से हो जाएगी। सोमवार, 12 नवंबर 2018, को छोटी छठ (खरना) के साथ 36 घंटे का निर्जला व्रत शुरू हो जाएगा। मंगलवार, 13 नवंबर 2018 संध्या अर्घ्य का दिन है जो की संध्या पूजन के रूप में भी जाना जाता है। बुधवार, 14 नवंबर 2018 की सुबह अर्घ्य और पारन या उपवास के पूरा होने का दिन है।


विषमता जीवन की....समाज का कटु सत्य

ऊंची-ऊंची अट्टालिकाओं के समक्ष
बनी ये झुग्गियां
विषमता का देती परिचय
मारती हैं तमाचा समाज के मुख पर
चलता है यहां गरीबी का नंगा नाच
भूखे पेट नंगे तन
भटकता भारत का भविष्य
मांगता जीवन की चंद खुशियां


‘मी टू...आज मीडिया जिसे उछाल रहा

हमारी लड़कियों को, हमारे लड़कों को, यौन-शोषण का शिकार होने से बचने के लिए ख़ुद दुर्गा का अथवा शंकर का रूप धारण करना होगा. साहस और आत्म-शक्ति से ऐसी अधिकांश घटनाओं को रोका जा सकता है.
समाज का दायित्व है कि वह यौन-शोषण की पीड़िता को (अथवा पीड़ित को) हिकारत की नज़र से अथवा उपहास की दृष्टि से न देखे.
मीडिया को यौन-शोषण की घटनाओं को अपने फ़ायदे के लिए प्रकाश में लाने के लालच से बचना चाहिए.
और सबसे बड़ी बात यह कि यौन-शोषण करने वालों को यह सोचना चाहिए कि इस ‘मी टू’ के दायरे में कभी उनकी अपनी बहन, अपनी बेटी और अपना बेटा भी आ सकता है.    


अब दुर्गा माता नाराज नहीं होती...!!!


कुछ साल बाद...
अब मम्मी जी से काम नहीं होता। अत: किसी भी त्योहार में पूजा की तैयारी भी मैं ही करती हूं। नाश्ते में सुबह क्या बनना हैं यह मैं पहले दिन रात को ही सोच लेती हूं और उसी के अनुसार थोड़ी सी तैयारी कर के रख देती हूं। मैं ने कोयले की बजाय गोबरी से ज्योत लेना शुरु कर दिया। कोयले की तुलना में गोबरी जल्दी सुलग जाती हैं और वैसे भी पूजा-पाठ आदि में गोबर को ज्यादा शुद्ध माना जाता हैं। मैं वक्त से पहले बराबर गोबरी सिलगने हेतु रख देती हूं। परिणाम: जब सब ज्योत लेने बैठते हैं, तो गोबरी अच्छे से सिलगने से ज्योत जल्दी आ जाती हैं! इस तरह अब दुर्गा माता मुझ से हरदम प्रसन्न रहती हैं और मुझ से कभी नाराज नहीं होती!!!

कभी कभी मेरे दिल में ख्याल आता है..

इस तपोस्थली विंध्य क्षेत्र से तुम क्या लेकर प्रस्थान करोंगे। एक विचित्र सी व्याकुलता इस शक्ति साधना पर्व पर मेरे मन में बनी हुई है। कहाँ- कहाँ से लाखों लोग जिनमें संत से लेकर भिक्षुक  तक हैं, यहाँ आये हुये हैं। लेकिन, मेरा एक प्रश्न है महामाया के दरबार में आये इस पुरुष समाज से कि इनमें से कितनों ने अपनी अर्धांगिनी में देवी शक्ति को ढ़ूंढने का प्रयास किया अथवा उसे हृदय से बराबरी का सम्मान दिया..? शिव ने अर्धनारीश्वर होना इसलिये तो स्वीकार किया।  पुरुष का पराक्रम और नारी का हृदय यह किसी कम्प्यूटर के हार्डवेयर और साफ्टवेयर की तरह ही तो है। एक दूसरे से है, इनका अस्तित्व।



चलते-चलते एक गीत...

हद पार इश्क
आओ ना
बातें करें
कुछ इसकी 
कुछ तेरे दिल की 
खुल कर-
जैसे गहराई से
सच्चाई आती है,
कुछ इशारों में हो-
छुपम छुपाई सी बाते

आज फुरसत में हैं डॉ. सुशील जी जोशी
कल रविवार जो है....


फुरसत से 
कभी फुरसत 
लिख लेने का 

मगर 
फुरसत है 
कि मिलती 
ही नहीं है कभी 
फुरसत से

फुरसत की 
फितरत में 
नहीं होती है 
फुरसत 

फितरत 
मतलब 
सयानापन 



आज अब बस
यशोदा







Saturday, October 6, 2018

09...आओ छोटा चार धाम यात्रा पर चलें

सादर अभिवादन
बातें बाद में करेंगे
पहले पढ़े एक तर्पण ऐसा भी.....
अनुराग जी शर्मा......
“जी नहीं, मैं यहाँ नहीं रहता, कर्नाटक से तीर्थयात्रा के लिये आया था। गंगाजी में पितृ तर्पण 
करने के बाद यूँ ही सैर करते-करते इधर निकल आया।”

“हर व्यक्ति, हर काम फ़ायदे के लिये करता तो संसार में कुछ भी न बचता ...
” वह मुस्कुराया, “खेत किसका है, मालिक कौन है, इससे मुझे क्या?”

“हैं!?”  “... भूड़(बालुई जमीन) में सूखती फसल देखी तो लगा कि इसे भी 
तर्पण की आवश्यकता है।”

डॉ. दयाराम आलोक बता रहे हैं सोमरस के फायदे.....
प्राचीन ग्रंथों व वेद-पुराणों में सोमवल्ली पौधे के बारे में कहा गया है कि इस पौधे के सेवन से शरीर 
का कायाकल्प हो जाता है। देवी-देवता व मुनि इस पौधे के रस का सेवन अपने को चिरायु बनाने 
एवं बल सामर्थ्य एवं समृद्धि प्राप्त करने के लिए किया करते थे। इस पौधे की खासियत है कि इसमें 
पत्ते नहीं होते। यह पौधा सिर्फ डंठल के आकार में लताओं के समान है। हरे रंग के डंठल वाले इस 
ऋग्वेद में सोमरस के बारे में कई जगह वर्णन है। एक जगह पर सोम की इतनी उपलब्धता और प्रचलन दिखाया गया है कि इंसानों के साथ-साथ गायों तक को सोमरस भरपेट खिलाए और पिलाए जाने की बात कही गई है।
(और भी बहुत कुछ है इस ब्लॉग में)

डॉ. जगदीश व्योम की ऐतिहासिक कविता
औ' हमारे 
कवच-कुंडल छिन चुके हैं 
इन्द्र का छल - 
सूर्यकुल की आस्थाएँ भी बिलाईं 
धुआँ में हम घिरे 
देती नहीं घटनाएँ दिखाईं 
रक्त बहता 
पाँव से है 
देह में भाले भुँके हैं 

हम लोग सड़क के किनारे ठंडी हवा में गरमा-गर्म चाय एवं स्नैक्स का आनंद ले ही रहे थे कि लकड़ियों के लठ्ठे से भरी हुई एवं धूल उड़ाती दस-बीस ट्रेक्टर से शुरू हुई कारवां सैकड़ो में बदल गई. हमलोग तरोताज़ा हो कर करीब दो किलोमीटर चले तब भी कारवां ख़त्म होने का नाम नहीं ले रही था. हमलोगों के लिए यह कौतूहल का विषय था कि आखिर इतनी लकड़ियाँ कहाँ से आ रहीं हैं और कहाँ जा रहीं हैं. 

खैर ! इन सब के बीच हमलोगों का हरिद्वार पहुँचने के निर्धारित समय में एक घंटा का विलंब हो गया और जिसकी तमन्ना नहीं थी वही हुआ और हमलोगों को हरिद्वार से “हर की पौड़ी” के पास कार पार्किंग तक दो किलोमीटर का रास्ता तय करने में एक घंटा लग गया . “हर की पौड़ी” के पास ही कार पार्किंग थी. हमलोग सुबह साढ़े छः बजे “हर की पौड़ी” पर गंगा स्नान के लिए पहुँच गए. ऐसे तो “हर की पौड़ी” पर भक्त गंगा स्नान के लिए सूर्योदय से पहले ही पहुँचना शुरू कर देते है और देर रात तक गंगा स्नान चलता रहता है.


आज यहीं तक
फिर मिलते हैं न
यशोदा




Saturday, September 29, 2018

08....मशीनी जीवन की विवशता समझे, सामंजस्य बैठाएं

सादर अभिवादन....
पहली अक्टूबर को अन्तर्राष्ट्रीय वृद्धदिवस पर विशेष प्रस्तुति

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बुढ़ापा, जिंदगी का एक ऐसा अंतिम पड़ाव हैं, जिसमें मनुष्य को सिर्फ़ प्यार चाहिए होता हैं। बुजुर्गों को 
केवल अपने बच्चों का साथ चाहिए होता हैं लेकिन ज्यादातर बुजुर्गों को वो भी नसीब नहीं होता। बुजुर्गों 
के प्रति सम्मान व्यक्त करने के लिए 1 अक्टूबर को अंतरराष्ट्रीय वृद्धजन दिवस निश्चिंत किया गया हैं। 
लेकिन वास्तव में वर्तमान में बुजुर्गों को जितना सम्मान मिलना चाहिए, उतना मिलता नहीं हैं। आखिर 
क्या हैं इसकी वजह? आज पत्र-पत्रिकाओं में नई पीढी द्वारा बुजुर्गों पर हो रहे अत्याचारों के किस्से 
प्रकाशित हो रहे हैं। किंतु यह सिक्के का एक ही पहलू हैं। यदि बुजुर्ग आज की भागदौड वाली और 
मशीनी जीवन की विवशता समझे, सामंजस्य बैठाएं 

आता जो याद बार-बार वो... देव आनंद
"26 सितंबर 1923 को देव आनंद पैदा हुए थे। उन्हें हमसे बिछड़े लगभग सात साल हो गए हैं, लेकिन 
हिंदी सिनेमा के इस विलक्षण व्यक्तित्व को आज भी लोग दिल से याद करते हैं। बार-बार उनकी 
फिल्में देखते हैं और कई बार उनकी नकल भी करते हैं। उनकी याद में खास- 
वे थकना नहीं जानते थे। एक फिल्म फ्लॉप हुई तो भुलाकर उसी उत्साह से दूसरी फिल्म की शूटिंग में व्यस्त 
हो जाते। जीना इसी का नाम है। उनका जीवन रोमांस में बीता। रोमांस अपनी जिंदगी से। इसीलिए उन्होंने अपनी आत्मकथा का नाम 'रोमांसिंग विद लाइफ' रखा। यह भी संयोग है कि अट्ठासी अध्याय में अपनी 
जीवन लिखने वाला अट्ठासी वर्ष की उम्र में ही चला गया।


अजीब एक 'गंध' आती है, 
एक दम अलग,
तुम औरतों से ... 
हरे धनिये की ...
या
कच्ची तुरई के पीले फूल की
या
रोप रही मिटटी की ...


क्या आपने कभी पढ़ा या सुना है कि कोई व्यक्ति, मृत्युपरांत  सरकारी कार्य हेतु किसी पद पर कार्यरत 
हो एवं उसकी पदोन्नति भी होती हो? जी हाँ! मैं ऐसी ही एक अविश्वस्नीय परन्तु वास्तविक घटना 
से आपको रुबरु कराता हूँ।  अक्सर ऐसा होता है कि हमलोगों को अपने आस-पास की घटनाओं, स्थलों या व्यक्तियों के बारे में किसी दूर अनजान जगह के लोगों से पता चलता है। 

 ऐसे ही एक व्यक्ति थे बाबा हरभजन सिंह और उनकी समाधि पूर्वी सिक्किम में है।  जब मैं वहाँ गया तो 
पता चला कि  बाबा हरभजन सिंह पंजाब में कपूरथला जिला के कूका गाँव के रहने वाले थे जो की 
मेरी कर्मस्थली से 30 कि.मी. की  दूरी  पर स्थित है।  जब मैं उनके समाधि स्थल पर श्रद्धा -सुमन 
अर्पण कर बाहर निकला तो उनके बारे में जानने की  उत्सुकता बढ़ी और जो जानकारी मुझे 
मिली उसे मैं आपलोगों से सांझा करने जा रहा हूँ। 

आज बस इतना ही...
यशोदा





Saturday, September 22, 2018

07..चूहों से बचाने के लिये बहुत कुछ को थोड़े कुछ को कुछ चूहों पर दाँव पर लगाना ही होता है

शायद हम गलत थे..जो इस तरह का अंक निकालने का 
फैसला किए..बात तो हुई थी कि कुछ मरहूम ग़ज़ल नवीस की 
नज़्में और कहानियों पर ध्यानाकर्षित करेंगे आप लोगों का, पर 
खेद है कि जो चाहा वो न हुआ....और अनचाहा हो रहा है
अब सर तो टिका दिया है ......से क्या डरना
चलिए चलिए चलें देखें आज की संक्षिप्त प्रस्तुति....

बेचैन आत्मा की बेचैनी का सबब...
सोच लो तुम 
पढ़ गयीं तो 
ज्ञान की बातें करेंगी रोज तुमसे 
सुन सकोगे? 
सूर्य को देवता कहते हो तुम तो 
आग का गोला कहेंगी! 
मान लोगे? 
-*-*-*-

सहज भाषा के नाम पर हमने, भाषा का वास्तविक 
नई पीढ़ी कितना कुछ क्लिष्ट कहकर अनदेखा कर देगी। 
कितने अध्याय अनछुए रह जाएंगे। 
भाषाई सरलीकरण के नाम पर कितने शब्दों की 
निर्मम हत्या हुई है। उन्हें याद रखने वाली पीढ़ी अंग्रेज़ी में भविष्य तलाश रही है। 
एक पूर्वाग्रह कि हिंदी में लिखा जो कुछ भी है, सब अपशिष्ट है; गहरे तक बैठ गया है। इसे पुष्ट करने वाले लोगों में कोई अपराधबोध नहीं है। उन्हें लगता है, उन्होंने भाषा को जनवादी बनाया है। 
जनवाद!..... 
भाषा पर बहस करने वाले ज़्यादातर लोगों के भीतर निपट आभिजात्य आत्मा है। स्वप्न या मद में भी इन्हें 'जन' की सुधि कहां?
.........हम भाषा के अपराधी हैं....अभिषेक शुक्ला

-*-*-*-
अब देखें न हमारे शहर के पोस्टग्रेजुएट कालेज के दो गुरुदेव  कुछ 
वर्ष पूर्व रिटायर्ड हुये। तो इनमें से एक गुरु जी ने शुद्ध घी बेचने 
की दुकान खोल ली थी,तो दूसरे अपने जनरल स्टोर की दुकान 
पर बैठ टाइम पास करते  दिखें । हम कभी तो स्वयं 
से पूछे कि क्या दिया हमने समाज को।

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आज का सम्पादकीय......डॉक्टर भैय्या जी

देर रात 
सड़क पर 
दल बल सहित 
निकले पहरेदार को 

सायरन 
बजाना ही होता है 

किनारे हो लो 
जहाँ भी हो

सेंध में लगे 
चोर भाईयों को 
सन्देश दूर से 
पहुँचाना होता है 

-*-*-*-*-
अब बस
यशोदा








Saturday, September 15, 2018

06. हिन्दी सिर्फ सुनी व बोली जाती है...अहिन्दी भाषी राज्यों में फिल्मी डॉयलाग के रूप में

हिन्दी...
एक सर्वमान्य भाषा
जो अखिल भारत में सुनी-बोली-पढ़ी-लिखी जाती है
अहिन्दी भाषी राज्यों में फिल्मी डॉयलाग को रूप में
और ये ध्रुव सत्य है...
पर कोशिश की जा रही है सीखने की
अखिल विश्व में....

सुख-शांति और ज्ञान-बुद्धि के दाता है गणपति जी...कविता रावत
“जगदम्बिका लीलामयी है। कैलाश पर अपने अन्तःपुर में वे विराजमान थीं। सेविकाएं उबटन लगा रही थी। शरीर से गिरे उबटन को उन आदि शक्ति ने एकत्र किया और एक मूर्ति बना डाली। उन चेतनामयी का वह शिशु अचेतन तो होता नहीं, उसने माता को प्रणाम किया और आज्ञा मांगी। उसे कहा गया कि बिना आज्ञा कोई द्वार से अंदर न आने पाए। बालक डंडा लेकर द्वारा पर खड़ा हो गया। भगवान शंकर अंतःपुर में आने लगे तो उसने रोक दिया। भगवान भूतनाथ कम विनोदी नहीं हैं, उन्होंने देवताओं को आज्ञा दी- बालक को द्वार से हटा देनी की। इन्द्र, वरूण, कुबेर, यम आदि सब उसके डंडे से आहत होकर भाग खड़े हुए- वह महाशक्ति का पुत्र जो था।

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हिन्दी को जटिल बनाती सरकारी हिन्दी
          भारत की भौगोलिक, भाषायी एवं साँस्कृतिक विविधता इसकी राष्ट्रीय चेतना को स्वाभिमान के साथ समृद्ध वैचारिकी का आभामंडल प्रदान करती है। भारत में अनेक बोलियाँ और भाषाएं अस्तित्व में हैं।  अनेक बोलियों (अवधी,भोजपुरी,बृजभाषा,मारवाड़ी,मगही/मागधी, कुमाँऊनी,गढ़वाली,छत्तीसगढ़ी,हरियाणवी आदि ) के समावेश से समृद्ध हिन्दी भाषा विश्व की प्रमुख भाषाओं में अपनी पहचान ऐसी मातृभाषा के रूप में विख्यात किये हुए है जिसके  बोलने वाले चीनी भाषा 
के बाद विश्व में दूसरे स्थान पर हैं।  
हिन्दी एक ऐसी भाषा है जिसमें जो लिखा जाता है वही बोला जाता है। इसलिये हिन्दी एक वैज्ञानिक भाषा है। भाषा में अनुशासन की कठोरता उसे सीमित दायरों में समेट देती है अतः भाषा में लचीलापन होना एक अहम  लक्षण है। हिन्दी को लचीला बनाये जाने की गवाही देता 

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सोच रही हूँ हिंदी दिवस की बधाई किसे देनी चाहिए? 
हिंदी बचाओ का नारा किस वर्ग के लिए है?
................ तूलिका कहती है
यहाँ हिंदी को मान देने का मतलब प्रादेशिक और आँचलिक 
भाषाओं का विरोध कतई नहीं।
विविधताओं से परिपूर्ण हमारी भारतीय संस्कृति 
के लिए एक प्रचलित कहावत है-
"चार कोस में पानी बदले और सौ कोस पर बानी"
संभवतः हमारे देश की क्षेत्रीय और आंचलिक  भाषा की उत्पत्ति का स्रोत कमोबेश हिंदी या संस्कृत है। अनुसरण करने की परंपरा के आधार पर मनुष्य जिस क्षेत्र में रहा वहाँ की भाषा,खान-पान,रहन-सहन को अपनाता रहा।  इन विविध भाषायी संस्कृति को जोड़ने का माध्यम हिंदी न होकर अंग्रेजी का बढ़ता प्रचलन हिंदी के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक प्रतीत होने लगा है।

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कुछ लघु कथाएँ
25 July 1883 -11 September 1922
जिसकी अवस्था आठ वर्ष की थी, बड़े लाड़ से नुमाइश में 
मिस्टर हादी के कोल्हू की तरह दिखाया जा रहा था. 
उसका मुंह पीला था, आंखें सफ़ेद थीं, 
दृष्टि भूमि से उठती नहीं थी. प्रश्न पूछे जा रहे थे. उनका वह 
उत्तर दे रहा था. धर्म के दस लक्षण सुना गया, नौ रसों के 
उदाहरण दे गया. पानी के चार डिग्री के नीचे शीतलता में 
फैल जाने के कारण और उससे मछलियों की प्राण-रक्षा 
को समझा गया, चंद्रग्रहण का वैज्ञानिक समाधान दे गया, 
अभाव को पदार्थ मानने, न मानने का शास्त्रार्थ कर गया 
और इंग्लैंड के राजा आठवें हेनरी की स्त्रियों के नाम और 
पेशवाओं का कुर्सीनामा सुना गया. 


मैं कहती हूँ, इन्हें इसी वक्त वापिस छोड़ कर आओ वर्ना मैं इस घर में एक पल भी नहीं रहूंगी  सासु माँ आप को यहाँ आते जरा भी लाज नहीं आई?" रामादेवी से अब और बर्दाश्त ना हुआ।

काव्या..बेटी मेरी बात तो सुनो... आवाज जानी पहचानी थी 
काव्या को मानो झटका सा लगा रामादेवी की तरफ देखा, तो पाँव 
तले से जमीन ही खिसक गयी! माँ तुम? झेंपते हुए बोली।

हाँ काव्या ! तुम्हारे भाई और भाभी ने मुझे घर से निकाल दिया। दामाद जी को फोन किया, तो ये मुझे यहां ले आये मैं कहाँ जाती 
मैंने कहा मुझे वृद्धाश्रम छोड दो पर अजय जिद करके 
मुझे अपने साथ ले आये।

और चलते-चलते एक ग़ज़ल..
चिराग हूँ हज़ार अंधेरों के वजूद मिटा सकता हूँ
मेरी अहमियत तेरे तसव्वुर से ज्यादा है

वो शाह हो तो हो मुझे मेरी मुफ़लिसी पे गुमान है
मैं दरिया हूँ मुझे सफ़र का तजुर्बा समुन्दर से ज्यादा है

आज्ञा दीजिए...
प्रतिक्रिया की आवश्यकता कतई नहीं
पर हाँ, कलेवर में सुझाव की प्रतीक्षा रहेगी

यशोदा